Waters of Life

Biblical Studies in Multiple Languages

Search in "Hindi":
Home -- Hindi -- Romans - 052 (God Selects whom He has Mercy on)
This page in: -- Afrikaans -- Arabic -- Armenian -- Azeri -- Bengali -- Bulgarian -- Cebuano -- Chinese -- English -- French -- Georgian -- Hebrew -- HINDI -- Indonesian -- Malayalam -- Polish -- Portuguese -- Russian -- Serbian -- Spanish? -- Telugu -- Turkish -- Urdu? -- Yiddish

Previous Lesson -- Next Lesson

रोमियो – प्रभु हमारी धार्मिकता है|
पवित्र शास्त्र में लिखित रोमियों के नाम पौलुस प्रेरित की पत्री पर आधारित पाठ्यक्रम
भाग 2 - परमेश्वर की धार्मिकता याकूब की संतानों उनके अपने लोगों की कठोरता के बावजूद निश्चल है। (रोमियो 9:1 - 11:36)
3. यहूदियों में से अधिकांश परमेश्वर के विरोध में होने के बावजूद परमेश्वर अपनी धार्मिकता में बने रहते हैं | (रोमियो 9:6-29)

अ) इब्राहीम की प्राकृतिक संतानों से परमेश्वर के वादों का कोई वास्ता नहीं है| (रोमियो 9:6-13)


रोमियो 9:14-18
14 सो हम क्‍या कहें क्‍या परमेश्वर के यहां अन्याय है कदापि नहीं! 15 क्‍योंकि वह मूसा से कहता है, मैं जिस किसी पर दया करना चाहूं, उस पर दया करूंगा, और जिस किसी पर कृपा करना चाहूं उसी पर कृपा करूंगा। 16 सो यह न तो चाहनेवाले की, न दौड़नेवाले की परन्‍तु दया करनेवाले परमेश्वर की बात है। 17 क्‍योंकि पवित्र शास्‍त्र में फिरौन से कहा गया, कि मैं ने तुझे इसी लिये खड़ा किया है, कि तुझ में अपक्की सामर्थ दिखाऊं, और मेरे नाम का प्रचार सारी पृथ्वी पर हो। 18 सो वह जिस पर चाहता है, उस पर दया करता है; और जिसे चाहता है, उसे कठोर कर देता है।

निर्गमन 33:19 में मूसा को परमेश्वर के रहस्य प्रकटीकरण से, हम पाते है कि परमेश्वर के पास किसी एक निश्चित व्यक्ति पर दया और लगातार उनकी दया बनी रहने का अधिकार है, चाहे वह व्यक्ति अपराधी हो या ना हो| इसलिए परमेश्वर का चुनाव मनुष्य के कार्यों पर निर्भर नहीं करता परन्तु केवल सर्वशक्तिमान की दया पर निर्भर करता है, और मनुष्य के उद्धार का अर्थ उसके गुणों के बिना उसका न्यायीकरण है, जिसका कारण परमेश्वर का असीमित अनुग्रह है|

यही बात हम निर्गमन 9:16 में भी पढते है कि पवित्र परमेश्वर ने फिरौन से कहा था, जो कि मध्यस्थ था, और जो मिस्र की आत्मा के साथ भरा हुआ था: “परन्तु निश्चित ही इस उद्देश्य से मैंने तुम्हे ऊपर उठाया है, कि मै अपनी शक्ति तुममे दर्शा सकूँ और मेरा नाम पूरे पृथ्वी पर घोषित हो पाये|” इस दैवीय घोषणा ने पौलुस को यह लिखने के लिए प्रेरित किया, “इसलिए जिसे वह चाहते है उस पर उनकी दया है, और जिसे वह चाहे, कठोर करते है|” (रोमियो 9:18)

यह परमेश्वर की पवित्रता के कारण सही है| यद्यपि परमेश्वर एक तानाशाह नहीं है, परन्तु उनकी इच्छा है कि सभी मनुष्य सुरक्षित हो और सच्चाई के ज्ञान की ओर आये (रोमियों 11:32, 1 तीमुथियुस 2:4, 2 पतरस 3:9)| यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर की विरोधी आत्माओं की ओर अपने हृदय को लगाता है या जो मसीह के प्रतिकूल विचारों से बारे हुए है, का उत्तराधिकारी है, यह समझ में आता है कि परमेश्वर एक क्रूर नेता को उस व्यक्ति के आदेशों को खुलेरूप से विरोध करने की अनुमति देते है, परन्तु परमेश्वर एक आत्मत्यागी को, अपनी अनन्त शक्ति, आदर के साथ महान भी सिद्ध कर सकते है|

इसके उत्तर में, पौलुस की पत्री का वह वचन जिसका उल्लेख पहले भी हुआ है, कुछ कहते है कि इस्लाम इस विचार को स्वीकारता है कि परमेश्वर जिसे चाहे गुमराह करते है, और जिसे चाहे उसका मार्गदर्शन करते है क्योंकि परमेश्वर अपनी पवित्रतानुसार, सभी मनुष्यों को गुमराह करने का अधिकार रखते है, क्योंकि कोई भी धार्मिक नहीं है| अब तक परमेश्वर ने इस प्रकार से व्यवहार नहीं किया, जैसा कि अन्य धर्म कहते है, क्योंकि प्रत्येक पर उनके पास दया है, और जो मसीह को स्वीकारता है, अपनी स्वयं की पसंद से उसमे भागीदारी करता है, क्योंकि सिर्फ मसीह ही एक है जिन्होंने कभी अपराध नहीं किया|

परन्तु जो कोई भी अपने आपको, शैतान, झूठों के पिता के साथ बांधता है, और परमेश्वर की अपेक्षा पैसे से अधिक प्रेम करता है, ने चकित नहीं होना चाहिए यदि एकमात्र पवित्र उसे पूरी तरह से गिराने की अनुमति देते है, और वह परमेश्वर के वचन को समझने में असमर्थ है, जैसा कि यीशु ने यूहन्ना रचित सुसमाचार में कहा है (यूहन्ना 8:43-45)| परमेश्वर इस निर्णय को लेने में स्वतंत्र है, परन्तु मनुष्य इस जिम्मेदारी में शामिल होता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह गंभीरतापूर्वक प्रयश्चित करता है या नहीं|

पाठकों को इस बिंदु को स्पष्ट करने लिए, हम संकेत देते है कि पौलुस ने यह प्रतिबिंब अन्य जातियों के लिए नहीं भेजा था, परन्तु रोम में यहुदियों को उनके हृदयों की कठोरता पर विजय पाने के लिए भेजा था| आपने उन्हें स्पष्ट किया कि परमेश्वर ने उनको चुना था फिर भी वे उन्हें गुमराह करेंगे यदि वे अपने हृदयों को मसीह के सुसमाचार में उनके मार्गदर्शन की ओर नहीं खोलेंगे| पौलुस की यह पत्री प्रत्येक के लिए एक, दर्शन शास्त्र प्रस्तुत नहीं करती, परन्तु यह हमे दर्शाती है कि वे यहूदियों के हृदयों की कठोरता से कैसे व्यवहार करते है|

प्रार्थना: ओ स्वर्गीय पिता, हम आपकी आराधना करते है क्योंकि यीशु मसीह के चयन में आपने हम अपराधियों को चुना, और आपने हमें आपकी संतान बनाने का अधिकार प्रदान किया, जबकि हम आपके इस चयन के लिए उपयुक्त नहीं है| हम आपकी निरंतर दया के लिए आपकी स्तुति करते है, और महिमा करते है और अपने पूरे हृदय के साथ आपका धन्यवाद करते है क्योंकि हमारे अपराधों के बावजूद आपने हमें ना तो कठोर बनाया या हमें अस्वीकार किया, परन्तु हमें आपके अतिमहान प्रेम की ओर खींचा|

प्रश्न:

59. क्यों कोई भी व्यक्ति परमेश्वर द्वारा चुने जाने के लिए उपयुक्त नहीं है? हमारे स्वीकारात्मक चयन का कारण क्या है?
60. परमेश्वर ने फिरौन को क्यों कठोर कियाथा? व्यक्तियों, वंशों और लोगों की कठोरता कैसी दिखती है?

www.Waters-of-Life.net

Page last modified on March 05, 2015, at 11:55 AM | powered by PmWiki (pmwiki-2.2.109)