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Home -- Hindi -- The Ten Commandments -- 05 Third Commandment: Do Not Take the Name of God in Vain

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विषय ६: दस आज्ञाएँ - परमेश्वर की सुरक्षा करने वाली दीवार जो मनुष्य को गिरने से बचाती हैं|
सुसमाचार की रोशनी में निर्गमन २० में दस आज्ञाओं का स्पष्टीकरण

V. तीसरी आज्ञा – तू परमेश्वर का नाम व्यर्थ में न लेना



निर्गमन २०:७
तुम्हारे परमेश्वर यहोवा के नाम का उपयोग तुम्हे गलत ढंग से नहीं करना चाहिए| यदि कोई व्यक्ति यहोवा के नाम का उपयोग गलत ढंग से करता है तो वह अपराधी है और यहोवा उसे निरपराध नहीं मानेंगा|


०५.१ -- परमेश्वर का नाम

मनुष्य अपने सृष्टिकर्ता के बिना नहीं जी सकता है वह परमेश्वर की छबि के रूप में सृजा गया, परंतु उसने उन्हें छोड़ दिया| तब से अब तक, अपने खोये हुए घर की तलाश में और अपनी आँखों से ओझल हो चुके सोते की चाहत में, वह इस जगत के जंगलों में इधर से उधर घूमता रहता है| मनुष्य ने जब से अब तक हजारों स्थानापन्न ईश्वरों का निर्माण किया है जिनके भयानक चेहरे सिर्फ मनुष्य का भय और चाहतों को व्यक्त करते हैं| वह जादुई वशीकरण, हाथ की लकीर पढ़ने और भविष्यवाणियों पर पैसा खर्च करता है, जो कोई सुरक्षा उपलब्ध नहीं करते हैं| मुस्लिम काले पत्थर को आदरपूर्वक चुमते हैं जैसे उसमे स्वर्ग से एक पवित्र आत्मा स्थापित की गई है| बौद्ध लोग बुद्ध की सोने की प्रतिमा जो उदासीनतापूर्वक अपने आध्यात्मिक रूप से अशिक्षित अनुयायियों पर मुस्कुराती है, की पूजा करते हैं|

परमेश्वर का स्वयं का सीधा प्रकटीकरण , “मै यहोवा हूँ, परमेश्वर”, ने लोगों की खोज को समाप्त कर दिया है| उनकी, जलती हुई झाडी मैं उपस्थिति एतिहासिक थी, क्योकि परमेश्वर ने स्वयं अपने आपको प्रकट किया था और अपना नाम लेकर घोषित किया था | पुराने और नये नियम में, आरंभ से लेकर अंत तक परमेश्वर के विविध प्रकार के प्रकटीकरण हैं | बाईबिल हमें त्रयी परमेश्वर लिए ६३८ नाम और विशेषताएँ बताती है | सामी भाषा मैं प्रत्येक विशेषता का और एक नाम है |अत: परमेश्वर सिर्फ धर्मपरायण ही नही हैं परन्तु वह एक ही धर्मपरायण हैं जहाँ सारी धर्मपरायणताएं एकाग्रचित्त होती हैं |वह केवल पवित्र नहीं है, परन्तु वह एक ऐसे हैं जो पूरी तरह से पवित्रता से भरे हैं | इनमें से प्रत्येक नाम उनकी महिमा की एक किरण है | अब तक भी यह एक नाम है जो किसी भी दूसरे नाम की अपेक्षा अधिक बार आया है वह है यहोवा ( ६,८२८ बार पुराने नियम में ) | इस नाम का अर्थ है, सर्वशक्तिमान जीवन देने वाला, पवित्र, दोषरहित, इतिहास के परमेश्वर जिनकी विश्वसनीयता में कभी परिवर्तन नहीं आया है और कभी नहीं आएगा |


०५.२ -- नये नियम में प्रभु

नये नियम में परमेश्वर ने स्वयं अपने आपका नासरत के यीशु रूप में अवतार धारण किया | देवदूत, उपदेशक और विश्वासी इस बात को स्वीकार करते हैं और इससे सहमत हैं कि “ यीशु परमेश्वर है “| अब तक भी यीशु ने अपने आपको महिमामयी नहीं माना, परन्तु हमेशा अपने स्वर्गीय पिता को आदर दिया था |वास्तव में उन्होंने हमें प्रार्थना करना सिखाया था, “ हे हमारे पिता तू जो स्वर्ग में है, तेरा नाम पवित्र माना जाये |” इस प्रार्थना में पिता के नाम को सभी नामों से पहले सम्मान, महिमा और पवित्र माना गया था |यीशु के द्वारा परमेश्वर, स्वर्गीय पिता का रहस्य प्रकटीकरण, हमें परमेश्वर के ज्ञान के उच्चतम स्तर तक उठा लेता है |

प्रभु यीशु नम्रतापूर्वक अवतारित हुए थे | उन्होंने सूली पर अपनी शर्मनाक मृत्यु द्वारा, सभी अपराधियों और एकमात्र पवित्र के बीच संधि करवा कर अपना कार्य पूरा किया था | “ इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है |कि जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और जो पृथ्वी के नीचे हैं; वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें | और परमेश्वर पिता की महिमा के लिए हर एक जीभ अंगीकार कर ले कि यीशु मसीह ही प्रभु है |” ( फिलिप्पियों २ : ९ -११ )| पवित्र आत्मा यीशु के मूल नाम को महिमामयी, हमेशा से अब तक करता है और हमें आश्वासन देता है कि वह “ परमेश्वर “ है | ठीक उसी समय, पवित्र आत्मा हमें पिता परमेश्वर, पुत्र और पवित्र आत्मा की एकता का आश्वासन देता है | प्रेम की यह एकता हमारे परमेश्वर के सत्व की परिपूर्णतापूर्वक व्याख्या करता है | दाउद ने रहस्य प्रकटीकरण को पहले ही सुन लिया था “ मेरे प्रभु से यहोवा की वाणी यह है, कि तू मेरे दाहिने हाथ बैठ, जब तक मैं तेरे शत्रुओं को तेरे चरणों न कर दूँ “ ( भजन सहिंता ११० : १ ) |


०५.३ -- परमेश्वर के नाम को जानने का अर्थ क्या है ?

यदि कोई व्यक्ति एक अजनबी शहर में आता है, उसे इस् बात से खुशी होगी कि उसके पास किसी ऐसे व्यक्ति का पता है जिसे वह जानता है | वह अपने इस मित्र को मार्गदर्शन व मदद के लिए बुला सकता है | वह मनुष्य खुशकिस्मत है जो परमेश्वर के सच्चे नाम को जानता है और उसके पास “ दूरभाष नम्बर “ है “ और संकट के दिन मुझे पुकार; मैं तुझे छुडाऊंगा, और तू मेरी महिमा करने पायेगा “ ( भजन संहिता ५० : १५ ) | हमारे जीवित परमेश्वर जो स्वर्ग में हैं, सोते नहीं हैं, और वह उत्सुकतापूर्वक हमारे आध्यात्मिक दूरभाष बुलावे की प्रतीक्षा करते हैं |

पवित्र परमेश्वर के साथ हमारी प्रत्येक भेंट हमें अपराधों में हमारी व्यस्तता, हमारा अकेलापन और हमारी हार को स्पष्टतया उजागर करती है | उनकी पवित्रता की राजसत्ता हमें हमारी उथली नैतिकता प्रकट करती है और हमारे झूठे मानवतावाद को दर्शाती है जो वास्तव में यह है | परमेश्वर की सद्गुणता हमें हमारे अपराधों को स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित और उनकी नम्रता हमें हमारे जहरीले गर्व उजागर करती है | परमेश्वर के नाम को जानना,टूटे- हारे हुए लोगों के लिए परमेश्वर के साथ बने रहना संभव करता है |

परमेश्वर में हमारा बढ़ता हुआ विश्वास हमें तीसरी आज्ञा में बनाये रखता है जैसे वे कहते हैं, “मै तुम्हारा परमेश्वर तुम्हारा ईश्वर हूँ ” जहाँ स्वामित्व सर्वनाम “तुम्हारा” संकेत देता है कि पवित्र एकमात्र परमेश्वर अपने प्राणियों, अपराधियों, असंतोशियों और कमजोरों के साथ पहचाने जाते हैं| वह उन लोगों को अपनी विश्वसनीयता और सुरक्षा का आश्वासन देता है| नए नियम के अनुसार उन्होंने हमें परमेश्वर के परिवार में सम्मिलित कर लिया है, जहाँ यीशु इस के प्रमुख और हम उनके आद्यात्मिक शरीर के कार्यकारी सदस्य हैं| परमेश्वर हमारे पिता चाहते हैं कि वह अपने बच्चों में एक दिमाग और एक आत्मा में बने रह कर, उनके द्वारा अपनी बुराईयों से भरी पीढ़ी को बचाने का कार्य करें| उनकी दया में, वे उन लोगों को अपने नाम में कार्य और विश्वास करने की सत्ता देते हैं|


०५.४ -- परमेश्वर का नाम व्यर्थ में लेना

हम जिस जगत में रहते हैं वह गहराईपूर्वक, बाईबिल में परमेश्वर के रहस्य प्रकटीकरण से प्रभावित हो चुका है| किन्तु कुछ लोग उनपर पूरे हृदय के साथ विश्वास करते हैं| यदि मनुष्य परमेश्वर की उपस्थिति के साथ नहीं रहता है, वह परमेश्वर का नाम व्यर्थ में लेकर ही अपना जीवन समाप्त करेगा| कुछ लोग उनका उदासीनता पूर्वक उपयोग करते हैं जैसे कि उन्हें बहुत कम पैसा दिया जा रहा है| यहाँ तक कि वापस से जन्म लिए हुए ईसाई पवित्र आत्मा को उनकी बेकार सी बातों द्वारा दुख देने के लिए उत्तरदायी हैं| वे परमेश्वर का नाम लेने के बारे में विचारहीन हैं |तीसरी आज्ञा हमें चेतावनी देती है और परमेश्वर का नाम व्यर्थ में लेने से बचाती है|

नाम के ईसाई व्यक्तियों के मुहँ से एकदम से परमेश्वर का नाम बिना सोचे विचारे निकल जाता है जैसे वे कहते हैं “ ओ परमेश्वर ओ ईश्वर “ और ऐसे ही कईऔर शब्द वे कहते हैं | वो लोग उन कुछ बच्चों के समान हैं जो टेलीफोन के साथ खेलते हैं, एक नम्बर डायल करते हैं किन्तु उस व्यक्ति से, जो उत्तर देने के लिए भागकर फोन उठाता है, बात नहीं करते हैं | सचमुच में, यदि वे बार बार ऐसा करते हैं तो वह व्यक्ति क्रोध में आ जाएगा और इस शान्ति भंग करने वाली टेलीफोन की घंटी को सुनना बंद कर देगा | परमेश्वर हमें सुनते हैं जब हम उन्हें पुकारते हैं | जब तुम उनका नाम लेते हो,उनके बारे में क्या सोचते हो? यदि तुम उनका नाम विचारहीनतापूर्वक लेते हो,तो यह दिखाई देता है कि तुम परमेश्वर के साथ कितनी छोटी सी जिंदगी जीते हो|


०५.५ -- मुस्लिम अल्लाह का नाम कहते हैं

एक मुसलमान व्यक्ति प्रायः ही अल्लाह का नाम लेता है इस आशा में कि वह न्यायोचित बना रहेगा और विश्वासी, धर्मपरायण एवं ईमानदार दिखाई देगा| वह यह विश्वास करता है कि जितना अधिक वह अल्लाह का नाम बोलेगा उतने अधिक उसके अपराध क्षमा हो जाते हैं| यह धारणा उपासना के उस उथले प्रकार को समग्र हिस्से के रूप में ऊंचाई पर ले जाती है जिसमे अल्लाह का नाम व्यर्थ में लिया जाता है| यहाँ पर यह समझना बहुत आवश्यक है कि एक मुस्लिम व्यक्ति का अल्लाह के साथ कोई व्यक्तिगत रिश्ता नहीं है| अल्लाह से उसकी बात सिर्फ एक सेवक की अपने विस्मयकारी मालिक के प्रति बुदबुदाहट है, और निश्चित ही वह यह भी नहीं जानता कि उसका मालिक उसकी बात सुन रहा है या नहीं सुन रहा है|

अधिकतर प्रतिदिन की प्रार्थनाएं रीतिरिवाजों का आदेश देती हैं| औसतन मुस्लिम ने प्रतिदिन के अपने पांच बार प्रार्थना के क्रम में शांति पूर्वक या जोर से बोलकर सत्रह बार फातिहा (सूरा-अल-फतिहा) पढ़ना चाहिए| इस जगत के लगभग एक हजार लाख मुस्लिम फातिहा, अरबी भाषा में कहते है, जबकि लगभग ८०० लाख मुस्लिम लोगों को अरबी समझ में नहीं आती है| बदकिस्मती से परमेश्वर की प्रार्थना भी कुछ लोगों द्वारा, और कुछ गिरजाघरों में आराधना सेवकाई के दौरान बिना सोचे विचारे दोहराई जाती है|


०५.६ -- अस्पष्ट प्रार्थनाएं और व्यर्थ के वाद विवाद

केवल मुस्लिम ही प्रार्थनाओं विचारहीनता के साथ नहीं बोलते हैं परंतु अनगिनत ईसाई भी एक लय में अपनी स्तुति प्रार्थना करते है जैसे कि एक माँ अपने बच्चे के लिए, जब वह बिस्तर पर सोने जाता है, गाती है| हमारी क्या हिम्मत कि हम परमेश्वर से एक उत्तर की आशा लिए बिना उन्हें पुकारें, या अपने व्यापार या कुछ निरर्थक मामलों के बारे में सोचते हुए उनसे बात करें? उदहारण के तौर पर यदि हमें हमारे देश के प्रधान व्यक्ति से मिलने की और निजी रूप से बात करने की सुविधा मिले, क्या हम जो कुछ भी उनसे कहना चाहते है, उनसे मिलने के पहले, उस एक एक शब्द को जाँच परख नहीं लेंगे? और क्या परमेश्वर मनुष्य से कम महत्वपूर्ण हैं? यदि कोई व्यक्ति बिना सोचे प्रार्थना करता है, वह परमेश्वर का अपमान करता है|

धर्मशास्त्री कभी- कभी तीसरी आज्ञा के उल्लंघन की कगार पर होते हैं और पवित्र आत्मा को दुख पहुंचाते हैं जब वे बाइबिल का अध्ययन करते है और इसके विशेष लक्षणों एवं परमेश्वर के चमत्कारिक कार्यों के बारे में उनकीउपस्थिति का अनुभव किये बिना बहस करते हैं, ऐसे जैसे कुछ वैज्ञानिक प्रयोगशाला के प्रयोग के बारे में बहस कर रहे हों | हमारे पास परमेश्वर के बारे में कोई वस्तुनिष्ठ, तटस्थ बात नही हो सकती क्योंकि परमेश्वर कोई एक विचार या एक वस्तु नहीं है |वह एक जीवित व्यक्ति हैं और हमारे साथ हमेशा उपस्थित हैं |वह हमारे वार्तालाप को सुनते हैं और वह एक दूरी से हमारे विचारों को जानते हैं | इसलिए कोई भी धर्मशास्त्रीय अध्ययन जो परमेश्वर के भय से रिक्त है और उसका सम्मान निसंदेह तीसरी आज्ञा के अतिक्रमण की ओर ले जाता है |


०५.७ -- परमेश्वर के नाम का अपराधपूर्ण उपयोग

वह व्यक्ति जो जानबूझ कर परमेश्वर के शब्द को अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए किसी भी प्रकार से उपयोग करता है, उसके बारे में उपहास या मजाक करता है, उस के लिए घोर कष्ट की बात है | वे उस नाम का जो सभी नामों के ऊपर है, दुरूपयोग करते हैं और उनके मनों में उस नाम का कोई भय या आदर नहीं होता है |इसलिए हमें उन लोगों का, जो परमेश्वर के वचन की हसीं उड़ाते है कभी साथ नहीं देना चाहिए | इसके स्थान पर हमें उन लोगों को चेतावनी देनी चाहिए और परमेश्वर के लिए खड़ा होना चाहिए | पुस्तक और फ़िल्म लिखने वाले धार्मिक शब्दों के गहरे प्रभाव को जानते हैं और वे उनका उपयोग अपने प्रस्तुतीकरण में करते हैं |परन्तु वे इन शब्दों का यथाशब्द उपयोग नहीं करते, वे उसके साथ एक धर्म निरपेक्ष अर्थ भर देते हैं | उनके स्वयं के शब्द, उनके ऊपर ही आते हैं और उनको दोषित ठहराते हैं |

लोग प्राय: अन्य व्यक्तियों से नाराज हो जाते हैं और अपनी नाराजगी में वे ईश्वर,अल्लाह या यीशु के नाम के साथ श्राप देते हैं |वे बिना सोचे समझे अपशब्द कहते हैं और अन्य धार्मिक घटनाओं के बारे में लानत व निंदा करते हैं | एक बार एक पादरी एक ईंटो का काम करने वाले व्यक्ति के पास से गुजरे और उन्होंने उसे अपशब्द कहते और श्राप देते सुना, तो उन्होंने उससे पूछा, “ क्या तुम हमेशा ऐसे पुकार कर ही प्रार्थना करते हो ? “ वह व्यक्ति असमंजस में पड़ गया और उसने मुँह तोड़ उत्तर दिया, “मैं प्रार्थना नहीं कर रहा था “ तब पादरी ने कहा था, “ परन्तु मैंने सुना तुम परमेश्वर का नाम लेकर पुकार रहे थे और अवश्य ही वे तुम्हे उत्तर देंगे “ वह मजदूर व्यक्ति वहीं रुक गया था |

प्राय: लोग एक दूसरे के लिए अपशब्दों का उपयोग यहाँ तक कि अपने सगे सम्बन्धियों के लिए भी, लापरवाही से करते हैं | इन शब्दों में एक गहरी नफरत छिपी होती है | यीशु ऐसे श्रापों को हत्या के समान मानते हैं क्योंकि यह मनुष्यों में परमेश्वर की छबि को मैला करते हैं |


०५.८ -- परमेश्वर की चेतावनी : कठोर दण्ड

तीसरी आज्ञा के अंतर्गत एक अत्यंत गंभीर चेतावनी दी गई है, “परमेश्वर अनिवार्य रूप से उस व्यक्ति को दण्ड देंगे जो उनके नाम का व्यर्थ में उपयोग करता है |” इस चेतावनी के बावजूद कुछ लोग परमेश्वर का नाम अपने बुरे कार्यों को छिपाने के लिए और उन अनुचित कार्यों को न्यायोचित बताने के लिए जानबूझ कर लेते हैं |ऐसे लोगों के लिए अत्यधिक कष्ट होता है जो अपने झूठ और पाखंड को छिपाने के लिए परमेश्वर का नाम लेते हैं |आज के युग में लोग बड़ी कठिनाई से एक दूसरे पर विश्वास करते हैं क्योंकि लोग ईश्वर की सौगंध भी लेकर सच नहीं कहते हैं | यीशु ने श्रेणीबद्ध्धता पूर्वक सौगंध को हमारे लिए निषेध किया है, “ परन्तु तुम्हारी बात हाँ की हाँ, या नहीं की नहीं हो; क्योंकि जो कुछ इस से अधिक होता है वह बुराई से होता है “ | यदि हम कसम लेते हैं और झूठ बोलते हैं तो हम लोगों को ही नहीं परमेश्वर को भी धोखा देते हैं | एक झूठी शपथ तीसरी आज्ञा के तले गिरती है जो हमें ईश्वर का नाम व्यर्थ में लेने के विरोध में सतर्क करती है | इसीलिए बाइबिल कहती है, “परमेश्वर का भय समझदारी का आरंभ है | “ हम सभी को परमेश्वर के भय की आवश्यकता है वरना हम अपराध में धंसते जाते हैं |

परमेश्वर उन लोगों से अत्यधिक घृणा करते हैं जो उनको जानते हैं परंतु मुसीबत के समय ना उनको पुकारते हैं, ना उनसे किसी उत्तर या मार्गदर्शन की आशा करते है, और इसके स्थान पर वे सीधे भविष्य बताने वाले के पास पहुँच जाते हैं जो परमेश्वर का नाम व्यर्थ में लेता है और भूतकाल, वर्त्तमान एव भविष्य काल को उनके सामने प्रकट करने का दावा करता है| “ जब तुम उस राष्ट्र में पहुँचो, जो यहोवा तुम्हारा परमेश्वर तुमको दे रहा है, तब उस राष्ट्र के लोग जो भयंकर काम वहाँ कर रहें हों उन्हें मत सीखो (व्यवस्था विवरण १८:९) “|परमेश्वर कहते हैं ,”फिर जो प्राणी ओझाओं या भूतसाधनेवालों की ओर फिरके, और उनके पीछे होकर व्यभिचारी बने, तब मैं उस प्राणी के विरुद्ध होकर उसको उसके लोगों के बीच में से नाश कर दूँगा ( लैव्यव्यवस्था २०:६ ) “ | मृतकों से संपर्क करना और उनसे सन्देश ग्रहण करना भी निषेध है | ऐसे अपराध विवादास्पद हैं जो मनुष्य को परमेश्वर से अलग करते हैं इतना ही नहीं उनके हृदयों को शैतान और उसकी आत्माओं के लिए खोलते हैं | परमेश्वर की दृष्टी में ऐसी नास्तिकताएं व्यभिचार के समान है | यह उसी प्रकार से भयानक है जैसे एक अविश्वसनीय आदमी अपनी पत्नी के साथ विश्वासघात करता है और जो पैसा पत्नी का है उसे वेश्यावृति पर खर्च करता है |तभी तो यह आश्चर्य की बात नही है कि ऐसे कार्यों को परमेश्वर “ आध्यात्मिक वेश्यावृति (लैव्यव्यवस्था २०: ६ ) “ और ऐसे लोगों को “ एक बुरी एवं व्यभिचारिक पीढ़ी “ कहते हैं |

अफ्रीका और एशिया में लोग बुराई से अपनी सुरक्षा के लिए तावीजों को लेकर चलते हैं | वे इन वस्तुओं पर अपना बहुत सा पैसा व समय खर्च करते हैं | वे व्यापार को सफल करने के लिए और जीवन साथियों में प्रेम बनाए रखने के लिए “ जादुई पत्र “ भी लिखते हैं और प्रार्थना भी करते हैं | जिन राज्यों में ऐसे गोपनीय कार्य होते हैं वे वास्तव में परमेश्वर को नहीं जानते हैं | कुछ देशों में यहाँ तक कि दूरदर्शन के कार्यक्रमों में भी झाड फूंक, पारम्परिक रीतिरिवाजों और भूत सिद्धी को दिखाया जाता है |हम ईसाई लोग ऐसे कार्यक्रमों और शिक्षण को सीधे साधे दर्शकों पर सीधा शैतानिक प्रहार मानते हैं | यह नर्क के द्वार खोलने से कम नहीं है | फिर भी परमेश्वर ने हमें इन सभी खतरों के विरोध में चेतावनी दी है कि यह स्पष्ट रूप से हमें उनसे अलग करते हैं | केवल यीशु ही ऐसे लोगों को बंधनों से मुक्त कर सकते हैं | जन्मपत्रियाँ, हथेलियाँ पढ़ना और आत्माओं को हवा में उडाकर अपने हाथ की सफाई दिखाना, नर्क में जाने का छोटा रास्ता है | आजकल भारत के बहुत से होटलों में भविष्य बताने वाले हैं जो प्रत्येक मेहमान का भविष्य पढ़ने की प्रतीक्षा करते रहते हैं | वे आँखों के चित्र भी बनाते हैं जिन्हें एक तीर से बुरी नजर से बचने के लिए, बेधा जाता है |कुछ लोग अपनी कारों में तावीज, घरों पर घोड़े की नाल, और सभी प्रकार की प्राकृतिक विपदाओं को दूर करने के लिए लकडी को स्पर्श करते हैं | कुछ लोग ईश्वर व उनके स्वर्गीय पिता की कृपा से अधिक अंधियारे की शक्ति पर विश्वास करते हैं | लोग स्वयं अपनी इस प्रकार की प्रथाओं के चलन के कारण इस युग की शक्ति के बंधन में हैं |


०५.९ -- परमेश्वर की निंदा

कुछ लोग परमेश्वर से बहुत दूर हो जाते हैं जब वे सोचविचार कर परमेश्वर और उनके मसीह के नाम में शपथ लेते हैं | वे अपने आपको उन लोगों के साथ जोड़ लेते हैं, जो पिता, पुत्र एवं पवित्र आत्मा के विरोध में विद्रोह करते हैं | शैतान, परमेश्वर का पुराना शत्रु है | परमेश्वर की निंदा, शैतान के सामने झुकने जैसी क्रिया है जो नर्क के बाहर गंदगी के समान बहता है | यदि किसी ने एक लंबा पत्र जिसमें मसीह के नाम को श्रापित किया था पढा है, उसने अपने मुख पर नर्क की श्वास का अनुभव किया होगा “तुम लोग उस शाप देने वाले छावनी से बाहर लिवा ले जाओ; और जितनों ने वह निंदा सुनी हों वे सब अपने अपने हाथ उसके सिर पर टेकें, तब सारी मंडली के लोग उसको पत्थरवाह करें | और तू इस्राएलियों से कह, कि कोई क्यों न हों जो अपने परमेश्वर को शाप दे उसे अपने पाप का भार उठाना पडेगा यहोवा के नाम की निंदा करनेवाला निश्चय मार डाला जाए ; सारी मंडली के लोग निश्चय उसको पत्थरवाह करें; चाहे देशी हों चाहे परदेशी, यदि कोई उस नाम की निंदा करे तो वह मार डाला जाए” ( लैव्यव्यवस्था : २४ : १४ – १६ )|

जब हम एक ईश्वरनिन्दा करने वाले के बारे में बात या न्याय करते हैं हमें बहुत नम्र एवं सावधान रहना चाहिए| शैतान के चंगुल में फंसे बहुत से लोग अंधे हो जाते हैं कि वे सोचते हैं कि वे परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं जबकि वास्तव में वे उनसे और उनके मसीहा से युद्ध कर रहे होते हैं ( यूहन्ना १५: १९ – २१: १६: १ – ३ )| बुद्धिमान, पवित्र प्रमुख लोग ही वो लोग थे जिन्होंने यीशु पर ईश्वरीय निंदा का आरोप लगाकर मृत्यु का दंड दिया था| आद्यात्मिक नेता होते हुए भी वे यह पहचान नहीं सके कि यीशु ही जीवित परमेश्वर के इकलौते पुत्र थे| परमेश्वर के लिए अपने उत्साह में, उन्होंने उनके अभिशेकित मसीह की निंदा की थी| उन्होंने मसीह के मुँह पर थूका और उनके सिर पर वार किया| प्राचीन काल के इन लोगों के प्रमुखों ने, अपने प्रभु को जो उनके बीच उपस्थित थे, स्वीकार ही नहीं किया था| इसके स्थान पर उन्होंने, उनको ठुकराया एवं सूली पर चढाया था| दुखदायक बात है कि अब तक उनमें से अधिकतर लोग उन्हें नकारते हैं|

याकूब के इन पुत्रों के समान, मुस्लिम सोचते हैं कि वे परमेश्वर की निंदा करते हैं, यदि वे मसीह को देवता या सूली पर उनकी मृत्यु में विश्वास करते हैं| उन लोगों ने यहूदी लोगों की त्रयी परमेश्वर में विश्वास से अन्यायोचित नफरत एवं युद्ध को वसीयत के रूप में स्वीकार किया है| परमेश्वर के पुत्र के प्रति उनके मन में एक निष्ठुर नफरत की धारणा है| परंतु वे पिता परमेश्वर, पुत्र और पवित्र आत्मा के विरुद्ध ईशनिंदा को त्रयी के सिद्धांत के लिए अपनी नफरत के द्वारा दर्शाते एवं प्रकट करते हैं| दूसरी ओर हिंदू धर्मवादी, यीशु को अनेक देवताओं में से एक देव के रूप में मानने के द्वारा उनकी एकाकी सत्ता को ठुकराते हैं|

कुछ पिछड़े हुए ईसाई शैतान की उपासना करके भी अपनी धर्म निंदा को धक्का देते हैं| अपनी उपासना के समय वे वहशी दावते रखते हैं यहाँ तक कि शैतान को खूनी बलिदान भी चढाते हैं| वे परमेश्वर की प्रार्थना के शब्दों को तोड़ मरोड़ कर इस प्रकार से उसकी नक़ल उतारते है जैसे वे शैतान की उपासना कर रहे हों| यह उस अंधकार की शक्ति है जो प्रत्येक उस व्यक्ति में पाई जाती है जो मसीह में परमेश्वर के उद्धार को ठुकराता है|

परंतु मसीह के पास हमें राहत मिलती है जिसे नर्क कभी भी बेध नहीं सकता है| हमारे भले गडरिये ने कहा “मेरी भेड़े मेरी आवाज को जानती हैं और मै उन्हें जानता हूँ| वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं और मै उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ| उनका कभी नाश नहीं होगा| और न कोई उन्हें मुझसे छीन पायेगा| मुझे उन्हें सौंपने वाला मेरा परम पिता सबसे महान है| मेरे पिता से उन्हें कोई नहीं छीन सकता| मेरा पिता और मैं एक हैं|” (यूहन्ना १०:२७-३०)

यहूदी तीसरी आज्ञा को अत्यधिक आत्मीयता पूर्वक निबाहना चाहते थे इसलिए वे गलती से या भूलचूक से भी परमेश्वर का पराक्रमी नाम लेने से डरते थे| हम सब जानते हैं कि इब्रानी भाषा का चार शब्दों का नाम “य. ह. वे. ह.” (YHWH) परमेश्वर के लिए है| पवित्र चरित्र के परिणामस्वरूप यहूदी सन ३०० ईसा पूर्व से धर्मशास्त्र पढते समय इस नाम से बचने के लिए इसके स्थान पर “अदोनै” नाम लेने लगे थे| “जेहोवा ”एक मानव निर्मित शब्द है जो “अदोनै” शब्द के स्वरों को “या. ह. वे. ह.” शब्द के व्यजनों में मिला कर बनाया गया था| यह लग भग सन १५२० तक नहीं बना था| सामान्य रूप से इसका मूल नाम और उच्चारण “यहवेह ” “यहोवा” है|

यह हमें एक प्रश्न की ओर अग्रसर करता है क्या हमें परमेश्वर का नाम लेना चाहिए ? किस प्रकार से हम परमेश्वर का नाम उचित रूप से ले ताकि हम न्याय में ना गिर पड़े?


०५.१० -- उचित रूप से परमेश्वर का नाम लेना

तीसरी आज्ञा परमेश्वर का नाम उचित आत्मा में लेने से कभी भी मनाही नहीं करती है| यहाँ एक विशाल वादा दिया गया है “तुम परमेश्वर का नाम कभी भी व्यर्थ में ना लेना, यदि तुम इसका उपयोग विश्वास, प्रेम और कृतज्ञता में करते हों|” परमेश्वर तुम्हारे विश्वास की साक्षी को तुम्हारे मित्रों के जीवनों में क्षमादान देने एवं नवीकरण करने में एक माध्यम के रूप में उपयोग करेंगे| उनके नाम में कोई जादुई शक्ति नहीं है जिसे हम अपनी इच्छानुसार उपयोग कर सकते हैं| जीवित परमेश्वर अपनी दूर दर्शिता एवं योजनानुसार, अपने नाम द्वारा कार्य करते हैं| उपदेशक पतरस ने लंगड़े आदमी से कहा था, “नासरत के यीशु मसीह के नाम में उठ और चल|” बाद में उन्होंने बुजुर्गों और लोगों के प्रधानों से कहा था, “नासरत के यीशु मसीह के नाम के द्वारा यह आदमी तुम सब के सामने खड़ा है (प्रेरित के कामों का वर्णन ३:६; १६:४-१०)| हमें यीशु के नाम और उनकी शक्ति के ज्ञान में डूबना चाहिए| स्कालात्टर एक प्रसिद्ध धर्मशास्त्री ने यूनानी भाषा में पूरे नये नियम को याद कर लिया था, परंतु उसके जीवन के अंत में उसने एक पुस्तक लिखी थी जिसका शीर्षक था क्या हम यीशु को जानते हैं? हमने यीशु के बारे में साधारण रूप से नही बोलना चाहिए परंतु निश्चित ही हमें हमारे प्रभु को बेहतर रूप से समझना चाहिए| प्रार्थनापूर्वक उनके वचन की गहराई में हमें विकसित होना है| प्रत्येक शब्द पर हमें मनन करना है, और तब परमेश्वर अपने वचन द्वारा हमसे बात करेंगे जिसकी जड़ें हमारे हृदयों में गहराई तक हैं |

यदि हम पुराने और नये दोनों नियमों के सभी अध्यायों को स्मरण कर लें तो यह यीशु के लिए उत्तम गवाह बनने में हमारी मदद कर सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर का वचन शक्ति है और हमें पवित्र आत्मा की बुद्धिमता देती है | आशीषित है वह आदमी या औरत जिनके अंतर्मन और स्मृति परमेश्वर के वचन से भरे हुए हैं | अधिकतर विश्वासियों की गवाहियाँ और परमेश्वर का नाम और उनके कार्यों को अच्छी प्रकार से समझने में हमें प्रेरित करती हैं, जिससे हमारा विश्वास मजबूत होता है | हम प्रतिदिन परमेश्वर के वचन पर मनन करने से आनन्दित होते हैं और हमारे मित्र हमारे विश्वास की गवाही द्वारा आनन्दित होंगे|

जब हमने परमेश्वर का वचन सुना, हम और अधिक समय तक अकेले नहीं रहे, परन्तु निश्चित ही हम हमारे परमेश्वर को अधिक और अधिक प्रकार से जान गये हैं | हम उन्हें सीधे रूप से बुला सकते हैं क्योंकि हम उनका नाम जानते हैं | वह बाइबिल के द्वारा हमसे बात करते हैं और हम अपनी प्रार्थनाओं में उनको उत्तर देते हैं | हमारे पास कितना बड़ा विशेषाधिकार है कि हम अपने सृष्टिकर्ता से प्रत्येक अपराध, बीमारी, समस्या और संकट के बारे में बात कर सकते हैं, और वह हमें सुनते हैं | उनकी सलाह किसी वैद्य या शारीरिक डाक्टरों से उत्तम है | वह हमसे हमारे सांसारिक पिता की अपेक्षा अधिक प्रेम करते हैं | यीशु की क्षतिपूर्ति मृत्यु के लिए, वे हमें हमारे अपराधों से पूरी तरह से क्षमा करते हैं, और उनकी पवित्र आत्मा के निवास द्वारा हमें अनंत जीवन की शक्ति प्रदान करते हैं |


०५.११ -- अपने पूरे हृदय और मन के साथ परमेश्वर की प्रंशसा करो

क्या हम सचमुच गंभीरतापूर्वक अपने हृदय से परमेश्वर की प्रंशसा एवं धन्यवाद करते हैं | हमें स्मरण रखना है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमारे पिता हैं, उनके इकलौते पुत्र हमारे मुक्तिदाता और पवित्र आत्मा अनन्तता से हमारा सुख और शक्ति हैं, और हमें हमेशा कृतज्ञ रहना चाहिए | भयभीत होकर लड़खड़ाते हुए उनकी आराधना करने के स्थान पर, हमें उनकी स्तुति उनके बच्चों के समान करनी चाहिए, जो अपनी आशीषित आशा और अपनी पूर्णतया मुक्ति के लिए उनके कार्यों में आनन्दित हैं, हमें अपने अपराधों में और अधिक मृत बने नहीं रहना है बल्कि मसीह में हमेशा हमेशा के लिए जीवित रहना है | तो यदि तुम गायक दल के साथ नहीं गा सकते, तुम अपने आप ही गा सकते हो, और यदि तुम अपने होठों से नहीं गा सकते तो तुम तुम्हारे हृदय में गा सकते हो | यदि कोई भी व्यक्ति विश्वास के साथ पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का नाम,प्रार्थना में आनंददायी स्तुति में लेता है, वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर का आदर करता है और अपनी स्तुति द्वारा उन्हें प्रसन्न करता है |

यदि कोई ऐसा मनुष्य है जो परमेश्वर को नहीं जानता, या उसका हृदय कठोर बन चुका है या उसके कुछ छिपे हुए अपराधों के कारण उसके अंतर्मन में ग्लानी है, तो उसने अवश्य ही उपदेशक पतरस की सलाह माननी चाहिए “ और जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वही उद्धार पायेगा ( प्रेरितों के काम २ : २१ ) “ | यह हमारा विशेषाधिकार है कि हम पिता परमेश्वर से, यीशु के नाम में प्रत्यक्ष रूप से बात कर सकते हैं और वह हमें उत्तर देंगे | हम परमेश्वर के निकट खींच गए हैं क्योंकि वह हमारे निकट खिंच कर पहले से आ गये हैं | परमेश्वर का नाम “ हमारे पिता “ हमें आश्वासन देता है कि सभी स्वर्गीय आशीषें हमारे लिए तैयार की गई हैं | यीशु के नाम ने नर्क की नींव को हिला दिया है क्योंकि वह अपराध, मृत्यु एवं शैतान पर विजयी हैं | पवित्र आत्मा, परमेश्वर के पुत्र की महिमा करता है क्योंकि पुत्र के नाम में वह हमें अनंत जीवन और परमेश्वर की अनोखी शक्ति प्रदान करता है | वह सुरक्षा, पवित्रता, आनंद और शांति भी प्रदान करता है | जैसे सूरज अपनी अनगिनत किरणें, पृथ्वी पर,प्रतिदिन भेजता है, तो वैसे ही हमारे त्रयी परमेश्वर का नाम हम पर अनुग्रह पर अनुग्रह प्रदान करता है | कौन पिता परमेश्वर को धन्यवाद नहीं देगा या उनके पुत्र की प्रशंसा नहीं करेगा या पवित्र आत्मा की शक्ति में प्रार्थना नहीं करेगा ? अपने आपको परमेश्वर की सुख देने वाली आत्मा के प्रति खोलो तब तुम समझ पाओगे कैसे परमेश्वर वास्तव में तुम्हारी प्रार्थनाओं का उत्तर देते हैं |यीशु के नाम में प्रशंसा करो, जो कि पिता को स्वीकार्य है | उनका धन्यवाद करो, और प्रशंसा करो, क्योंकि वह तुमसे प्रेम करते हैं, उन्होंने तुम्हे पापों से छुटकारा दिलाया और तुम्हे अनंत जीवन दिया है |


०५.१२ -- अन्य लोगों के प्रति विश्वास की साक्षी

जब किसी का हृदय कृतज्ञता और प्रशंसा से भरा हो तो वह खामोश कैसे रह सकता है ? और कौन उद्धार के इस अनुभव को केवल अपने तक कैसे रह सकता है जबकि वह जानता है कि परमेश्वर सभी मनुष्यों को बचाना चाहते हैं ? बाहर निकल कर खोये हुए लोगों तक पंहुचना हमारी पसंद नहीं है, परन्तु प्रभु यीशु ने स्वयं हमें यह आज्ञा दी है कि जाओ और प्रत्येक एक को शुभ समाचार दो | यीशु मसीह की जीत और उनकी महानता की घोषणा की जानी चाहिए | उपदेशक पतरस हमसे आग्रह करते हैं, “ पर मसीह को प्रभु जानकर अपने अपने मन में पवित्र समझो, और जो कोई तुम से तुम्हारी आशा के विषय में कुछ पूछे, तो उसे उत्तर देने के लिए सर्वदा तैयार रहो,पर नम्रता और भय के साथ | ( पतरस की पहली पत्री ३ : १५ ) “ | यीशु ने भी हमें चेतावनी दी है “ जो कोई मनुष्यों के साम्हने मुझे मान लेगा, उसे मैं भी अपने स्वर्गीय पिता के साम्हने मान लूँगा | पर जो कोई मनुष्यों के साम्हने मेरा इन्कार करेगा उस से मैं भी अपने स्वर्गीय पिता के साम्हने इन्कार करूँगा |( मत्ती १०: ३२ – ३३ ) “

जब उपदेशक पौलुस परमेश्वर के सभी शत्रुओं के प्रहारों से थक हार चुके थे, परमेश्वर रात में उन्हें दिखाई दिए और उन्हें तसल्ली दी थी “ और प्रभु ने रात को दर्शन के द्वारा पौलुस से कहा, मत डर, वरन कहे जा, और चुप मत रह | क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ: और कोई तुझ पर चढाई करके तेरी हानि न करेगा; क्योंकि इस नगर में मेरे बहुत से लोग हैं | ( प्रेरितों के काम १८: ९ – १० ) “ | उन्होंने उन्हें आश्वासन दिया, “ और मैं तुझे तेरे लोगों से और अन्यजातियों से बचाता रहूंगा, जिन के पास मैं अब तुझे इसलिए भेजता हूँ | कि तू उन की आखें खोले, कि वे अन्धकार से ज्योति की ओर, और शैतान के अधिकार से परमेश्वर की ओर फिरें;कि पापों की क्षमा, और उन लोगों के साथ जो मुझ पर विश्वास करने से पवित्र किए गए हैं, मीरास पाएं | ( प्रेरितों के काम २६: १७–१८)“|

उनके पुनरुत्थान की शाम को, यीशु ने अपनी दैवीय सत्ता, भयभीत शिष्यों को जो दरवाजों को बंद करके बैठे थे, प्रदान की थी, “ जैसे पिता ने मुझे भेजा है, मैं भी तुम्हे भेजता हूँ | “ जब वे प्रकट हो चुके थे, उन्होंने अपनी श्वास उन पर फूंकी और कहा था,” यीशु ने फिर उन से कहा, तुम्हे शांति मिले; जैसे पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं भी तुम्हे भेजता हूँ | यह कहकर उस ने उन पर फूंका और उन से कहा, पवित्र आत्मा लो | जिन के पाप तुम क्षमा करो वे उन के लिए क्षमा किए गए हैं जिन के तुम रखो, वे रखे गए हैं |( यूहन्ना २० : २१ – २३ ) “ | यदि तुम इन वचनों को याद कर लो और अपने हृदय में मनन करो, तो तुम वह ताकत और मार्गदर्शन प्राप्त करोगे जो विरोध करने वाले अविश्वासियों और खोये हुए विधर्मियों के बीच सुसमाचार का प्रचार करने के लिए सर्वश्रेष्ठ एवं अत्यंत प्रभावशाली मार्ग होगा |


०५.१३ -- परमेश्वर के नाम में सेवा

जब परमेश्वर हमसे अपने वचन द्वारा बात करते हैं और हम प्रार्थना एवं स्तुति में, और उसी प्रकार से मित्रों और शत्रुओं के सामने उनके पवित्र नाम को स्वीकार करके अपना उत्तर देते हैं, तब हम इस नाम की सत्ता का अनुभव करते हैं | यीशु के नाम में उपदेशकों ने बीमारों को चंगा किया, बुरी आत्माओं को शरीरों में से बाहर निकाल दिया, मृतकों को जीवित किया, और स्वयं यीशु ने अपने शब्द द्वारा तूफानी समुद्र को शांत किया था | उन्होंने पांच रोटियों से हजारों को तृप्त किया | उन्होंने प्रायश्चित करने वाले अपराधियों के अपराधों को क्षमा एवं उन्हें अनंत जीवन आशीषित किया | यीशु ने कहा, “ इस पर यीशु ने कहा, कि मेरा पिता अब तक काम करता है, और मैं भी काम करता हूँ ( यूहन्ना ५: १७ ) “ | केवल हम ही उनका नाम नहीं लेते, वे भी हमारी कमजोरी द्वारा, कार्य करते हैं | जहाँ कहीं भी पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का, विश्वासी के हृदय में निवास होता है, परमेश्वर उसके जीवन द्वारा चमत्कार एवं आश्चर्यजनक कार्य प्रस्तुत करते हैं | इस बात का कोई औचित्य नहीं है कि उनके बच्चे कितने छोटे हैं क्योंकि यह तो स्वयं पिता ही है जो कार्यों को पूरा करते हैं |

सभी सच्चे और प्रभावशाली गवाह, विश्वासियों के जीवनों पर पाये जाते हैं: हम परमेश्वर को आशीष देते हैं और उसी समय हम उनकी अवज्ञा करते हैं | पवित्र आत्मा हमें पवित्र आचरण के लिए प्रोत्साहित करता है और हमें पवित्र करता है क्योंकि वह स्वयं पवित्र है | यीशु ने परमेश्वर की प्रार्थना में पहला शब्द सिखाया, हमारे मुहँ और आचरण के साथ परमेश्वर का नाम “ पवित्र “ या “ पावन “ माना जाए | हमारी प्रार्थनाए एक झूठ हैं और हमारी गवाही असत्य यदि हमारे जीवन परमेश्वर की शक्ति को नकारती हैं और वास्तविक नम्रता नहीं दर्शाते

सच में, हम हमारी इच्छा के विरुद्ध अपराध करते हैं परन्तु हम एकमात्र पवित्र के सम्मुख टूटे हुए बने रहते हैं | हमारे अपराध परमेश्वर की दृष्टी में साधारण बातें नहीं हैं और हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि हम अपराधों के द्वारा उन्हें दुख देते हैं |लेकिन पवित्र आत्मा, प्रत्येक प्रायश्चित करने वाले व्यक्ति के साथ निवास करता है, और आश्वासन देता है कि यीशु का लहू, उसके सभी अपराधों को धोकर स्वच्छ करता है ( १ यूहन्ना १ : १९ ) | पिता का वचन हमें विश्वास बनाये रखने और त्रयी परमेश्वर के नाम में जीने के लिए प्रोत्साहन देता है | हम उनकी लंबी यातनाओं और असाधारण प्रेम के सद्गुणों द्वारा अपने पवित्रीकरण का अनुभव करते हैं

क्या तुम वास्तव में परमेश्वर के नाम को जानते और समझते हो? क्या उनका पवित्र नाम तुम्हारी जुबान पर है? क्या प्रभु की पवित्रआत्मा तुम्हारे हृदय में निवास करता है ? तब और सिर्फ तब ही तुम पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का नाम प्रेम और सम्मान के साथ सही रूप से ले सकते हो, हमारी शुभेच्छा है कि परमेश्वर हमेशा उनका नाम व्यर्थ में ना लेने से तुम्हारी सुरक्षा करें और तुम्हारे पूरे जीवन में आनंदपूर्वक उनकी प्रंशसा करने के लिए तुम्हारी अगुवाई करें |

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