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रोमियो – प्रभु हमारी धार्मिकता है|
पवित्र शास्त्र में लिखित रोमियों के नाम पौलुस प्रेरित की पत्री पर आधारित पाठ्यक्रम
भाग 2 - परमेश्वर की धार्मिकता याकूब की संतानों उनके अपने लोगों की कठोरता के बावजूद निश्चल है। (रोमियो 9:1 - 11:36)

3. यहूदियों में से अधिकांश परमेश्वर के विरोध में होने के बावजूद परमेश्वर अपनी धार्मिकता में बने रहते हैं | (रोमियो 9:6-29)


पौलुस प्रभु यीशु की सेवकाई में एक प्रसन्नता भरे उपदेशक थे, परन्तु उसी समय आप गहरे दुःख और बढते हुए दबाव में डूबे थे| आपने देखा था कि सौओं से अविश्वासी अन्यजाति के लोगों का नवीनीकरण हुआ और वे परमेश्वर के राज्य में शामिल हो रहे थे जबकि हजारों से चुने हुए यहुदियों ने यीशु और उनके राज्य का अपमान किया, उनसे दूर हो गये, उनको सुनना या उनका अनुसरण करना नहीं चाहा था|


अ) इब्राहीम की प्राकृतिक संतानों से परमेश्वर के वादों का कोई वास्ता नहीं है| (रोमियो 9:6-13)


रोमियो 9:6-13
6 परन्‍तु यह नहीं, कि परमेश्वर का वचन टल गया, इसलिये कि जो इस्राएल के वंश हैं, वे सब इस्‍त्राएली नहीं। 7 और न इब्राहीम के वंश होने के कारण सब उस की सन्‍तान ठहरे, परन्‍तु लिखा है कि इसहाक ही से तेरा वंश कहलाएगा। 8 अर्थात शरीर की सन्‍तान परमेश्वर की सन्‍तान नहीं, परन्‍तु प्रतिज्ञा के सन्‍तान वंश गिने जाते हैं। 9 क्‍योंकि प्रतिज्ञा का वचन यह है, कि मैं इस समय के अनुसार आऊंगा, और सारा के पुत्र होगा। 10 और केवल यही नहीं, परन्‍तु जब रिबका भी एक से अर्थात हमारे पिता इसहाक से गर्भवती थी। 11 और अभी तक न तो बालक जन्में थे, और न उन्‍होंने कुछ भला या बुरा किया था कि उस ने कहा, कि जेठा छुटके का दास होगा। 12 इसलिये कि परमेश्वर की मनसा जो उसके चुन लेने के अनुसार है, कर्मोंके कारण नहीं, परन्‍तु बुलानेवाले पर बनी रहे। 13 जैसा लिखा है, कि मैं ने याकूब से प्रेम किया, परन्‍तु एसौ को अप्रिय जाना।।

पौलुस, कानूनी विशेषज्ञ, इस सत्य को स्पष्ट कर देना चाहते थे, जो कि दोनों यहूदी और रोम के मूल यहूदी ईसाईयों के लिए विचित्र बात थी| आपने उनको लिखा था कि परमेश्वर का वचन एकमात्र सत्य है जो कि इस विचित्र घटना को स्पष्ट कर सकता है, और जो कि इस रहस्य का सही उत्तर अपने में समेटे हुए है| इस उत्तर के दो पक्ष है

प्रथम: इब्राहीम की सभी संताने वादे की संताने नहीं है| परमेश्वर ने इश्माएल को मसीह के पूर्वजो में से एक नहीं चुना था| इश्माएल और उसके सभी उत्तराधिकारी धार्मिक रेखा और याकूब की संतानों की पसंद के बाहर रहे थे| हम इस घटना से यह समझते है कि मनुष्य का प्राकृतिक मूल उसके आध्यात्मिक भविष्य को निश्चित नहीं करता| प्रत्येक व्यक्ति जो एक ईसाई परिवार में जन्म लेता है तुरंत ही एक सच्चा ईसाई नहीं बन जाता, परन्तु उसे व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर की ओर वापस आने की आवश्यकता है, परमेश्वर के बच्चे है, नाती-पोते नहीं है|

यह सत्य हमें यह स्पष्ट करता है कि सभी चुने हुए यहूदी परमेश्वर की संताने नहीं है, परन्तु केवल वे जो इच्छापूर्वक मसीह के सुसमाचार की ओर खुल चुके है| इब्राहीम का दत्तक ग्रहण का अधिकार उनमे स्थापित हो चुका था, परन्तु इसकी सफलता प्रत्येक व्यक्तित्व की इच्छा पर निर्भर है|

द्वितीय: हमने पवित्र बाइबिल में पढ़ा कि परमेश्वर ने रेबेका इसहाक की पत्नी से उसके जुड़वा संतानों को जन्म देने से पहले कहा था, कि बड़ा पुत्र छोटे पुत्र की सेवा करेगा (उत्पति 25:23)| दोनों एक ही पिता के पुत्र थे| परन्तु परमेश्वर समय से पहले ही जानते थे कि कोशिकाएं एवं जननिकता दोनों में अलग अलग विकसित होंगी|

यद्यपि परमेश्वर ने छोटे भाई याकूब को चुना और बड़े भाई एसाव को अस्वीकार किया था| फिर भी याकूब नितिपूर्णता में एसाव से अच्छा नहीं था, वह एसाव की अपेक्षा विश्वास की क्षमता में अधिक आनंदित था, और उसने गंभीरतापूर्वक प्रायश्चित किया था| यह घटना हमें यह समझाती है कि मनुष्य की पसंद उसके पुर्वनिश्चियता के अनुसार, परमेश्वर की सर्वज्ञता और उनकी अपनी इच्छा पर निर्भर करती है|

परमेश्वर द्वारा अस्वीकृत किये जाने पर कोई उनको दोष नहीं दे सकता है, क्योंकि हम स्वयं अपने रहस्यों या अपने शरीरों में विरासत के बारे में नहीं जानते| परमेश्वर उनके निर्णयों में पवित्र, न्यायी एव दोषमुक्त हैं|

कुछ धर्मशास्त्रीयों ने देखा कि परमेश्वर के चुनाव का मनुष्य के अस्तित्व, या कार्यों से कोई वास्ता नहीं है, परन्तु यह केवल सृष्टिकर्ता के निर्णय पर निर्भर है; और यह कि मनुष्य परमेश्वर के प्रयोजनों और रुपरेखाओं को नहीं पहचान सकता प्रत्येक व्यक्ति इस विचार से सहमत नहीं है, क्योंकि हमारे परमेश्वर हमारे पिता है जो न सिर्फ पवित्र है, परन्तु प्रेममयी और करुणामयी भी है|

अपने कार्यकालमे, मसीह ने यह निर्णायक शब्द कहे थे: “मेरी भेडे मेरी आवाज सुनती है, और मै उन्हें जानता हूँ, और वे मेरा अनुसरण करती है, और मै उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ” (यूहन्ना 10:27-28) प्रत्येक व्यक्ति उनकी आवाज नहीं सुनता है, और न ही प्रत्येक व्यक्ति जो उनकी आवाज को सुनता है उनको प्रत्युत्तर देता है, या उनके आदेशानुसार कार्य करता है| हम एक वंशके एक राज्य के, और यहाँ तक कि एक परिवार के ऐसे लोगों को पाते है जो सुसमाचार को सुनते है और इसे समझ नहीं पाते है, जबकि अन्य लोग इसके आनंद और शांति से भर उठे थे|

प्रार्थना: ओ स्वर्गीय पिता, हम आपका धन्यवाद करते है क्योंकि आपने इसहाक और याकूब को चुना और अपने पुत्र मसीह के दादा, परदादा बनाया जबकि वे महापुरुष भी नहीं थे| कृपया हमारे विश्वास को बल प्रदान करे ताकि हम, आनेवाली कठिनाईयों, साथ ही साथ हमारी स्वयं की बुराईयों पर आपके नाम में विजय पा सके, और हमें विनम्रता एवं आत्मत्याग की ओर ले जाये ताकि हम अपने आप को दूसरों की अपेक्षा बहुत अच्छा ना मान ले|

प्रश्न:

57. इसहाक का चुनाव उसके मूल से और याकूब का चुनाव उसके पुत्रों से, का अर्थ क्या है?
58. परमेश्वर के चुनाव का रहस्य क्या है?

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