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Home -- Hindi -- The Ten Commandments -- 04 Second Commandment: Do Not Make Idols

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विषय ६: दस आज्ञाएँ - परमेश्वर की सुरक्षा करने वाली दीवार जो मनुष्य को गिरने से बचाती हैं|
सुसमाचार की रोशनी में निर्गमन २० में दस आज्ञाओं का स्पष्टीकरण

IV. दूसरी आज्ञा: मूर्तियां ना बना



निर्गमन २०: ४-६
तुम्हे कोई भी मूर्ति नहीं बनानी चाहिए| किसी भी उस चीज की आकृती मत बनाओ जो ऊपर आकाश में या नीचे धरती पर अथवा धरती के नीचे पानी में हो| किसी भी प्रकार की मूर्ति की पूजा मत करो, उसके आगे मत झुको| क्यों? क्योंकि मै तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूँ| मेरे लोग जो दूसरे देवताओं की पूजा करते है मैं उनसे घृणा करता हूँ| यदि कोई व्यक्ति मेरे विरुद्ध पाप करता है तो मैं उसका शत्रु हो जाता हूँ| मै उस व्यक्ति की संतानों की तीसरी और चौथी पीढ़ी तक को दण्ड दूँगा| किन्तु मैं उन व्यक्तियों पर बहुत कृपालु रहूँगा जो मुझसे प्रेम करेंगे और मेरे आदेशों को मानेंगे| मैं उनके परिवारों के प्रति सहस्त्रों पीढ़ी तक कृपालु रहूंगा|

दूसरी आज्ञा पहली आज्ञा की पूरक और विस्तार है| इस कारण से, यह कुछ हठधर्मी पद्धतियों द्वारा पहली आज्ञा के एक हिस्से के रूप में मानी जाती थी| अब तक भी कुछ टीकाकार दूसरी आज्ञा को एक अत्यधिक कठिन आज्ञा के रूप में देखते हैं क्योंकि प्रायः ही यह विशाल गलतफहमी की वस्तु रही है|


०४.१ -- ईसाई छबि का विरोध

मुस्लिम और यहूदी अधिकांश ईसाईयों पर सर्वोच्च शक्ति की आज्ञा को तोड़ने का दोष लगाते हैं| वे हम पर आरोप लगाते है, | “तुम ही तो वह हो जो परमेश्वर की विशेष आज्ञा को तोड़ते हो| तुमने सर्वशक्तिमान की सभी प्रकार की छबियों को रंग दिया और लोगो के सामने, जो तुम्हारी अपर्याप्त काल्पनिकता ने निर्माण किया प्रस्तुत किया है|” इस आज्ञा का उपयुक्त प्रयोग, ईसाई संप्रदाय के लोगो के बीच एक महान विवाद का कारण है| कुछ गिरजाघरों के सदस्य टूट कर अलग कलीसियाओं में परिवर्तित हो गए और उनकी पवित्र वस्तुओं को भी जला कर नष्ट कर दिया था| हमें स्वीकार करना चाहिए कि परमेश्वर अपनी महिमा में चित्रित नहीं किये जा सकते| कोई भी चित्र परमेश्वर का उपहास और उनकी दैवीय गौरव का तिरस्कार करता है| साधुओं या देवदूतों के चित्र प्रायः निरर्थक है| हमारी कल्पनाशक्ति हमें जो सन्देश देती है उसकी अपेक्षा परमेश्वर कही अधिक उच्चकोटि के, पवित्र, अत्यधिक सर्वशक्तिमान हैं| मनुष्य जो चित्रित कर सकता है उससे वे पूरी तरह से अलग हैं| इसमें यहाँ तक कि बहुत अच्छी चित्रकला करने वाले मैकलेंजलो जैसे कलाकार भी सम्मिलित हैं|

परमेश्वर ने अपने आपको, बाईबिल में दो प्रकार से प्रकटित किया है| पहले उन्होंने अपने आपको शब्द द्वारा जो उन्होंने सुननेवालों को कहा है और दूसरी बार पैगबर को एक दृश्य द्वारा प्रकट किया था| पुराने नियम में परमेश्वर ने अपने आप को अधिकतर अपने सामर्थ्यवान शब्द द्वारा, और कम बार दिव्य दर्शन द्वारा प्रकट किया था| परंतु जब परमेश्वर के पुत्र उपदेशकों के सामने अपनी मूल महिमान्वित रूप में परिवर्तित हुए, तब सभी उपदेशक मृतकों के समान जमीन पर गिर पड़े क्योंकि दैवीय पवित्रता प्रकट हुई थी और उन लोगों की उनकी अस्व्च्छ्ताओं के कारण निंदा हुई थी| जिसने भी दर्शन किया था वह इस योग्य नहीं था कि जो देखा था उसे पूर्णरूप से बता पाये| वे केवल एक प्रतिमा के रूप में उसका वर्णन कर पाये होंगे|


०४.२ -- मूर्तियों और प्रतिमाओं की आराधना का विरोध

यदि हम दूसरी आज्ञा को ध्यानपूर्वक परखें, हम देख सकते हैं कि यह हमें परमेश्वर के चित्र बनाने की अनुमति नहीं देती है| निश्चित ही, यह हमें प्रत्येक प्रकार की मूर्तिपूजा के विरोध में सतर्क करती है | वह जो अन्य ईश्वरों, मूर्तियों, या तराशी हुई प्रतिमाओं की पूजा या आदर करते हैं, उनके रोष की वस्तु हैं |

पुराने नियम के कालों में पूर्व दिशा के निकट पर्वतों के शिखर पर बड़ी तराशी हुई मूर्तियां खड़ी थी| वे पत्थरों की बनी हुई थी और सार्वजानिक पूजा के लिए उनका उपयोग था| उस समय लकडी, पत्थर, चांदी या सोने की मूर्तियां भी घरों में थी जो कि पूजी जाती थी| परंतु जो कोई भी सच्चे और एक मात्र परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता , उनके जाने के लिए द्वार खोलता है और तब बुरी आत्माएं शीघ्रतापूर्वक अंदर आ जाती हैं| यीशु के समय यहूदी अपने देवताओं के सामने भीड़ लगा कर, भोगविलास में लिप्त रहते थे |इसके पहले मिस्रवासियों,सीरीयावासियों और बेबीलोनवासियों ने भी यही किया था |ईसीलिए मूसा और दूसरे उपदेशक मूर्तिपूजा के विरूद्ध एक भयानक युद्ध में लग गये थे | आज हम इन मूर्तियों को, जो उपदेशको द्वारा प्रचीनकाल में श्रापित थी कैरो, बगदाद और बेईरुत के संग्रहालय में देख सकते हैं| वे पर्यटकों के आकर्षण का विषय बन गये थे, जिनके जूते एक्रोपोलिस और राजाओं के मकबरों की सीढीयां चढते हुए, प्राचीन यहूदी और मिस्रवासियों के जूतों की अपेक्षा बहुत अधिक घिस गये| लोग उन अनदेखे दृश्य को देखने का प्रयास करते है और प्रायः परमेश्वर के वचन के प्रचार से संतुष्ट नहीं हैं| मनुष्य जो सुनता है उससे अधिक देखना चाहता है| अनदेखी और अनछुई बाते उसके लिए परदेसी रहती है| यह भी एक कारण है कि दूरदर्शन उन लोगों के लिए प्रलोभन है जो दूसरी आज्ञा का पालन करना चाहते हैं|


०४.३ -- यहूदियों एवं मुस्लिमों द्वारा प्रतिमाओं पर प्रतिबंध

मुस्लिम समाज में दूरदर्शन, वीडियो और पत्रिकाएँ तीव्रगति से आनंद के साथ, उन प्रतिमाओं को जो १,३५० वर्षों पूर्व प्रतिबंधित किये गये थे, आत्मसात करते जा रहे हैं| किसी भी चित्र पर यह प्रतिबंध अरबी सजावट की कला का नेतृत्व करता है, जिसके प्रमाण सऊदी अरेबिया की इस्लामिक संस्कृति में, चीन की मस्जिदों में, मोराको के दुर्गों में और दक्षिणी अफ्रीका में है| दूसरी आज्ञा का मुस्लिम लोगों पर असर कागज, लकडी, धातु और पत्थर पर, फूलो और बगीचों की ज्यामितीय आकारों में उनकी चित्रकारी में देखा जा सकता है| विशेष रूप से पूर्वीय गलीचे, जिसमे बगीचों या स्वर्ग का प्रतीकात्मक भव्य रूपांकन, पूरे विश्व में अत्यधिक रूप से सराहा जाता है|

सऊदी अरेबिया में मुस्लिम लोगों ने बिना सिर वाले एक आदमी की आकृति का उपयोग एक चौराहे पर एक पैदल चलने वाले व्यक्ति का संकेत देने के लिए करना चाहिए | आज भी सिर का चित्र बनाना क़ानूनी रूप से ठीक नहीं है |परन्तु ईरान, तुर्की और भारत के मुस्लिम,कुरान में इस प्रतिबन्ध से अत्यधिक रूप से बंधा हुआ अनुभव नहीं करते हैं | यहाँ तक कि वे मुहम्मद और जिब्रैइल के चित्र बनाते हैं, जोकि आज तक भी अरब मुस्लिमों के लिए गैरकानूनी है | जब एक अरब देश में, कुछ ही समय पहले मुहम्मद के बारे में एक चलचित्र बनाया गया, उन्होंने उसमें उनका चेहरा दिखाया ही नहीं है | पूरी फ़िल्म इस प्रकार से है जैसे मुहम्मद ने अपनी आखों सारे दृश्य देखे और अपनी स्वयं की आवाज में बोले थे वह एक व्यक्ति के रूप में दिखाई नहीं दिए थे | इस कारण से ईसाई फ़िल्म निर्माताओ ने इस बारे में ध्यान देना चाहिए जब वे मुस्लिमों के लिए, देवदूतों, परमेश्वर के उपदेशकों या मसीह के चलचित्र प्रस्तुत करते है |

यहूदी भी दूसरी आज्ञा का नियमबद्ध रूप से परमेश्वर की प्रतिमाओं की चित्रकारी न करते हुए पालन करते हैं |जब तीतुस रोमियो के प्रमुख ने यरूशलेम पर ७०ईसवी सन में,अधिकार कर लिया और वह मंदिर में गया, वह पवित्रों के पवित्र स्थान पर गया इस आशा के साथ कि उसे वहाँ एक सोने की मूर्ति या कीमती बर्तन मिलेंगे | वह निराश हो गया था | पवित्रों के पवित्र रिक्त थे क्योंकि परमेश्वर आत्मा है कोई सामग्री नहीं है| वह एक आकृति या मूर्ति में सीमित या स्थापित नहीं किये जा सकते हैं |


०४.४ -- क्या मसीह के चित्र शास्त्र के विपरीत हैं?

ईसाई लोग दूसरी आज्ञा की व्याख्या यहूदियों, मुस्लिम लोगो के समान नहीं करते हैं | मसीह जन्म लेकर एक मनुष्य बने थे | प्रत्येक आँख उन्हें देख सकी होगी |उन्होंने कहा था,”यीशु ने उस से कहा ;हे फिलिप्पुस,मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूँ,और क्या तू मुझे नहीं जानता ? जिस ने मुझे देखा है उस ने पिता को देखा है: तू क्यों कहता है कि पिता को हमें दिखा |” ( यूहन्ना १४ :९) | निर्माण का उद्देश्य मसीह में आ चुका था |पवित्र शास्त्र ने घोषित किया है,” तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टी की| (उत्पति १ :२७)|” आदम और हवा परमेश्वर का प्रतिनिधत्व करने के लिए निर्वाचित किए गये थे | मनुष्य की छबि आज तक भी परमेश्वर की महिमा को दर्शाने का साधन है |

हमें यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि हम परमेश्वर की रचना का आंनद ले पायें और उनके फूलों, जानवरों और लोगों के चित्र बना सकें| परन्तु हमें कभी उनको ईश्वर के समान नहीं मानना चाहिए ना ही उनकी पूजा करनी चाहिए | सभी प्राणी,प्राणी ही रहें | वे स्वयं निर्माता के स्तर तक नहीं पहुंचते, और ना ही उनकी आराधना की जानी चाहिए | मनुष्य में परमेश्वर की छबि, उसके अपराध में गिरने के बाद विकृत हो गई थी, जब बुराई ने हमारे संसार में परिगमन किया था | परन्तु यीशु, दूसरे आदम,मनुष्य में परमेश्वर की छबि को पूर्व स्थिति में लाए | इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि पौलुस ने यीशु को “ परमेश्वर की अदृश्य छबि “कहा था ( कुल्लिसियों १:१५ )

सभी लोगों के लिए यीशु ने जन्म लिया, मर गये और फिर जी उठे | तो प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है कि अपने विचारों के अनुसार,अफ़्रीकी, एशियाई, यूरोपीय या पूर्वी नाक नक़्शे में उनको चित्रित करें | सभी संस्कृतियों में वह मनुष्य के रूप में परमेश्वर की छबि हैं |उनका आनंद, शांति और धैर्य सैधांतिक नहीं परन्तु व्यवहारिक था | मसीह में परमेश्वर हम तक खींचे चले आये | वे ना तो भयानक सर्वोच्च सेनापति के रूप में, ना ही किसी घृणित चेहरे के रूप में सामने आये बल्कि परमेश्वर के नम्र भेड के समान, जो हमारे स्थान पर स्वयं परमेश्वर के क्रोध को सहन करने और और हमारे अपराधों के लिए स्वयं मरने के लिए तैयार थे, सामने आये ताकि हम हमेशा उनके साथ जिएं उन्होंने हमें बलिदान का अर्थ सिखाया है | सूली दैवीय प्रेम का एक प्रतीक बन गया है | कब्र से यीशु का पुनरुत्थान, उनके प्रकटीकरण में पूरा हुआ था,जिसने हमें उनका आत्मिक किन्तु मूर्तरूप दिखाया था |(लूक २४ :३९ )


०४.५ -- मसीह के अनुयायियों में मसीह की छबि

यीशु ने अपने अनुयायियों के हृदयों को अपनी सौम्य आत्मा से भर दिया था इसलिए कि परमेश्वर का प्रेम, पवित्रता और आनंद उनमें दिखाई दे |उन्होंने घृणा एंव मृत्यु से भरे हुए इस जगत के बीच हमें परमेश्वर की छबि के रूप में नियुक्त किया था | उन्होंने हमें हमारे परिवारों, पड़ोसियों और मित्रों से हमारे व्यवहार द्वारा बात करते हुए “मसीह के पत्र “ बन कर जीवन जीने का विशेषाधिकार दिया है | यीशु ने अपना स्वयं का चित्र हममें डाल दिया है ताकि हम उनकी विशेषताओं को दर्शा पायें |जो कोई भी यीशु के सक्रिय अनुयायियों से अफ्रीका, एशिया, या अमेरिका या जहां भी मिलता है, उसका ध्यान इस ओर जाता है और वह मसीह की शांति की रोशनी को उनके चेहरे पर पहचान पाता है | जब सूली पर चढ़ाये गये और जी उठने वाले प्रभु यीशु की आत्मा किसी के भी,अमीर या गरीब, पढ़ा लिखा या अनपढ़, वृद्ध या जवान, हृदय में निवास करता है, वह मनुष्य स्वर्गीय जगत की चतुरता को दर्शाता है | इस संसार के लोगों को गरीब या अमीर, पूंजीपति या समाजवादी की श्रेणियों में रखना ही पर्याप्त नहीं है, इसके बदले में उनको जो फिर से जन्म ले चुके और जो अपराध में मर गये, इस श्रेणी में रखना चाहिए | जहाँ कहीं भी मसीह एक मनुष्य के हृदय में स्वयं के निवास के लिए स्थान पाते हैं, परमेश्वर का जीवित रूप प्रकट होता है और सभी लोग यह देख पाते हैं |

पवित्र आत्मा हमें कभी भी स्वयं अपने आप पर गर्व करने के लिए मार्गदर्शन नहीं करता,परन्तु परमेश्वर की महिमा करने के लिए हमारी मदद करता है | हमें अपने आप की ओर लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश नहीं करना चाहिए जैसे कि हम इस दुनिया का केन्द्र हैं | सारी महिमा उस मेमने को देना चाहिए जो हमारे लिए मारा गया | मरियम, मसीह की माता इसी प्रकार सभी संतों ने लोगो द्वारा उनकी प्रतिमाओं एवं चित्रों का विरोध किया होगा | उन्होंने जहाँ भी उनको पाया होगा, वेदी पर, घरों में या सार्वजनिक स्थानों पर उनका विनाश किया होगा | किसी ने भी आज तक मसीह के सिवाय परमेश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं दर्शाया है | परमेश्वर के सिवाय और कोई भी अच्छा नहीं है | हम उनके, केवल उनके अनुग्रह द्वारा न्यायोचित और पवित्र किये गए हैं |यह बात बाईबिल के विरुद्ध है कि मरियम या संतो को मध्यस्थी के लिए निवेदन किया जाये | यह एक प्रत्यक्ष रूप से दूसरी आज्ञा का उल्लंघन है जैसे कि हम हमारे पिता जो स्वर्ग में हैं पर विश्वास नहीं करते परन्तु उनमें और उनके सांसारिक प्राणियों के बीच हमारा विश्वास बंट जाता है | कोई भी छबि, मूर्ति , स्मारक या स्मृति चिन्ह, चमत्कार नहीं कर सकता या चंगाई की शक्ति का दान नहीं कर सकता है | परमेश्वर ने हमें उनके इकलौते पुत्र यीशु मसीह के द्वारा बचाया है | परमेश्वर की दृष्टी में सभी मूर्तियां, यहाँ तक कि गिरजाघर भी घृणा का कारण है |

नए समझौते में हम पिता परमेश्वर के साथ उनके प्रिय बच्चों के समान व्यक्तिगत रूप से संपर्क का अनुभव करते करते हैं | यीशु की क्षतिपूर्ति मृत्यु और अपने पिता के दाहिनी हाथ की ओर बैठकर की जाने वाली लगातार याजकीय मध्यस्थी हमारे इस विशेषाधिकार की जमानत है | पुत्र ने हमारे और पिता के बीच इस सीधे संपर्क को संभव बनाया है | जो भी व्यक्ति इसका उपयोग नहीं करता है, परमेश्वर के पितृत्व पर विश्वास नहीं करता है हमने अनुग्रह, धार्मिकता , क्षमा और जीवन केवल पिता, उनके पुत्र से, उनकी पवित्र आत्मा द्वारा प्राप्त की है | इसके लिए हमने केवल त्रयी परमेश्वर को अपने पूरे हृदय से धन्यवाद करना चाहिए |


०४.६ -- परमेश्वर का उत्साह

वह लोग जो ईश्वर से प्रेम करते हैं और वह जो उनसे दूर चले गये हैं, के बीच की दरार, दूसरी आज्ञा में दण्ड की आशंका और आशीष के वादे के बीच के अंतर में देखी जा सकती है | यहाँ फिर से, परमेश्वर ने स्वयं को “ मैं “के रूप में परिभाषित किया है जो यह संकेत देता है कि वह एक इच्छा और बोलने की क्षमता रखने वाले जीवंत मनुष्य हैं | वह इस बात पर बल देते हैं कि वह एक विश्वसनीय परमेश्वर हैं जो बदलते नहीं और प्रत्येक बात पर निंयत्रण करते हैं | उन्होंने अपने आप को हमारे साथ एक निरंतर समझौते में बाँध लिया है और उसी प्रकार हमसे भी पूर्ण समर्पण तथा विश्वसनीयता की उम्मीद करते हैं |

परमेश्वर हमसे प्रेम चाहते हैं | वे हमारे समर्पण को किसी मूर्ति, एक धर्म प्रवर्तक, एक राजा, या सोने या चांदी के साथ बाँटना नहीं चाहते हैं |वह एकमात्र परमेश्वर हैं, और दूसरा कोई भी हमारा रक्षक नहीं है |


०४.७ -- वह जो परमेश्वर से घृणा करते हैं गिर जायेंगे

उन लोगों के लिए संताप, जो परमेश्वर के प्रेम से घृणा करते या उसे महत्वहीन समझते हैं | वे उस शाखा के समान हैं जो लता से कट चुकी है |वह सूख और मुर्झा जायेगी, और निरंतर आग उनका गंतव्य स्थान होगा |यदि हम अपने स्त्रोत परमेश्वर के साथ रहना नहीं चाहते, हम आध्यात्मिक विश्वासघात करते हैं क्योंकि हम अन्य आत्माओं, मूर्तियों या अस्वच्छ शक्तियों के लिए अपने हृदय को खोलते हैं या अपने आप को ही देवतुल्य समझते हैं | परमेश्वर अपनी महिमा अपने पुत्र और उनकी और उनकी आत्मा के सिवाय और किसी के साथ नहीं बाँटते हैं | यहाँ और कोई भी सृष्टिकर्ता नहीं है |वह सभी कालों से और निरंतरता में एक मात्र न्यायाधीश हैं |

यदि एक मनुष्य सच्चे परमेश्वर की ओर नहीं आता परन्तु, अन्य देवताओं या स्वयं को ही महत्व देता है जैसे वह सभी का केन्द्र है,वह घमंडी बन जायेगा और अपने सृष्टिकर्ता के प्रेम के प्रति अपने हृदय को कठोर बना लेगा |ऐसा मनुष्य क्रूर एवं दुष्ट बनता है | वह दूसरे लोगों की सेवा करने के स्थान पर स्वयं उनसे लाभ उठाता है | जो परमेश्वर से प्रेम नहीं करता वह अपने पड़ोसी से प्रेम नहीं कर सकता है | वह इस संसार और इसकी आध्यात्मिक समस्याओं को नहीं समझ सकता क्योकि उसमें समझदारी का प्रतिमान नहीं होता है | परिणामस्वरूप, उसका अन्तकरण सुस्त हो जाता है, उसकी नैतिकता का पतन हो जाता है | वह जानवर की अपेक्षा जो जीवित बने रहने के लिए निर्मम संघर्ष करता है, पतित एवं दुष्ट बन जायेंगे |

परमेश्वर उन लोगों को जो उनसे अलग हो जाने की हठ करते हैं, चेतावनी देकर और उनपर अपना प्रेम बरसा कर उन्हें समझाना चाहते हैं परन्तु उनके ना मानने पर उन्हें गिर जाने देते हैं | वे उन्हें उनके हृदयों की कामुकता के अधीन छोड़ देते हैं ताकि वे अपने आप को नष्ट कर लें |राजा शाउल और यहूदा इस्करियोती इसके प्रमुख उदाहरण हैं | न्याय का दैवीय सिद्धांत जिस प्रकार वैयक्तिक रूप से उसी प्रकार राज्य पर भी लागू होता है | विवाहित पति या पत्नी प्राय: अपने साथी के साथ बुरा व्यव्हार करने की दिशा में जाने पर विवश हो जाते हैं जिसका असर उनके बच्चों के जीवन पर पड़ता है | इसी कारण से नास्तिकता एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक विरासत के समान आती है | एक परिवार कन्जूसीपन या ईर्ष्या के द्वारा अपना प्रभुत्व रखता है, वह इसे आसपास के वातावरण और व्यवहारों तक बढाएगा जहाँ कहीं भी कोई परिवार दिखावटी मानवीयता या सामाजिक नास्तिकता द्वारा प्रभावित होता है उसका परिणाम वैसा ही होता है |एक परिवार की आत्मा बच्चों की आँखों में दिखाई देती है | कुछ परिवार भविष्यवाणी, भूत सिद्धि या जादूटोना में इस आशा के साथ कि उन्हें चंगाई मिलेगी या वे छिपे हुए रहस्यों को उजागर कर पाएंगे,व्यस्त रहते हैं |यह सभी प्रकार की क्रियाएँ यीशु द्वारा दण्डित की गई हैं, फिर भी यदि कोई प्रायश्चित करता है तो उसे वे निकाल कर बाहर नहीं करते हैं |इसके स्थान पर वे उसे आनंदपूर्वक अपने निकट कर लेते हैं और शैतान के श्राप से छुटकारा दिलाते हैं |यीशु ने कहा था “सो यदि पुत्र तुम्हें स्वतंत्र करेगा, तों सचमुच तुम स्वतंत्र हो जाओगे “(यूहन्ना ८ :३६ ) यीशु मसीह की सत्ता हमारी समझ के अत्यधिक ऊपर हैं | वह अकेले किसी भी शैतानिक बंधन को तोड़ सकते हैं |

परमेश्वर हमें सिखाते हैं कि परिवार की हृदय-कठोरता का दंड उनकी तीसरी या चौथी पीढ़ी तक झेलना पड़ता है जबतक कि परिवार के सदस्यों द्वारा सच्चा प्रायश्चित न किया जाये और परमेश्वर की ओर पूरी तरह से ना आ जाये| प्रायःबच्चे और वयस्क भी नास्तिक पूर्वजों की श्रृंखला की उपज होते हैं| फिर भी हमें उन पर यह दोष नहीं लगाना चाहिए कि वे हृदय से भ्रष्ट हैं, परंतु हमें उनकी पृष्ठभूमि को समझने का प्रयास करना चाहिए और उनसे प्रेम करना चाहिए| यहूदी और मुस्लिम लोगों के बाप-दादाओं ने इस प्रकार की शिक्षा से उनके दिमागों को भर दिया है जो परमेश्वर के पुत्र को स्पष्ट रूप से ठुकराते हैं| वे अपराध करने के लिए एक सामूहिक बंधन में रहते हैं और दुनिया के रक्षक को ठुकराते हैं| जो कोई भी ऐसी ईसाई विरोधी शक्तियों से मुक्त होना चाहता है, ने उन लोगो से अपने पुराने मेलजोल को ठुकरा देना और उनके साथ अपने सास्कृतिक बन्धनों को यीशु के लिए तोड़ देना चाहिए| अतः जब हम अपने परिवारों की सुरक्षा और अपने देश की सुरक्षा का विचार छोड़ देते हैं, हम देखते हैं कि परमेश्वर सच में हमारे पिता हैं| वह हमारे भविष्य की जिम्मेदारी अपने पर ले लेंगे| वे हमेंशा हमें आश्वस्त करते हैं, “मैं तुम्हारा ईश्वर तुम्हारा परमेश्वर हमेशा तुम्हे प्रेम करने वाला पिता हूँ| मैं तुम्हे जानता हूँ, मैंने तुम्हे तुम्हारा नाम लेकर पुकारा है, तुम मेरे हो, मुझे पकडे रहो, और बुरे और अस्वच्छ बंधनों को पूर्णरूप से छोड़ दो| मेरी विस्वसनीयता और मेरी सत्ता पर विश्वास करो, और तुम हमेशा और हमेशा के लिए मुक्त और सुरक्षित रहोगे|”


०४.९ -- जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं उनके लिए आशीषों की प्रचुरता

यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम करता है, वह उनके वचन पर ध्यान मनन करेगा और उनकी शक्ति द्वारा जियेगा| जो कोई भी हमारे लिए उनके अनुग्रह की गहराई का अनुभव करता है वह उनके धैर्य और हमको मुक्त करने के लिए उनको लगातार धन्यवाद देगा| हम अपने पूरे हृदय के साथ कृतज्ञ बने रहकर उनके प्रति अपने प्रेम को धाराप्रवाह रूप से व्यक्त करते हैं| एक एहसानमंद विश्वासी प्रतिदिन परमेश्वर के वचन में खजाने , शक्ति, आशीषें और मार्गदर्शन पायेगा| तुम क्या सोचते हो एक दुल्हन के बारे में जो अपने दुल्हे के पत्र को प्राप्त करने के बाद उसे खोलती भी नहीं, और इसके बारे में भूल जाती है? हम कहेंगे कि वह दुल्हन उसके दुल्हे से प्रेम नहीं करती| इसके अतिरिक्त एक ईमानदार दुल्हन आतुरता पूर्वक अपने पति के पत्र की प्रतीक्षा करती है| जब कभी भी वह इसे प्राप्त करती है तुरंत उसे खोलेगी, उसे बार बार पढेगी, और उसके कुछ पदबधों पर सोच विचार करेगी, जो शीघ्र ही उसकी स्मृति में स्थायिरूप से छप जायेंगे| जब हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं, हम उनके वचन को पढते है जैसे वे स्वर्ग से व्यक्तिगत रूप हमें लिखे गये प्रेम पत्र हो| हम हमेशा उनको पढ़ कर सुनायेंगे और इस महत्वपूर्ण पाठ्य को याद रखेंगे| हमारे हृदय परमेश्वर के वचन से भरे रहेंगे, जो हम पर अपना प्रभाव उनकी इच्छा पूरी करने के लिए बनाये रखेंगे|

यदि पालक गंभीरता पूर्वक अपने घरों के लिए प्रार्थना करते हैं वे अपने परिवार के सदस्यों पर यीशु की आशीषें लेकर आते हैं| उनके बच्चें नास्तिक या उदासीनता पूर्वक बड़े नहीं होंगे| इसके स्थान पर उनके पास एक मजबूत नींव होगी| वास्तव में, माता-पिता अपने बच्चों को मसीह में विश्वास करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते, ना ही उनको मारपीट कर उनकी बुराईयों को साफ कर सकते हैं| परंतु एक स्नेही पालक का उदहारण धीरे धीरे परंतु गहराई से उन बच्चों के अचेतन मानों पर असर करता है| बच्चे अपने माता पिता के शब्दों से अधिक उनके व्यवहार को ध्यान में रखते हैं| एक माँ की आँखे कभी कभी उसके शब्दों से अधिक बोलती है, और उसका प्रेम उसकी मृत्यु के बाद भी उन तक पहुँचता है|

परमेश्वर का उन लोगों से जो उनसे प्रेम करते हैं उनकी हजारवी पीढ़ी तक आशीष का वादा है! यह वादा पालकों के लिए एक महान सुख प्रदान करता है यदि वे प्रलोभनों और नास्तिकताओं से भरे समय में अपने बच्चों को इस प्रकार से बढा कर रहे हैं| परमेश्वर के प्रेम की ताकत अंधियारे को भेदती है जैसे सूरज की किरणें एक अँधेरे कमरे को भेदती है| जब पालक प्रार्थना करने वाले विश्वासी हो तों उस परिवार का आध्यात्मिक उत्तराधिकार कई गुना बढ़ेगा|

क्या तुमने कभी हजार पीढ़ियों के बीच के समय का हिसाब लगाने की कोशिश की है| यदि हम २५ वर्ष एक पीढ़ी के मान ले, तब हमारे पास केवल एक सच्चे विश्वासी के बदले २५ हजार वर्षों के लिए परमेश्वर की असीमित आशीषे हैं| यदि हम एक बड़े परिवार में नाती पोतों के समय में विचार करें तों हमारे पास वंशधरों की एक बड़ी संख्या है, वह सभी विश्वासी और आज्ञाकारी मातापिता द्वारा आशीषित होंगे| परमेश्वर अपने प्रिय लोगों को अश्सावन देते हैं कि प्रत्येक विश्वासी, सौ सौ लोगों के प्रेम का सोता बन जायेगा| यीशु का अनुयायी कभी भी स्वयं को धर्मपरायणता का झरना होने का दावा नहीं करता है, निश्चय ही वह अपने आप को परमेश्वर के अनुग्रह का माध्यम मानता है| परमेश्वर अपनी बहुतायत में से उन लोगों को जो उनसे प्रेम एवं विश्वास करते है, बिना किसी शर्त के अनुग्रह पर अनुग्रह देते हैं|

यदि हम हमारे जीवनों में अपने माता पिता की शारीरिक या आध्यात्मिक आशीषों के असर का अनुभव करते है, तब हम दुनिया की विभिन्न संस्कृतियों की सराहना कर सकते हैं| जहाँ परमेश्वर के वचन ने सौ सौ वर्षों पूर्व एक गांव या एक शहर में अपना प्रभाव दिखाया, तुम इसे देख और महसूस कर सकते हो| जहाँ लोग यीशु द्वारा मुक्त हुए, वे अपना धन्यवाद-ज्ञापन प्रदान करते और एक दूसरे की सेवा करते हैं| जब परमेश्वर एक निश्चित संस्कृति को अपनी पवित्र आत्मा द्वारा प्रभावित कर सकते हैं तब परिवारों, पाठशालाओं, आर्थिक एवं राजनितिक स्थितियों पर यह प्रभाव हम जितना समझते है, उससे कहीं अधिक पड़ता है|

इसके विपरीत कुछ देशों में यह सच है कि खून के छीटे वालों को ईश्वर के रूप में मानना जैसे भारत में और जैसे चीन या अफ्रीका में पूर्वजों की आराधना, जहाँ मूर्तिपूजा और जादुई वशीकरण को सुरक्षा देना माना जाता है| यह समुदाय डर, दासता और दुष्चिन्ता के प्रभाव में हैं| प्रायः ही एक औरत की इज्जत को घसीट कर गंदगी में लाया जाता है जहाँ एक मानव देवता उस पर हावी हो जाता है| जनजातीय युद्ध विकास की रूकावट है जिससे समाज दरिद्र और अधिक दरिद्र हो जाता है | यदि तुम एक मुस्लिम, हिन्दू या एक ईसाई गांव में प्रवेश करते हो , तुम उस स्थान के आध्यत्मिक वातावरण को तुरंत समझ जाओगे| यहाँ तक कि जानवर भी समझते हैं कि उन्हें निर्दयतापूर्वक पिटा जाता है या उनके साथ सौम्य्तापुर्वक व्यवहार किया जाता है|


०४.९ -- सारांश: निर्णायक अलगाव

विश्वासी पालकों की आशीषें, व्यक्तिगत रूप या परिवारों में वे जो निर्माण करते है, उसमे देखने को मिलती हैं जोकि दादाओं, नानाओं का परमेश्वर के प्रति अविचल प्रेम का परिणाम है| ऐसे दादा-दादी, नाना-नानी प्रार्थना करते थे और कड़ी मेहनत करते थे और उनकी वृद्धावस्था तक एक शालीन जिंदगी जीते थे| सच में एक विभाजित करने वाली रेखा इस पूरे विश्व में परमेश्वर से प्रेम करने वालों से उन लोगों को जो परमेश्वर से प्रेम नहीं करता, अलग करती है| यदि तुम सच में पिता परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तुम एक बालक के समान उनकी शरण में ही रह कर उनके प्रेम के फल को विकसित करोगे| इस पर भी यदि कोई परमेश्वर के बुलावे का प्रतिरोध करता है, तो वह धर्मपरायणता से दूर भटक जायेगा| यह आश्चर्य की बात नहीं है यह देखना कि इन अन्तिम दिनों में बहुत से लोगों का प्रेम मन्द हो गया है| यदि मनुष्य परमेश्वर के पास वापस नहीं आता वह बुराईयों का सोता बन जाता है| परमेश्वर के विरोध में विद्रोह के परिणामस्वरूप, भयानक सिद्धांत निकल कर सामने आयेंगे| कार्ल मार्क्स एक धार्मिक जवान आदमी था, परंतु जब वह भविष्यवाणी के जाल में फंसा और जब उसने जादू टोने की दुनिया में प्रवेश किया, वह उन लाखों लोगों को, जिन्होंने जीवन के पाठ के रूप में मृतक भौतिकवाद को चुना था, भटका कर दूर ले गया| तिस पर भी उसके अनुयायी इस पृथ्वी पर कर्मचारियों के स्वर्ग की स्थापना करने योग्य नहीं थे, यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर के चेहरे पर अपनी मुठ्ठियाँ भी मारी| जो कोई भी परमेश्वर को, प्रेम और जीवन के सच्चे सोते को नकारता है, और उनके स्थान पर लोगो को देवता समान मानता है, उनके हृदय में कडवाहट और द्वेष को पुनर्जीवित करेगा और इसके फलस्वरूप न्याय के दिन पवित्र एक मात्र परमेश्वर के क्रोध को भोगेगा|

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