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रोमियो – प्रभु हमारी धार्मिकता है|
पवित्र शास्त्र में लिखित रोमियों के नाम पौलुस प्रेरित की पत्री पर आधारित पाठ्यक्रम
भाग 1: परमेश्वर की धार्मिकता सभी पापियों को दण्ड देती है और मसीह में विश्वासियों का न्याय करती है और पापों से मुक्त करती है। (रोमियों 1:18-8:39)
ब - विश्वास के द्वारा नई धार्मिकता सभी मनुष्यों के लिए खुली है (रोमियो 3:21 - 4:22)

1. मसीह की क्षतिपूर्ति मृत्यु में परमेश्वर की धार्मिकता का पुनरुत्थान (रोमियो 3:21-26)


रोमियो 3:25–26
25 उसे परमेश्वर ने उसके लोहू के कारण एक ऐसा प्रायश्चित ठहराया, जो विश्वास करने से कार्यकारी होता है, कि जो पाप पहले किये गए, और जिन को परमेश्वर ने अपनी सहनशीलता से आनाकानी कि; उनके विषय में वह अपनी धार्मिकता प्रगट करे| 26 वरन इसी समय उस की धार्मिकता प्रगट हो; कि जिस से वह आप ही धर्मी ठहरे, और जो यीशु पर विश्वास करे, उस का भी धर्मी ठहरनेवाला हो|

ना सिर्फ इंसानियत ने मसीह को सूली पर चढ़ाया परन्तु परमेश्वर हमारे पापी संसार से बहुत प्रेम करते थे कि उन्होंने अपने इकलौते पुत्र को अपराधियों को दिया, यह जानते हुए कि वे उसे मार डालेंगे| अब तक, उन्होंने अपने स्वर्गीय ज्ञान में ऐसी योजना बनाई थी कि एक पवित्र की मृत्यु सभी कालों में, सारे अपराधियों के लिए एक बलिदान और प्रायश्चित है| मसीह के लहू ने हमें हमारे सभी पापों से स्वछ कर दिया है| परमेश्वर के निर्दोष पुत्र के लहू के अलावा किसी भी प्रकार से पापों से मुक्ति नहीं है|

हमारे युग की असाधारण और तकनिकी विजयों में, हम यह ज्ञान खो चुके है कि इस जगत के इतिहास में परमेश्वर का रोश और न्याय क्रियात्मक शक्तियां हैं, और यह कि वे हवाई जहाजों, पनडुब्बियों, टैंकों, और हाईड्रोजन बमों से कही अधिक महत्वपूर्ण हैं| हमारे प्रत्येक अपराध को दंड और प्रायश्चित की आवश्यकता है, क्यिंकि नियम के अनुसार हमें मृत्यु का दंड दिया गया था और मसीह का प्रतिस्थानिक बलिदान ही हमारे उद्धार का एक मात्र रास्ता ह| इस उद्देश्य के लिए परमेश्वर का पुत्र मनुष्य रूप लेकर, परमेश्वर के क्रोध की लपटों में सूली की वेदी पर जल गया| वह जो उसके पास इमानदारी से आता है न्यायोचित है| करोडो लोगों ने यह अनुभव किया है कि परमेश्वर की सारी शक्तियां मसीह के बहते लहू में कार्य करती है| इस लिए, हम आप को बुलाते है प्रिय भाइयों, अपने आप को उससे दूर मत रखो जो सूली पर चढ़ाया गया| इसके स्थान पर, तुम्हारा घर, तुम्हारा कार्य, तुम्हारा भूतकाल, तुम्हारा भविष्य, तुम्हारी कलीसिया, और स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के मेमने के लहू के छिडकाव के नीचे रखो, ताकि तुम हमेशा परमेश्वर के सच्च में पापों से मुक्त और सुरक्षित रहो| यहाँ शैतान की शिकायतों और परमेश्वर के क्रोध की वेदनाओं से बचने के लिए यीशु मसीह के लहू के अलावा और कोई सुरक्षा नहीं है| वचन 21 से 28 मुह जबानी याद करो, उनके एक एक शब्द को ध्यान से पढ़ो, और उनके अर्थों को तुम्हारे दिलों में जाने दो| तब तुम पहचान सकोगे कि इस पाठ की आवश्यक बात, अपराधियों को न्यायोचित ठहराना नहीं, बल्कि परमेश्वर की धार्मिकता का प्रदर्शन है जिसकी चर्चा इस लेखांश में 3 बार की गयी है|

हमारे प्यारे परमेश्वर ने अपराधियों को भूत काल में नष्ट नहीं किया था, जैसा कि कानून के अनुसार आवश्यकता था| उस दया वान परमेश्वर ने अपने प्रेम और धैर्य के कारण सभी अन्यायों को क्षमा किया और उस पर ध्यान नहीं दिया तब तक उस क्षण की प्रतीक्षा की, जब तक कि सभी प्राणी आएं, सूली पर मसीह की दुखद मृत्यु में परमेश्वर और संसार की संधि का क्षण| सभी परियों ने खुशियाँ मनाई क्योंकि सूली पर चढ़ाये गये मसीह का पुनरुत्थान हुआ, सभी अपराधी न्यायोचित ठहराए गये|

जो कोई भी यह कहता है कि परमेश्वर जिसको चाहे, जहाँ चाहे, अपने आप अपनी इच्छा से क्षमा कर सकते है, वह सतही तर्कों पर, एक मनुष्य को सुनने वाला अनाड़ी है, क्योंकि परमेश्वर पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं है, परंतो इसके स्थान पर उन्होंने स्वयं को अपनी पवित्रता के शब्दों और अर्थों के साथ सीमित किया हुआ है, और प्रत्येक अपराधी को मार सकते है| उन्होंने यह भी प्रकटित किया है कि लहू बहे बगैर क्षमा दान नहीं है| यदि मसीह का बलिदान नहीं हुआ होता, तो पवित्रता की अति आवश्यक शर्ते पूरी हुए बगैर परमेश्वर स्वयं ही लोगों को क्षमा करने के लिए दोषित ठहराए गये होते|

मसीह को सूली पर चढाने में दो बाते हुई: परमेश्वर ने अपनी पवित्रता का प्रदर्शन किया, और उसी समय हमें पूरी तरह से न्यायोचित ठहराया| पवित्र एकमात्र परमेश्वर हमें क्षमा करने में अन्यायी नहीं है, क्योंकि मसीह ने पवित्रताओं की सभी शर्तों को पूरा कर दिया है| यह नासरती बेगुनाह, पवित्र और विनम्र थे| सभी प्राणियों में से केवल एक वही, अपने शक्तिशाली प्रेम के बलबूते पर, सारे जगत के पापों को सहें कर सके थे| तो यीशु की स्तुति करो और उनसे प्रेम करो, और उनके पिता की महिमा करो, जो अपने प्यारे पुत्र के स्थान पर स्वयं मरने को प्राथमिकता देते थे, परन्तु इस संसार के अटूट क्रम और सूली पर चढ़ाये जाने का न्याय करने की आवश्यकता के कारण अपने आप को उसके स्थान पर मरने का कारण नहीं दे सके होंगे| अपने याजकीय प्रार्थना में (युहन्ना :17) यीशु ने परमेश्वर को इन शब्दों के साथ संबोधित किया था “ओ पवित्र पिता”| इन शब्दों में, हम परमेश्वर की धार्मिकता का एक अत्यंत गहरा अर्थ पाते हैं| सृष्टि कर्ता प्रेम और सच से भरे हुए है| उनके पास अन्याय पूर्ण प्रेम नहीं है परन्तु उनकी दया न्याय पर निर्मित है| मसीह की मृत्यु में, परमेश्वर की विशिष्टताओं की सभी आवश्यकताएँ एकत्रित हैं| यह असीमित प्रेम, जोकि विधि सम्मत अधिकार पर निर्मित है, क्या है हम इसे “अनुग्रह ” कहते है, क्योंकि यह हमें स्वतंत्र न्याय संगत तर्कों द्वारा दिया गया था, जैसे परमेश्वर अपने धार्मिकता में लगातार बने हुए है वह प्रेम करते है और क्षमा करते है|

प्रार्थना: ओ पवित्र त्रयी, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा, हम आपकी आराधना करते हैं, क्योंकि आप का प्यार सभी समझदारियों से ऊपर है, और आप की पवित्रता समुन्द्र की अपेक्षा कहीं अधिक गहरी है| आपने हमें हमारे सभी अपराधों से, मृत्यु से, और शैतान के सभी अधिकारों से मुक्त किया, चांदी या सोने के साथ नहीं परन्तु मसीह की दुखदायी वेदनाओं और श्रापित वृक्ष पर उनकी मृत्यु द्वारा| उनके बहुमूल्य लहू ने हमें हमारे सभ अपराधों से स्वच्छ किया और हम अनुग्रह द्वारा धार्मिक एवं पवित्र बन् गये| हम यीशु के बलिदान का सम्मान करते है, और अपने आप को आप को सोपते है, आपको धन्य वाद देते है क्योंकि आपने हमें न्यायोचित ठहराकर हमें पापों से मुक्त किया|

प्रश्न:

28. “परमेश्वर की धार्मिकता का प्रदर्शन” इस पदबंध का अर्थ क्या है?

इसलिए कि सबने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित है|
परन्तु उसके अनुग्रह से उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है,
सेंत मेंत धर्मी ठहराए जा ते हैं|

(रोम 3:23-24)

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