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रोमियो – प्रभु हमारी धार्मिकता है|
पवित्र शास्त्र में लिखित रोमियों के नाम पौलुस प्रेरित की पत्री पर आधारित पाठ्यक्रम
भाग 1: परमेश्वर की धार्मिकता सभी पापियों को दण्ड देती है और मसीह में विश्वासियों का न्याय करती है और पापों से मुक्त करती है। (रोमियों 1:18-8:39)
अ - सारा संसार शैतान के तले झुका है और परमेश्वर अपनी पूरी धार्मिकता में न्याय करेंगे (रोमियों 1:18-3:20)
2. परमेश्वर का क्रोध यहुदियों के विरोध में प्रकट हुआ (रोमियो 2:1 - 3:20)

ई) यहुदियों का विशेषाधिकार उन्हें क्रोध से बचा नहीं सकता| (रोमियो 3:1-8)


रोमियो 3:1-5
1 सो यहूदी की क्या बढ़ाई, या खतने का क्या लाभ? 2 हर प्रकार से बहुत कुछ! पहिले तो यह कि परमेश्वर के वचन उन को सौंपे गए| 3 यदि कितने विश्वसघाती निकले भी तो क्या हुआ| क्या उन के विश्वसघाती होने से परमेश्वार की सच्चाई व्यर्थ ठहरेगी? 4 कदापि नहीं, वर्ना परमेश्वर सच्चा और हर एक मनुष्य झूठा ठहरे, जैसे लिखा है, कि जिस से तू अपनी बातों में धर्मी ठहरे और न्याय करते समय तू जय पाए| 5 सो यदि हमारा अधर्म परमेश्वर की धार्मिकता ठहरा देता है, तो हम क्या कहें? क्या यह कि परमेश्वर जो क्रोध करता है अन्यायी है? (यह तो मै मनुष्य की रीती पर कहता हूँ)|

पौलुस द्वारा रोम की कलीसिया को पत्री लिखने से पहले, उसके सदस्यों में बहुत से प्रश्न थे| मूल रूप से अन्यजाति के विश्वासी यहूदियों का इस प्रकार से विचार नहीं करते थे जैसे वे महान विशेष अधिकारी एवं आदरणीय हैं| इसीलिए वे प्रसन्न हुए थे जब पौलुस ने अपनी पत्री में निश्चित रूप से कहा था कि कानून और खतना ने पुराने नियम के लोगों को दोषी ठहराया होगा|

दूसरी ओर मूलरूप से यहूदी ईसाई जो कानून पर एकमत से दृढ थे, ने विश्वास द्वारा धार्मिकता के विश्वास पर प्रश्न चिन्ह लगाया| वे पौलुस द्वारा दी गई सफाई से अप्रसन्न हुए थे, जैसे आपने, कानून और नियमों से उनको मिले विशेष अधिकारों को तोडा था|

पौलुस इन अलग अलग विचाधाराओं को अपनी धर्म प्रचार की यात्राओं के समय जान पाये थे और आपने उनके प्रश्नों के उत्तर, रोम को लिखी, आपकी पत्री में समय से पहले दे दिया था| आपने यह मान लिया था कि किसी ने उनको कहा था कि: “तुमसही हो, पौलुस, यहूदी हम लोगों से श्रेष्ठ नहीं है|” और पौलुस ने एक मुस्कुराहट के साथ उत्तर दिया: “मेरे प्रिय भाई, तुम गलत हो, क्योंकि अब तक भी यहूदियों के पास एक महान विशेष अधिकार है| यह, न तो, उनका वंश है, ना ही उनकी विशिष्ट योग्यता, ना ही उनकी राष्ट्रीयता, जो सब मिट्टी और राख है| उनका केवल एक विशेष अधिकार है परमेश्वर का वचन उनके हाथों में जमा किया हुआ है| यह पुनरुत्थान उनके गर्व और जिम्मेदारी को हमेशा रखेगा|

तब पौलुस ने कल्पना की थी कि दूसरे विरोधक ने कहा “परन्तु वे कानून के नियमों के प्रति ईमानदार नहीं है और उसका पालन नहीं करते|” और पौलुस ने इस गंभीर दोषारोपण का उत्तर यह कहकर दिया था: “कि तुम सोचते हो कि मनुष्य की गलतियाँ, परमेश्वर की ईमानदारी और वादों को निष्फल और निरर्थक बना देते हैं? परमेश्वर कभी भी जल्दबाजी नहीं करते और न ही वह झूठ कहते हैं| उनका वचन अनंत सत्य और इस सृष्टि की नीव है| परमेश्वर का अनुग्रह, मनुष्यों की नास्तिकता के सामने, ईमानदार और हमेशा बना रहता है| यदि मनुष्यों के अपराधों के कारण परमेश्वर पुराने नियम की शक्तियों को कम कर देते हैं तो हमारे नए नियम की भी स्थिरता नहीं रहेगी| वास्तव में, हमें दिये गये उपहारों की तुलना में, हम नए नियम के लोग, पुराने नियम के लोगों से अधिक अपराध करते हैं| यद्यपि हम हमारी प्रत्यक्ष असफलता या काल्पनिक सफलता पर नहीं, परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह पर आशा रखते हैं और हम साक्षी देते हैं कि सिर्फ परमेश्वर एक अकेले ही सच्चे और ईमानदार है| उनकी ईमानदारी और उनके वादे कभी असफल नहीं हुए|

रोमियो 3:6-8
6 कदापि नहीं, नहीं तो परमेश्वर क्योंकर जगत का न्याय करेगा? 7 यदि मेरे झूठ के कारण परमेश्वर की सच्चाई उस की महिमा के लिए अधिक कर के प्रगट हुई, तो फिर क्यों पापी की नाई मै दण्ड के योग्य ठहराया जाता हूँ? 8 और हम क्यों बुराई न करें, कि भलाई निकले? जब हम पर यही दोष लगाया भी जाता है, और कितने कहेते है, कि इन का यही कहना है: परन्तु ऐसों का दोषी ठहराना ठीक है|

जैसे पौलुसने हमारी आशा को दृढ़ किया था, जोकि केवल परमेश्वर की ईमानदारी पर निर्मित है, आपने अपनी आत्मा में, बुरी आत्माओं को आक्रामक रूप से रोते हुए सुना था: “हमारे प्रकटित अपराधों से परमेश्वर कैसे अपनी ईमानदारी और अनुग्रह में पवित्र रह सकते है? क्या यह परमेश्वर के लिए अन्यायपूर्ण नहीं है हमारे अपराधों के लिए दण्ड देना, और अविश्श्वनीय जब सार्वभौमिक अपराध और मनुष्यों के भ्रष्टाचार उनको उनकी महान ईमानदारी के प्रकटीकरण के लिए अवसर देते हैं? तब, आओ; हम परमेश्वर की गरिमा के लिए अपराध करे|”

पौलुस इस गंभीर दोषारोपण के विरोध में शांत नहीं रहे, परन्तु आपने सफाई दी और दूसरे प्रतिवादो पर निर्भर रहे, और यह भी खुले रूप से व्यक्त किया कि वे यह सब एक उपदेशक के रूप में नहीं कह रहे हैं, परन्तु एक साधारण मनुष्य के रूप में| आपने कहा निश्चित रूप से यदि हमारे अन्यायों से परमेश्वर की ईमानदारी प्रकटित होती है, यह अन्याय पूर्ण होगा कि परमेश्वर जगत का न्याय करें; और यदि हमारे झूठ उनके सत्य को सहारा देते हैं, उनको कोई अधिकार नहीं है जगत को दण्ड देने का| तब यह निश्चित रूप से हमारे लिए अच्छा है कि अपराध करें और अच्छाई की महिमा का अवसर दे|

पौलुस ने, इन नकारत्मक परिचर्चाओं में; मूल प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, परन्तु आपने प्रश्नकर्ताओ में बुरी आत्मा को दृढ, स्पष्ट और विकसित किया, ताकि आपके विरोधियों के सभी तर्क समय से पहले सामने आ जाये| तब आपने संक्षेप में दो शब्दों में उत्तर दिया: प्रथम, “निश्चित रूप से नहीं!” जिसका संकेत यूनानी पाठ्यक्रम में है – “मै हुआ होंगा कि यह विचार मेरे अन्दर निर्मित नहीं हुए|” मै फिर से इससे बिलकुल सहमत नहीं हूँ, और परमेश्वर मेरे साक्षी है कि मै, मेरे दिल में ऐसी ईश्वरनिन्दा से सम्बन्ध नहीं रखता| और दूसरी बात आप कहते हैं कि परमेश्वर का न्याय उन सभी ईश्वरनिन्दा करने वालों पर गिरेगा, और यह कि वे उनके क्रोध से बच नहीं सकते क्योंकि वे तुरन्त ही उनको नष्ट कर देंगे| इस उपदेशीय तरीके से हम पाते है कि हम कभी कुछ समय के लिए यीशु के शत्रुओं के साथ इसस्थिति में पहुंचते हैं, जहाँ हमें सभी तर्कों और प्रश्नों को रोक देना चाहिए, कि हम ईश्वरनिन्दा में प्रवेश न करे| तो हम में इतना साहस होना चाहिए कि परिचर्चा का अन्त करे, और लोगों को पूरी तरह से परमेश्वर और उनके महिमामय न्याय को सौपं दे|

प्रार्थना: ओ पवित्र परमेश्वर हमें हमारे सभी अवज्ञाकारी प्रश्नों के लिए क्षमा करना| आपके धैर्य के लिए हम आपका धन्यवाद करते है क्योंकि आपने हमें हमारे अपराधों और उपेक्षाओं के कारण, नष्ट नहीं किया परन्तु आपने हमें बुलाने का कारण दिया कि हम आपके वचन को सुन सके, और आपकी पवित्र आत्मा के द्वारा खींचने पर प्रतिक्रिया दे सके| आपके प्यार की योजना के विरोध में उभरे सभी विरोधी प्रश्नों को हमारे मन में से निकाल दो| ओ प्रभु, हम अवज्ञाकारी की संतान नहीं बने रहना चाहते| तो हमें आपके पुत्र की विनम्रता सिखाइयेहमें आपके उपदेशकों के ज्ञान से भर दो कि हम दूसरों के साथ परिचर्चा में हमारे मानवीय तर्कों में ना बोल सके, परन्तु अपनी सारी सेवकाई में आपका मार्गदर्शन प्राप्त कर सके|

प्रश्न:

25. रोमियों की पत्री में मूल प्रतिकूल प्रश्न क्या है और उनके उत्तर क्या है?

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