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यूहन्ना रचित सुसमाचार – ज्योती अंध्कार में चमकती है।
पवित्र शास्त्र में लिखे हुए यूहन्ना के सुसमाचार पर आधारित पाठ्यक्रम
दूसरा भाग – दिव्य ज्योती चमकती है (यूहन्ना 5:1–11:54)
क - यीशु की यरूशलेम में अन्तिम यात्रा (यूहन्ना 7:1 - 11:54) अन्धकार का ज्योती से अलग होना
1. झोपड़ियों के पर्व के समय पर यीशु का वचन (यूहन्ना 7:1 – 8:59)

ड) यीशु जगत की ज्योती (यूहन्ना 8:12-29)


यूहन्ना 8:21-22
“21 उसने फिर उनसे कहा, ‘मैं जाता हूँ, और तुम मुझे ढूंढोगे और अपने पाप में मरोगे; जहाँ मैं जाता हूँ, वहाँ तुम नहीं आसकते |’ 22 इस पर यहूदियों ने कहा, ‘क्या वह अपने आप को मार डालेगा, जो कहता है, ‘जहाँ मैं जाता हूँ वहाँ तुम नहीं आ सकते ?’”

यीशु जानते थे कि आप चारों तरफ से मंदिर के कर्मचारियों से घिरे हुए थे | आपने अत्यन्त रहस्यपूर्ण शब्दों में भविष्य के गहरे मतलब का संकेत दिया, “मेरी मृत्यु का समय नज़दीक है | तब मैं इस दुनिया को छोड़ कर चला जाऊंगा, तुम मेरे पीछे ना आ सकोगे | तुम्हारी अपनी योजना के अनुसार तुम मेरे हत्यारे नहीं हो | मैं अपने प्रस्थान करने का समय स्वंय निश्चित करता हूँ |”

“परन्तु मैं अपनी कबर में से उठ जाऊंगा और चट्टानों और बंद दरवाज़ों में से होता हुआ निकल जाऊंगा | तुम मुझे ढूंढने का व्यर्थ प्रयास करोगे परन्तु नहीं पाओगे | मैं अपने पिता के पास ऊपर चला जाऊँगा और तुम्हें पता भी नहीं चलेगा | तुम ने मुझे जो परमेश्वर का मेमना हूँ, ठुकरा दिया और मुझ पर विश्वास नहीं किया | मैं मानव जाती का मुक्तीदाता हूँ | तुम अपने पापों के बन्दीग्रह में नष्ट हो जाओगे |” यीशु ने यह नहीं कहा कि तुम अपने पापों में मर जाओगे | हमारे अत्यधिक सामाजिक पाप हमारे असली पाप नहीं होते, बल्की परमेश्वर की ओर हमारा दृष्टीकोण और हमारा अविश्वास हमारा पाप बन जाता है |

यहूदियों ने यह जान लिया कि यीशु अपने अन्तिम प्रस्थान के विषय में बोल रहे हैं परन्तु वो आप की इस गवाही का मतलब नहीं समझ सके कि आप अपने पिता के पास लौट जायेंगे | परन्तु उन्होंने यह ग्रहण कर लिया कि फरीसियों और याजकों के साथ अपने मतभेद में आप अपनी सारी प्रबलता की सीमा तक पहुंच चुके हैं | अब आप के पास आत्महत्या करने के सिवा कोई चारा ना था | क्या नरक या अनन्त श्राप आप को हत्या के समान निगल लेगा ? यहूदियों ने सोचा कि उनकी धार्मिकता के कारण उनका अपना परिणाम ऐसा ना होगा परन्तु यीशु के बाद 70 वें वर्ष में जब रोमियों ने यरूशलेम पर आक्रमण किया तब हजारों यहूदियों ने अकाल और निराशा के करण आत्म हत्या कर ली थी |

यूहन्ना 8:23-24
“23 उसने उनसे कहा, ‘तुम नीचे के हो, मैं ऊपर का हूँ; तुम संसार के हो, मैं संसार का नहीं | 24 इसलिये मैं ने तुम से कहा कि तुम अपने पापों में मरोगे, क्योंकि यदि तुम विश्वास न करोगे कि मैं वही हूँ तो अपने पापों में मरोगे |’”

यीशु ने घोषणा की, कि हमारी इस दुष्ट दुनिया के ऊपर सच में परमेश्वर का राज्य है | हम सब नीचे के हैं और मिट्टी से बने हुए हैं और बुरे विचारों से भरे हुए हैं | शैतान का बोया हुआ बीज सड़े हुए फल उत्पन्न करता है | साधारण मनुष्य परमेश्वर के राज्य को जान नहीं सकता परन्तु उसकी उपस्तिथी का धुंधला सा अनुभव कर सकता है |

मसीह हमारी इस दुनिया के नहीं हैं | आप की आत्मा पिता से निकलती है | आपने अपने पिता के राज्य को ऊपर रखा परन्तु भूगोलिक अर्थ में नहीं | जैसे जैसे हम ऊपर जाते हैं , धर्ती का खिंचाव कम होता जाता है | उसी तरह जैसे जैसे हम परमेश्वर के पास आते हैं पाप के बुरे सपने विलुप्त हो जाते हैं | हमारी दुनिया एक बन्दीग्रह है जिस में से हम बच कर निकल नहीं सकते | हम अपने पर्यावरण की संतान हैं जो परमेश्वर के प्रेम की अधीनता को अस्वीकार करते हैं | हमारे जीवन पाप से परिपूर्ण हैं | यहाँ यीशु ने “पाप” शब्द का प्रयोग बहुवचन में किया है क्योंकी जब हम परमेश्वर का विरोध करते हैं तब कई पाप और भूल हम से हो जाते हैं | हम कुष्ठ रोगियों की तरह हो जाते हैं जिनके शरीर पर कई फोड़े और घाव के निशान बन जाते हैं | जिस तरह वो अभागा जीता तो है परन्तु धीमी गती से मरता है | इसी तरह पाप मनुष्य को नष्ट करता है | हम ने पाप किया है इसलिये हम मर जायेंगे | पाप क्या है ? वो अविश्वास है | क्योंकी जो मसीह में बंधा हुआ है, हमेशा जीवित रहेगा | परमेश्वर के पुत्र का लहू हमें पाप से पवित्र करता रहता है | आप की शक्ती हमारे अन्त:करण को साफ करती है और हमारे विचारों का पवित्रिकरण करती है | परन्तु जो मसीह से अलग रहता है वह मृत्यु को चुन लेता है और पाप के बन्दीग्रह में पड़ा रहता है और न्याय के लिये ठहरा रहता है | मसीह पर विश्वास करने से ही हम परमेश्वर के क्रोध से मुक्त हो सकते हैं |

फिर यह यीशु कौन हैं जो चाहते हैं कि हम आप के व्यक्ती पर विश्वास करें ? फिर एक बार आप अपना वर्णन “मैं हूँ” कह कर करते हैं (यूहन्ना 6:20; 8:24) | इस तरह आप अपने विषय में सभी महान गवाहियों को संक्षेप में बताते हैं | आप स्वंय को सच्चाई का परमेश्वर, जीवित परमेश्वर और वह पवित्र व्यक्ती बताते हैं जो जलती हुई झाड़ी में मूसा पर “मैं जो हूँ” कहते हुए प्रगट हुई (निर्गमन 3:14; यशायाह 43:1-12) | उद्धार किसी और व्यक्ती में नहीं है | हर एक यहूदी इन दो मुहविरों को जानता था परन्तु बोलने का साहस नहीं कर सकता था ताकी परमेश्वर का नाम व्यर्थ में ना लिया जाये | परन्तु यीशु ने सब के सामने अपने आप के लिये इन मुहविरों का प्रयोग किया | आप केवल मसीह, परमेश्वर के पुत्र ही नहीं बल्की यहोवा भी हैं यानी परमेश्वर जो सत्य है |

आप सुसमाचार का निचोड़ हैं | मसीह परमेश्वर हैं जो मनुष्य बने | जो कोई आप पर विश्वास करता है जीवित रहता है | परन्तु जो कोई आप के अधिकार को अस्वीकार करता है वो अपने आप को क्षमा से वंचित करता है | विश्वास या अविश्वास मनुष्य के भविष्य का निर्णय करता है |

प्रश्न:

60. जिस ने स्वंय को “मैं जो हूँ” कहा उस पर विश्वास करने का क्या अर्थ है ?

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