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रोमियो – प्रभु हमारी धार्मिकता है|
पवित्र शास्त्र में लिखित रोमियों के नाम पौलुस प्रेरित की पत्री पर आधारित पाठ्यक्रम

प्रस्तावना


रोमियो के नाम पौलुस प्रेरित की पत्री की प्रस्तावना

मृतकों में से जी उठे हुवे प्रभु मसीह ने अपने राजदूत पौलुस को रोम की राजधानी के रहवासियों के नाम एक महत्वपूर्ण पत्री लिखने के लिए प्रभावित किया.यह पत्री मसीह की कलीसिया के लिए उनकी तरफसे एक महान भेंट है.

पत्री लिखने का कारण एव् उद्देश्य

उस समाय तक अन्यजातियों के उपदेशक पौलुस आसिया मायनर और युनान राज्यों में तीन बार धर्म प्रचार की यात्रा कर चुके थे| इन प्रचार यात्राओं के समय उन्हों ने मुख्य शहरों में जीवित कलीसियाएं स्थापीत कीं, प्रेम भरे कार्य करने के लिए विश्वासियों को कायम किया और कलीसिया की सेवा करने के लिए वृद्ध व्यक्तियों, याजकों, महायाजको एवम को नियुक्त किया| तब उन्हों ने देखा की रूमी महासागर के उत्तरी भाग में उन का कार्य समाप्त हो चुका है इसलिए वे फ़्रांस और इसपानिया में प्रभु यीशु मसीह का राज्य स्थापित करने के लिए पश्चिम की ओर चले गए (रोमियों 15:22-24)|

अपनी योजनाओं को सफल करने के लिए उन्होंने अपनी यह सुप्रसिद्ध पत्री रोम की कलीसिया के नाम लिखी, ताकि आप में उन लोगों के विश्वास को प्रोत्साहन मिले| पौलुस उन लोगों को अपने हाथों में दिए हुऐ सुसमाचार का ध्यानपूर्वक निरंतर अध्ययन कराकर यह स्पष्ट कर देना चाहते थे कि आप सब अन्यजातियों के लिए प्रभु यीशु मसीह के प्रेरित थे| जैसेकि सीरीया के अन्ताकिया कलीसियाओं में उनकी यात्रा, प्रचार और दुखः में लोगों ने अपनी विश्वासी प्रार्थना के द्वारा उनकी सहायता की थी, वे उनके ह्रदय को छूना चाहते थे जिससे यह लोग आप के पश्चिमी देशों की धर्म प्रचार की यात्राओं में सहभागी होते जैसे की सूरिया राज्य में स्थित अन्ताकिया की कलीसिया ने अपनी विश्वसनीय और प्रभावित प्रार्थनाओं के द्वारा आपकी यात्राओं, प्रचार और कठिनाइयों के समय मदद की थी. इस लिए रोमियों के नाम लिखी हुई पत्री में हम केवल प्राथमिक शिक्षा पाते है जिस का उद्देश कलीसिया को सच्चे विश्वास में कायम होने के लिए प्रोत्साहन देना और उसे सब के साथ मिलकर जगत में सुसमाचार का प्रचार करने के लिए तैयार करना था.

रोम में कलीसिया किसने स्थापित की थी?

ना तो पौलुस, ना ही पतरस, ना ही किसी अन्य प्रेरित या किसी प्रसिद्ध वृद्ध व्यक्ति ने रोम में कलीसिया की स्थापना की थी| परन्तु वह रोम के कुछ तीर्थ यात्री थे जो पिन्तेकुस्त के दिन उस पवित्र स्थान (यरूशलेम) आए थे जहाँ यीशु ने उन लोगों पर पवित्र आत्मा उंढेल दिया था और उन्हें अपने पापों से पछतावा हुआ और उन्होंने प्रायश्चित करते हुए प्रार्थनाएँ की थीं| उनकी ज़बानें सर्व शक्तिशाली परमेश्वर के महान कार्यों की चर्चा करने लगीं. इसके बाद वे मुख्य नगर, रोम वापस चले गए और वहाँ अपनी सभाओं में सर्व शक्तिमान यीशु मसीह, जिन्हें क्रूस पर चढ़ाया गया था, के बारे में गवाही दी| वे अपने यहूदी और अन्य जातियों के मित्रों के साथ उस सर्व शक्तिशाली यीशु की तरफ से मिलने वाले उद्धार के बारेमे बातें करने लगे एवं उनके घरों में संगतियाँ (लोग समूह) बनाकर पुराने नियम में यीशु मसीह के बारेमे की गई भविष्य वाणियों के बारे में अध्ययन करने लगे|

आसिया और यूनान की यात्रा करते समए प्रेरित पौलुस रोम के उन विश्वासियों से बार बार मिलते रहे थे| विशेष रूप से सन 54 के पहले जब राजा क्लोदियुस कैसर ने यहुदिओं को देश से निकाल दिया था (प्रेरितों के काम 18:2)| पौलुस खुद रोम की कलिसीया से परिचित होना चाहते थे और उन में से जो प्रभु में कार्य कर रहे थे उन्हें पवित्र आत्मा का उपहार देना चाहते थे. आप को रोम में एक जीवित, स्वतंत्र कलीसिया मिली थी इसलिए उनके विचार के अनुसार उन्हें जगत की राजधानी में अधिक समय तक रहने की आवश्यकता नहीं थी. इसलिए आप अपने पथ पर प्रभु में उन भाईयों के साथ जाना चाहते थे, ताके आस पास के विभागों में उद्धारता के सुसमाचार का प्रचार करते.|

यह पत्री किसने, कब और किस जगह से लिखी?

सन 58 A.D. में जब प्रेरित पौलुस कुरिन्थ में गायस के घर में ठहरे हुए थे तब आपने यह पत्री लिखी थी जिसमे आप ने अपने आत्मिक अनुभव और प्रेरित ज्ञान का संक्षिप्त वर्णन किया है| इस पत्री में उन्हों ने लिखने का ऐसा अनोखा तरीका अपनाया है जो कोई और व्यक्ति नहीं अपना सकता. पौलुस को यह कर पाना इस लिए संभव हो सका क्योंकि जीवित और महिमामय यीशु को आपने स्वयं उनके रास्ते में खड़ा पाया. यह घटना उस समय हुई जब पौलुस मूसा के धार्मिक कानून (शरियत) का उत्साह से पालन करते हुवे मसीहियों को अधिकतम कष्ट देने के लिए वो दमिश्क जा रहे थे तब एक उज्ज्वलित दिव्य प्रकाश ने उन कि आँखों को चकाचौंध कर दिया. तब आप उस महान सच को समझ सके कि नासरत के येशु जिन्हें तुच्छ जाना जाता था, जीवित हैं और वे ही महिमा से परिपूर्ण प्रभु हैं और उन्हें क्रूस पर चढाये जाने के बाद भी वे कबर में दूषित नहीं हुए| वस्तुतः यीशु ने मृत्यु पर विजय पाई और सच मुच मृतकों में से जी उठे और अपने आप को सर्वशक्तिमान सिद्ध किया जिसे हर वस्तु पर नियंत्रण है| तब पौलुस समझ पाए की परमेश्वर के पुत्र ने अपने सताने वाले को न सजा दी और न उसका नाश किया बल्की उसपर दया कर के उसे सेवा कार्यों के लिए बुलाया इस लिए नहीं, की वह इस के योग्य थे, परन्तु केवेल अपने अनुग्रह के अनुसार| इसलिय अतिउत्साही और धार्मिक पौलुस का दिल टूट गया और वह परेशांन हो गए| उन्होंने प्रभु के अनुग्रह और धार्मिकता के इस नए तत्व पर विश्वास किया| वे अब और अधिक समय तक कानून के अनुसार किये गए मानवीय कार्यों पर निर्भर न रह सके बल्की वे मसीह के दिव्य प्रेम में आपके सेवक के रूप में सारे जगत के बहके हुए और भ्रष्ट लोगों का परमेश्वर से मिलाप कराने के लिए निकल पड़े.

इस पत्री की विशेष शैलियाँ क्या हैं?

पौलुस रोम कि कलीसिया के हर सदस्य को उस में आये हुए धार्मिक परिवर्तन के बारे में बताना चाहते हैं, लेकिन इस के लिए उन्होंने किसी सुन्दर और शुद्ध भाषा में कोई किताब लिखी न किसी लंबी तुलनात्मक चर्चा का प्रयोग किया| वस्तुतः उन्होंने इस पत्री को सरलता और सफाई से लिखा था| एवम उसमें उन प्रश्नों के उत्तर दिए थे जिनकी आप को यहूदियों और रोम वासियों से पूछे जाने की आशा थी| पौलुस ने अपनी यह पत्री प्रभु में अपने भाई तिरतियुस के हाथों उन लोगों के नाम लिखवाई जिन के नाम उन की समृति में थे| एक स्थान पर उन्होंने नए विश्वासियों को संबोधित करते हुए उनकी प्रभु की पवित्र करने वाली शुध्धता के बारे में ऊपरी जानकारी को गहराई तक पहुचाने का प्रयत्न किया| इस के बाद उन्होंने उन लोगों कि तरफ ध्यान दिया जिन का विश्वास टूट चुका था और उन्हें यीशु मसीह के द्वारा मिलने वाली पूर्ण धार्मिकता प्राप्त करने के लिए कहा क्योंकी लोगों के लिए यीशु ही एक मात्र आशा के स्त्रोत हैं| एक दूसरे स्थान पर उन्होंने अभिमानी कानून के रक्षकों को झंझोड कर उन की झूटी धार्मिकता चूर चूर कर दिया और उन्हें उनकी भ्रष्टता और असफलता बताई और उन्हें यह भी बताया कि वह किस तरह अपने नम्र विश्वास के कारण, पवित्र आत्मा की आज्ञा के पालन के अनुसार, प्रभु के प्रेम के धार्मिक कार्य के लिए उत्सर्ग किये गए थे| तदनुसार अपनी इस पत्री में प्रेरित पौलुस ने साधारण, शांत शिक्षा को प्रभावशाली सुसमाचार के प्रचार से जोड़ दिया. आपने किसी निश्चित समाज को ही नहीं परन्तु सभी सुननेवालों, जैसे यहूदी और अन्य जाती के लोग, बूढ़े और जवान, विद्वान और अनपढ़, बंधनों में जकड़े हुए और स्वतन्त्र, पुरुष और महिलायें, सभी को सम्बोधित किया था| रोमियों के नाम लिखी गयी पत्री आज भी मसीही धर्म के शिक्षाक्रम में प्रथम क्रम रखती है, जैसे की डॉ.मार्टिन लूथर ने अपने इस बयान में गवाही दी “यह पुस्तक नए नियम का अहम भाग है जो अमिश्रित और स्पष्ट सुसमाचार है जिसे प्रत्येक मसीही स्मरण करे और इसे एक आत्मिक खजाने कि तरह हर रोज उपयोग में लाता रहे क्यों कि इस पत्री में ऐसे कई विषयों पर चर्चा कि गई है जिन्हें हर विश्वासी को जानना चहिये जैसे नियम और सुसमाचार, पाप और न्याय, अनुग्रह और विश्वास, धार्मिकता और सच, यीशु मसीह और परमेश्वर, अच्छे कार्य और प्रेम, आशा और क्रूस| हम यह भी जान सकते है कि हम हर व्यक्ति के साथ किस प्रकार से व्यवहार करें, चाहे वह व्यक्ति कितना ही धार्मिक या पापी, बलवान या कमजोर, मित्र या अजनबी हो और साथ ही यह भी कि हम स्वयं अपना जीवन किस प्रकार से सुधारें| इस लिए सब मसीहियों को सुझाव देता हूँ की वह इस पत्री कि शिक्षा के अनुसार अपने आप को प्रशिक्षण दें|”

प्रिय भाई, यदि तुम अपने विश्वास का निकटतम अध्ययन और प्रशिक्षण करना चाहते हो, तो रोमियों के नाम लिखी हुई इस पत्री का चिंतन करो और सावधानी से उसका अध्ययन करो| यह एक प्रकार से प्रभु का विश्व विद्यालय है जो ज्ञान, शक्ति और आत्मा से भरा हुआ है| तब यीशु तुम्हे तुम्हारे अभिमान एवं आत्मविश्वास से छुटकारा दिला कर तुम्हे सम्पूर्ण धार्मिकता में स्थापित करेंगे जिससे तुम दैवीय प्रेम के काम करने के लिए शक्तिशाली सेवक बन जाओ और विश्वास में दिन-ब-दिन बढते जाओ|

रोमियों की पत्री का विश्लेण

रोमियों 1:1-17 -- रोम की कलीसिया से लेखक का परिचय| प्रेरित कि तरफ से प्रार्थना और आशीषें, प्रभु कि धार्मिकता का प्रस्तुतीकरण, पौलुस की पत्री का मुख्य प्रतीक है|

भाग 1- प्रभु की धार्मिकता हमें धार्मिक ठहरती है.

रोमियों 1:18-3:23 -- हम सभी पापी हैं और नियम के अनुसार, प्रभु हमें निसंदेह दंड देंगे जो हमारे घमंड को तोड़ देता है|
रोमियों 3:24-4:25 -- यीशु मसीह ने लोगों को पापों से मुक्ति दिलाने के लिए किये हुए कार्य के अनुसार प्रभु सब लोगों को पूर्णता धार्मिक ठहराएंगे, यदि वे यीशु पर विश्वास करें|
रोमियों 5:1-8:39 -- प्रभु की आत्मा विश्वासियों में निवास करती है, उन्हें आशा दिलाती है, पापों पर विजय भी दिलाती है और वे नियमों से स्वतन्त्र हो कर आत्मा की शक्ति में चलते हैं|

भाग 2 - इतिहास में प्रभु की धार्मिकता

रोमियों 9:1-11:36 -- पुराने नियम के अनुसार जीने वाले लोगों ने प्रभु के अनुग्रह को ठुकराया, फिर भी आप की धार्मिकता जरी रही|

भाग 3 – प्रभु की धार्मिकता का व्यवहार में प्रयोग

रोमियों 12:1-16:27 -- सच्चा विश्वास हमारे स्वभाव और जीवन को प्रेम के कार्यों और आपसी अद्न्यपालन और नम्रता में बदल देता है|

इसा पत्री का अध्यन कोई सरल कार्य नहीं है. इसके लिए तुम्हारा सावधानी पूर्वक निरीक्षण, प्रार्थनाये और विचारवान चिंतन आवश्यक है ताकि तुम इसकी आशीषो का आनंद ले सको, ईमानदारी से अपने पापों की क्षमा मांग सको, अपने ह्रदय और दिमाग का नवीकरण कर सको और मसीह में अपने जीवन का नया क्षितिज देखो| इस पत्री ने रोम वासियों को धार्मिक दृष्टी से सुस्त नहीं बनाया परन्तु उन्हें उनके आसपास के विभागों और अन्य देशो में सुसमाचार का प्रचार करने के लिए तैयार किया, इसी तरह यीशु मसीह तुम्हे निमंत्रण देते हैं की तुम भी आप के अनुग्रह से भर जाओ ताकी वे तुम्हें तुम्हारे धार्मिक भाईओं के साथ उन लोगों के पास भेज सकें, जो प्रेम और आशा से खाली हैं| इस लिए सुनो, प्रार्थना करो और जाओ|

प्रश्न

1. रोमियों के नाम लिखी गयी पत्री का कारण और अंत क्या है?
2. रोम में कलीसिया की स्थापना किस ने की थी?
3. यह पत्री किसने, कब और कहाँ लिखी थी?
4. पौलुस ने अपनी पत्री में कौनसी शैलियों का उपयोग किया?
5. इस पत्री की रूपरेखा क्या है?

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