Waters of Life

Biblical Studies in Multiple Languages

Search in "Hindi":
Home -- Hindi -- Romans - 061 (The Secret of Deliverance and Salvation of the Children of Jacob)
This page in: -- Afrikaans -- Arabic -- Armenian -- Azeri -- Bengali -- Bulgarian -- Cebuano -- Chinese -- English -- French -- Georgian -- Hebrew -- HINDI -- Indonesian -- Malayalam -- Polish -- Portuguese -- Russian -- Serbian -- Spanish? -- Telugu -- Turkish -- Urdu? -- Yiddish

Previous Lesson -- Next Lesson

रोमियो – प्रभु हमारी धार्मिकता है|
पवित्र शास्त्र में लिखित रोमियों के नाम पौलुस प्रेरित की पत्री पर आधारित पाठ्यक्रम
भाग 2 - परमेश्वर की धार्मिकता याकूब की संतानों उनके अपने लोगों की कठोरता के बावजूद निश्चल है। (रोमियो 9:1 - 11:36)
5. परमेश्वर की धार्मिकता केवल विश्वास के द्वारा प्राप्त होती है, ना कि नियमों का पालन करने के द्वारा (रोमियो 11:1-36)

द) अन्तिम दिनों में याकूब की संतानों की मुक्ति और उद्धार का रहस्य (रोमियो 11:25-32)


रोमियो 11:25-32
25 हे भाइयों, कहीं ऐसा न हो, कि तुम अपने आप को बुद्धिमान समझ लो; इसलिये मैं नहीं चाहता कि तुम इस भेद से अनजान रहो, कि जब तक अन्यजातियां पूरी रीति से प्रवेश न कर लें, तब तक इस्‍त्राएल का एक भाग ऐसा ही कठोर रहेगा। 26 और इस रीति से सारा इस्‍त्राएल उद्धार पाएगा; जैसा लिखा है, कि छुड़ानेवाला सियोन से आएगा, और अभक्ति को याकूब से दूर करेगा। 27 और उन के साथ मेरी यही वाचा होगी, जब कि मैं उन के पापोंको दूर कर दूंगा। 28 वे सुसमाचार के भाव से तो तुम्हारे बैरी हैं, परन्‍तु चुन लिये जाने के भाव से बापदादोंके प्यारे हैं। 29 क्‍योंकि परमेश्वर आपके बरदानोंसे, और बुलाहट से कभी पीछे नहीं हटता। 30 क्‍योंकि जैसे तुम ने पहिले परमेश्वर की आज्ञा न मानी परन्‍तु अभी उन के आज्ञा न मानने से तुम पर दया हुई। 31 वैसे ही उन्‍होंने भी अब आज्ञा न मानी कि तुम पर जो दया होती है इस से उन पर भी दया हो। 32 क्‍योंकि परमेश्वर ने सब को आज्ञा न मानने के कारण बन्‍द कर रखा ताकि वह सब पर दया करे ।

पौलुस अपनी पत्री को प्राप्त करने वालों को अपने सगे भईयों के समान समझते थे और आपके कथन द्वारा आप स्वीकार करते थे कि जैसे परमेश्वर आपके पिता है वैसे ही उनके भी पिता है| नियतिवाद के बारे में सारे विचार अनुसंधान, और रिपोर्ट इस धारणा को कि “परमेश्वर महानतम है” सैद्धान्तिक रूप से पूरा नहीं कर सकती, परंतु हमारे चिर परिचित परमेश्वर हमारे जीवित प्रभु यीशु मसीह के पिता, हमारे स्वर्गीय पिता जो प्रेम और दया के सागर है द्वारा पूरा करती है|

इस खुलासे के बाद, पौलुस एक ऐसे रहस्य के बारे में बताते है जिसे वे स्वयं समझ नहीं पाये थे जब तक कि स्वर्गीय पिता ने स्पष्ट रूप से इसे उनके सामने प्रकट नहीं किया था| इसीलिए पौलुस ने सभी टीकाकारियों, प्रचारकों, और धर्मशास्त्रियों से आग्रह किया था कि याकूब के बच्चों के बारे में वे अपने विचारों को आगे ना लाए बल्कि परमेश्वर के वचन को ध्यानपूर्वक सुने एवं उस पर अमल करें| वह जो अपने विचारों का प्रचार करता है एक जोखिम लेता है, क्योंकि वह अपने आपको चतुर एवं दूरदर्शी समझता है, परंतु अति शीघ्र वह मार्ग भ्रष्ट हो जाता है; जबकि वह जो परमेश्वर के वचन को प्रार्थनापूर्वक आत्मसात करता है और पवित्र आत्मा की कही बातों को सुनता है, हमारे परमेश्वर हमारे स्वर्गीय पिता के प्रेम के रहस्य के ज्ञान में धीरे धीरे विकसित होता जाता है|

अन्तिम दिनों के संबध में जिस रहस्य के बारे में पौलुस कहते है, अनेक बातों को सम्मिलित करते है:

इस्राइलियों की कठोरता एक मोटे कपड़े के टेन्ट के समान है जो उसमे बैठे हुए लोगों की सूरज की किरणों से सुरक्षा करता, परंतु उनकी आँखों से दृष्टि और उनके कानो से सुनने की क्षमता को छिपा देता है| देखने की, पढ़ने की, सुनने की क्षमता होते हुए भी वे ना देख सकते थे; ना पढ़ सकते थे और ना सुन सकते थे (यशायाह 6: 9-10)| याकूब की संतानों में से सभी नहीं परंतु अधिकांश कठोर है| यीशु मसीह के शिष्यों, उपदेशकों और आरंभिक कलीसिया ने यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के मार्गदर्शन में गंभीरतापूर्वक प्रायश्चित किया था| उन्होंने, उन लोगों को मसीह के आगमन और उद्धार के लिए तैयार किया था और वे उनके समुदाय में रहे थे एवं उनकी दिव्य महिमा की रोशनी का अनुभव किया था|

यशायाह के अनुसार, मसीह के आने के 700 वर्ष पहले से लोगों में कठोरता आना शुरू हो गई थी, (यशायाह 6: 5-13), जिसकी पुष्टि यीशु ने की थी (गति 13:11-15) और पौलुस ने दुःख पूर्वक इसका वर्णन दिया था (प्रेरितों के कार्य 28: 26-28)| यह कठोरता सार्वजनिक आंतक के रूप में परिवर्तित हो गई जब उन्होंने अपने राजा को सूली पर चढाने के लिए रोमवासियों के हवाले कर दिया था, और पवित्र आत्मा के निवास को ठुकरा दिया था| तब रोमवासियों ने उन्हें दासों के रूप में विश्व के सभी हिस्सों में बेच दिया था|

यहूदियों की कठोरता हमेशा बनी हुई नहीं रहेगी| यह तब तक बनी रहेगी जब तक कि अन्य लोगों के विश्वासियों की संख्या पूरी ने हो जायेगी| जब अन्य लोगों के अपराधियों का बुलावा पूरा हो जायेगा, परमेश्वर यहूदियों को प्रायश्चित एव पुनर्जीवित होने का एक अन्तिम अवसर देंगे| परन्तु पूरा इस्राएल कौन है, अन्तिम दिनों में कौन बचाया जायेगा, कलीसियाओं और लोगों के इतिहास में किसके बारे में पौलुस एक प्रेरित विषय के समान कहते है? (ध्यान दे: वर्तमान शोध का राजनीती से कुछ संबध नहीं है| यह सिर्फ एक आध्यात्मिक शोध है)

अ) आज, यहूदियों के एक चौथाई इस्राएल राज्य में रहते है, जबकि तीन चौथाई 52 देशों में फ़ैल चुके है|
ब) क्या “पूरा इस्राएल” कथन रुढिवादी यहूदियों या उदारवादी यहूदियों जो धर्म के बारे में अधिक चिंतित नहीं रहते थे, की ओर संकेत करता है?
स) इस्राएल राज्य में ड्रुज, ईसाई और मुस्लिम रहते है, और जिनके पास इस्राइली पासपोर्ट है| क्या “पूरा इस्राएल” यह वाक्य उन् लोगों को भी सम्मिलित करता है? नहीं निश्चित ही वे इसमें शामिल नहीं है|
ड) परमेश्वर ने यशायाह को पहले से कहा था कि इस्राएल में से कोई भी सुरक्षित नहीं है सिवाय पवित्र शेषांश को छोडकर वह कहते है “जैसे बांज या बलूते वृक्ष, जो काटे जाने परभी उनका ठूठ बना रहता है, तों यह पवित्र बीज इनके ठूठ समान बने रहेंगे” (यशायाह 6: 11-13); जैसे कि उन लोगों के शेषांश पवित्र बीज पृथ्वी पर परमेश्वर की एक जीवित कलीसिया के समान बने रहेंगे| यह मसीह में उनके विश्वास, और उद्धार को दर्शाता है|
इ) परमेश्वर ने अपने सेवक यूहन्ना को अपने प्रकटीकरण में इस बात की घोषणा की थी कि उनकी परियों ने इस्राएल के बारह गोत्रों में से प्रत्येक गोत्र के बारह हजार व्यक्तियों पर अपनी मोहर लगाई होगी| इसलिए सभी गोत्र नहीं चुने गये परंतु कुछ चुनेहुओ पर मोहर लगी होगी और दान गोत्र बारह गोत्रों में नहीं गिना गया था, क्योंकि वह अपनी इच्छानुसार, परमेश्वर के मूसा और उसके लोगों के साथ किये गये समझोते से दूर चला गया था| केवल एक सौ चौवालीस हजार लोगों पर मोहर लगी थी, जबकि बचे हुए दूसरे लोग सुरक्षित नहीं है (यूहन्ना का प्रकाशित वाक्य 7: 4-8)
फ) रोम को लिखी गई अपनी पत्री में उपदेशक पौलुस लिखते है (2:28-29) कि अवश्य ही सभी यहूदी, यहूदी नहीं है परंतु एक यहूदी वह है, जो आंतरिक रूप से अपने हृदय के खतना द्वारा खतना किया हुआ है, और जिसने दुबारा जन्म लिया है| यद्यपि वे जो एक यहूदी माँ से उत्पन्न हुए है मानवीय रूप से यहूदी हैं परंतु आध्यात्मिक सत्य के अनुसार वे यहूदी नहीं है, जब तक कि वह मसीह के लहू और उनकी पवित्र आत्मा में दुबारा जन्म नहीं लेते| मसीह ने यूहन्ना को दो बार अपने प्रस्तुतिकरण में यह घोषित किया था (यूहन्ना का प्रकाशित वाक्य 2: 9; 3:9) कि कुछ यहूदी, यहूदी बिलकुल नहीं है|
ग) युहन्नारचित सुसमाचार एवं प्रस्तुतीकरण में हमने इस भविष्यवाणी को पढ़ा था कि ‘जिसे यहूदियों ने भोंक दिया था वे उसी का ध्यान रखोंगे’ यह भविष्यवाणी मसीह के द्वितीय आगमन के अन्तिम क्षण में बचे हुए लोगों के धर्म परिवर्तन की ओर संकेत करती है|
ह) उपदेशक यिर्मयाह ने साक्षी दी थी कि परमेश्वर दाऊद के घर और यरूशलेम के निवासियों पर अपने अनुग्रह की आत्मा उंडेल देंगे और विनती करंगे; तब वे लोग उस व्यक्ति की सेवा करंगे जिसे उन्होंने भोंक दिया था (यिर्मयाह 12: 10-14) यह भविष्य वाणी अन्तिम दिन यहूदियों के प्रायश्चित और टूटेपन की ओर संकेत करती है (मत्ती 23: 36-39)

सारांश: हमे यह दावा करने के लिए आवेश में नहीं आना चाहिए कि मसीह की दृष्टी में कौन सच्चा इस्राएली है| पवित्र बाईबिल हमें सिखाती है कि यह नं किसी राजनितिक व्यक्ति, या न एक निश्चित वंश की ओर, परंतु प्राथमिक रूप से एक आध्यात्मिक सत्य की ओर संकेत करती है| आजकल हम याकूब के बच्चों में से हजारों पुनर्जीवित लोगों को मध्य पूर्वी यूरोप और यू.एस.ऐ में मसीह के सच्चे चुने हुए और मसीह के आध्यात्मिक शरीर को पाते है| हम नहीं जानते कि यह संख्या कैसे बढ़ेगी, परन्तु हम जानते है कि वे अपने घरों में मसीह विरोधी लोगों के हाथों खुनी अत्याचार सहन करते है| यद्यपि मसीह स्वयं आत्मबलिदानियों की आत्माओं को इकटठा करेंगे, और अपने पवित्र सिहांसन तक ले जायेंगे (यूहन्ना का प्रकाशित वाक्य 13:7-10; 14:1-5)|

रोम को लिखी गई पौलुस की पत्री ने जिस किसी को भो गहराई तक भेद दिया है (11:26-27) वह इस बात का ध्यान रखे कि याकूब के बच्चों के उद्धार की यह भविष्यवाणियां कुछ निश्चित विवरण देती है|

अ) मुक्तिदाता, याकूब के बच्चों में से अविश्वास एवं दुराचारीपन को दूर भगा देते है|
ब) जैसा कि यिर्मयाह की पुस्तक में प्रकटित था, कि नए समझौते के अनुसार सभी को क्षमा मिली है (31:31-34)| यह नए समझौते का एक संकेत है; जिसे मसीह ने अपने शिष्यों के साथ बनाया था (मत्ति 26:26-28), और यह वादा पूरा हुआ था|

पौलुस इस बात के साक्षी थे कि धार्मिक यहूदी राज्य नए समझौते के कारण सुसमाचार के शत्रु बन गये थे| यद्यपि यह कठिनाई घृणित व्यक्तियों के लिए एक महान उपलब्धि का कारण थी क्योंकि वे मसीह के द्वारा उद्धार को पहचान चुके थे, और अपने विश्वास द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह को पकड़ चुके थे| ठीक उसी समय, अन्यजातियों के उपदेशक ने यहूदियों को इस बात की पुष्टि दी थी, जो कि रोम की कलीसिया के शत्रु थे, कि अभी भी वे, उनके पूर्वजों के विश्वास और विश्वसनीयता में उनकी चाहत के कारण परमेश्वर के प्रिय थे| अतः वह जो परमेश्वर द्वारा चुना गया है बिना किसी रूकावट के चुना हुआ रहता है, चाहे यदि उसने अपराध किया था अपने चुनाव को भी नामंजूर किया है| विश्वास के सभी आध्यात्मिक उपहार और विशेषाधिकार जो परमेश्वर ने प्रत्येक विश्वासी को दिए है, उस विश्वासी की अपरिवर्तनीय विश्वसनीयता से ही संबधित है|

(रोमियों 11:29) इसीलिए हमने कभी भी अपने चुनाब और अपने जीवन के पवित्रीकरण पर अविश्वास नहीं करना चाहिए, जैसे एक बच्चा अपने पिता द्वारा कही गई बात पर विश्वास करता है|

रोमियों 11:30-31 में पौलुस अपनी पत्री के दूसरे भाग के वास्तविक रूप एवं उद्देश्य को, याकूब के बच्चों के उद्धार को ध्यान में रखते हुए दोहराते हैं| रोम की कलीसिया के दुश्मनों के दिमागों में आप दबावपूर्वक इन सिद्धांतों को डालने का प्रयास करते हैं|

अ) तुम नए विश्वासी, भूतपूर्व अविश्वासी, परमेश्वर के अवज्ञाकारी और अपराधी थे|
ब) अब तुम परमेश्वर की दया और अनुग्रह को यीशु मसीह द्वारा और उनमे तुम्हारे विश्वास द्वारा प्राप्त कर चुके हो|
स) यहूदियों के अवज्ञाकारी, और उनके द्वारा परमेश्वर के पुत्र के ठुकराये जाने के कारण उद्धार प्राप्त करना संभव हो पाया था|
द) इसलिए, यहूदी अवज्ञाकारी और अपराधी बन गये क्योकि परमेश्वर की दया, जिसे तुमने बचानेवाले विश्वास द्वारा स्वीकार किया था, तुमको दी जा चुकी है|
ई) वे भी अनगिनत दया प्राप्त कर पाये होंगे|

परिणामस्वरूप, रोम को लिखी पौलुस की पत्री के दूसरे भाग को समझाने की इच्छा जो रखता है, उसने इन सिद्धांतों को गहराई तक आत्मसात कर लेना चाहिए, और इन खोये हुए लोगों के लिए, इन सिद्धांतों को प्रार्थनाओं एवं विनतियों में परिवर्तित कर देना चाहिए|

पौलुस ने प्रतिभाशाली ढंग से इन सिद्धांतों पर ध्यान दिया, और परमेश्वर की स्तुति एवं प्रशंसा करने के लिए नीव के समान मजबूती से बिछा दिया था| आपने पवित्र एकमात्र परमेश्वर की अतिरंजना की क्योंकि उन्होंने यहूदियों को अवज्ञाकरीपन एवं विद्रोह में गिरने की अनुमति दीथी ताकि वे दुबारा उन पर दया कर पाये होंगे यदि उन लोगों ने उनके लिए तैयार किये गये उद्धार को विश्वास द्वारा प्राप्त कर लिया था (रोमियों 11:32)|

पौलुस प्रत्येक व्यक्ति के लिए पूर्णतया संधिकरण का प्रचार नही करते, यह कहकर कि परमेश्वर अन्तिम दिनों में अपने प्रेम के कारण सभी अपराधियों को बचायेगें, और नर्क को ईश्वरनिन्दकों से रिक्त कर देंगे जो बचना चाहते हो या ना चाहते हो| यह उन लोगों का विश्वास है जो चाहते है कि परमेश्वर शैतान को बचाये और फिर वे लोग शैतान की आराधना करे और शैतान के साथ स्वर्ग में प्रवेश करें| यह परंतु भ्रम और अहंकार है, क्यों कि परमेश्वर प्रेम एवं सत्य है, और उनका न्याय अदृश्य है|

पौलुस आशा करते थे कि सभी यहूदी प्रायश्चित करेंगे और अपने रक्षक में विश्वास द्वारा बचाए जायेंगे, जबकि मसीह इस संबध में अधिक मर्यादित थे| न्याय के दिन वे उन सब से जो गरीब लोगों से प्रेम नहीं करते, पुनरुत्थान के अनुसार कहेंगे: “मुझसे दूर हो जाओ, तुम श्रापित लोग और उस अनन्त ज्वाला जो शैतान और उसकी परियों के लिए तैयार की गई थी, में चले जाओं (मत्ती 25:41)| यूहन्ना का प्रस्तुतीकरण भी इस डरावने सत्य की पुष्टि करता है (पुनरुत्थान 14:9-14; 10, 15, 21:8)|

प्रार्थना: ओ हमारे पिता जो स्वर्ग में है, हम आनंदित है और खुश है क्योंकि आपके वादे सत्य है और हमेशा पूरे होते है| हम आपका धन्यवाद करते हैं याकूब के बच्चों के प्रत्येक वंश में से पवित्र शेषाशों के लिए, जिन्होंने गंभीरतापूर्वक प्रायश्चित किया है मसीह के प्रायश्चित को स्वीकार किया है और शांति के उपहार को प्राप्त किया है| हमारी और हमारे लोगों की मदद करें, आपकी पवित्र आत्मा की शक्ति में चलने, उसकी शक्ति द्वारा आपकी आयतों का पालन करने, और हमारे प्रिय मुक्तिदाता के आने का इंतजार करने के लिए|

प्रश्न:

77. परमेश्वर के वादे क्यों असफल नहीं होते, परन्तु चिरस्थायी रहते है?
78. कौन पूर्णतः अन्ध्यात्मिक इस्राएल है?

www.Waters-of-Life.net

Page last modified on March 05, 2015, at 11:58 AM | powered by PmWiki (pmwiki-2.2.109)