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यूहन्ना रचित सुसमाचार – ज्योती अंध्कार में चमकती है।
पवित्र शास्त्र में लिखे हुए यूहन्ना के सुसमाचार पर आधारित पाठ्यक्रम
तीसरा भाग - प्रेरितों के दल में ज्योती चमकती है (यूहन्ना 11:55 - 17:26)
ब - प्रभु भोज के बाद होने वाली घटनायें (यूहन्ना 13:1-38)

2. विश्वासघाती का रहस्य खुल गया और वो चिंतित हुआ (यूहन्ना 13:18-32)


यूहन्ना 13:21-22
“ 21 ये बातें कह कर यीशु आत्मा मे व्याकुल हुआ और यह गवाही दी, ‘मैं तुम से सच सच कहता हूँ कि तुम में से एक मुझे पकड़वाएगा |’ 22 चेले संदेह से, कि वह किस के विषय में कहता है, एक दूसरे की ओर देखने लगे |”

यीशु ने अपने चेलों को आपसी प्रेम और सेवा के विषय में बताया | आपने नम्रता और कोमलता का आदर्श उन के सामने रखा और बताया कि आपका राज निर्बलता में भी चमकता रहेगा ताकि वो जानें कि आप प्रभु हैं जो मृत्यु की घड़ी में भी घटनाओं के करने वाले और निर्देशक हैं | इस सफाई के एक हिस्से के तौर पर, यीशु ने यहूदा के छल का रहस्य खोल दिया और उसे उसका अपराध करने दिया ताकि वो अपने षडयंत्र के अनुसार ही नहीं बल्कि आस्मानी असावधानी के अनुसार भी अपना काम पूरा करे |

यीशु ने अपने चेलों को बताया कि उनमें से एक ने आप को यहूदियों की सभा को सौंप देने का निश्चय कर लिया है | यह घोषणा खुशी के त्यौहार पर विस्फोटक साबित हुई | यीशु ने यह घोषणा साधारण तौर से नहीं की, परन्तु आप स्वय: आत्मा में दुखी थे, जैसे आप लाज़र की कबर पर हुए थे | आप विशेषकर इस विचार से दुखी थे कि पिता उनका साथ छोड़ देगा | यीशु यहूदा से प्रेम करते थे और उसे चुना था | यह असम्भव लगता था कि चुना हुआ मित्र परमेश्वर के पुत्र के साथ विश्वासघात करेगा | यधपि पवित्र शास्त्र में इस घटना के संदर्भ में भजन संहिता 41:9 में लिखा है, “जो मेरी रोटी खाता था, उसने मेरे विरुद्ध लात उठाई |” इस पर चेले आपस में एक दूसरे के लिये यह सोचने लगे कि कहीं “यह विश्वासघाती तो नहीं है?” उन्हें इस बात पर विश्वास नहीं हो रह था कि क्या यह किसी के लिये सम्भव है कि विश्वासघात करने का विचार करे | उन में से हर एक के दिल में यह विचार आया कि जितनी जल्दी यीशु की ओर घ्रणा और तिरिस्कार बढ़ेगा वह यीशु का साथ छोड़ देगा | उन्हों ने अपने आप को, आप के सामने बेपरदा पाया और लज्जित थे | वे यीशु की ढूंढ़ने वाली ज्योती के सामने होने वाली दिव्य परिक्षा का सामना न कर पाये |

यूहन्ना 13:23-30
“ 23 उस के चेलों मेन से एक जिस से यीशु प्रेम रखता था, यीशु की छाती की ओर झुका हुआ बैठा था | 24 शमौन पतरस ने उसकी ओर संकेत करके उस से पूछा, ‘बता तो वह किस के विषय में कहता है ?’ 25 तब उस ने उसी तरह यीशु की छाती की ओर झुके हुए उस से पूछा, ‘हे प्रभु, वह कौन है ?’ 26 यीशु ने उत्तर दिया, ‘जिसे मैं यह रोटी का टुकड़ा डुबा कर दूँगा, वही है |’ और उस ने टुकड़ा डुबा कर शमौन इस्करियोती के पुत्र यहूदा को दिया | 27 टुकड़ा लेते ही शैतान उस में समा गया | तब यीशु ने उस से कहा, ‘जो तू करता है, तुरन्त कर |’ 28 परन्तु बैठने वालों में से किसी ने न जाना कि उस ने यह बात उस से किस लिये कही | 29 यहूदा के पास थैली रहती थी, इस लिये किसी किसी ने समझा कि यीशु उस से कह रहा है कि जो कुछ हमें पर्व के लिये चाहिए वह मोल ले, या यह कि कंगालों को कुछ दे | 30 वह टुकड़ा लेकर तुरन्त बाहर चला गया; और यह रात्रि का समय था |”

इस अशान्ती के बीच जो शीघ्र ही होने वाले विश्वासघात के कारण निर्माण हुई थी, हम प्रेममय दया के विषय में एक सुंदर गवाही को पढ़ते हैं | यूहन्ना यीशु के बाजू में बैठे हुए थे | प्रचारक यूहन्ना इस सुसमाचार में अपने नाम की चर्चा एक बार भी नहीं करते हैं, परन्तु वे यीशु के साथ अपनी घनिष्टता को सपष्ट रूप से बताते हैं, जो प्रेम का चिन्ह है | यीशु के प्रेम से बढ़ कर उनके पास कोई विशेष अधिकार न था | इस संदर्भ में वह अपने नाम का वर्णन ना करते हुए, परमेश्वर के पुत्र की महिमा करते हैं |

पतरस, यीशु से आप के विश्वासघाती का नाम पूछने के लिये शर्मा रहे थे, साथ ही साथ चुप भी नहीं रह सकते थे | उन्हों ने यूहन्ना की तरफ इशारा किया कि वह आप के विश्वासघाती का पता लगाये | यूहन्ना ने यीशु की तरफ झुक कर पूछा, “वह कौन है?”

यीशु ने इस प्रश्न का उत्तर ख़ामोशी से दिया और विश्वासघाती का नाम लिये बगैर चुपके से संकेत जरूर दिया | इस समय में यीशु अपने विश्वासघाती का नाम खुले आम नहीं बताना चाहते थे | यह सम्भव था कि यहूदा अपना इरादा बदल देता | यीशु ने अनुग्रह की रोटी तोड़ी, जो आपको उनके चेलों के साथ इकत्रित रखती थी, और निवाले को कटोरे में डुबा कर यहूदा को दिया | इस कार्य का उद्देश, चेले को अनन्त जीवन के लिये बलवान बनाना था, परन्तु यहूदा की विश्वासघात करने की इच्छा के कारण उस पर इस का कुछ प्रभाव न पड़ा, बल्कि उसे और भी कठोर बना दिया | उस का दिल अनुग्रह के लिये बन्द हो चूका था और शैतान उस में प्रवेश कर गया | कितना भयानक दृश्य ! अपनी प्रभुसत्ताधिकारी इच्छा से यीशु ने यहूदा के कठोर दिल को और भी कठोर बना दिया | जब यीशु उसे रोटी दे रहे थे तब शैतान उस के विचारों से खेल रहा था | रोटी लेने के बाद दुष्ट उस पर उतर गया | यीशु के न्याय ने विश्वासघाती को दिव्य रक्षा से वंचित कर दिया और उसे शैतान को सौंप दिया |

निवाला लेते समय यहूदा को अचानक अनुभव हुआ कि उस का भेद खुल गया है | तब यीशु की बादशाही आज्ञा ने प्रहार किया, “तेरी दुष्ट योजना को पूरा करने में देरी ना कर परन्तु तुरन्त दुष्ट को अपना इरादा पूरा करने दे, कहीं ऐसा न हो कि उस के बदले भलाई निकल आये |

चेले, यीशु के,यहूदा को जल्दी करने के लिये दी हुई आज्ञा का अर्थ समझ ना पाये | साधारणत: आप उसे समूह के लिये खाना खरीदने के लिये कहा करते थे | यूहन्ना, यहूदा के डरे हुए चेहरे को भूल ना पाये जो यीशु की उपस्तिथि की ज्योती से निकल कर बाहर के अन्धकार की ओर चला जा रहा था |

यूहन्ना 13:31-32
“ 31 जब वह बाहर चला गया तो यीशु ने कहा, ‘अब मनुष्य के पुत्र की महिमा हुई है, और परमेश्वर की महिमा उस में हुई है ; 32 [यदि उस में परमेश्वर की महिमा हुई है, ] तो परमेश्वर भी अपने में उसकी महिमा करेगा और तुरन्त करेगा |

इस विश्वासघात से यीशु कैसे महिमामंडित हुए ? बुरे कामों से अच्छा फल कैसे उत्पन्न हो सकता है ?

जब आप के चुने हुए चेले ने आप को छोड़ दिया तब यीशु को दुख हुआ | विश्वासघाती कहीं वापस ना आ जाये इस कारण आप ने अपना दुख अपने चहरे पर प्रगट होने न दिया | परन्तु यहूदा जल्दी से यहूदियों की सभा में गया, जिन्हों ने सिपाहियों को श्स्त्रसज्जित किया ताकि रात को यीशु को गिरफ्तार करें |

यीशु ने जब यहूदा को आपके पकड़वाने का इंतज़ाम करने के लिये भेजा तब आप ने राजनीतिक मसीहा बनने की शैतानी परिक्षा का ड़ट कर प्रतिरोध किया | आप ने परमेश्वर का मेमना बन कर मरना स्वीकार किया ताकि नम्रता और निर्बलता में मानव जाति का उद्धार करते, इस तरह अपनी मृत्यु के द्वारा घोषणा की, कि प्रेम का बलिदान आप की महिमा का मूल तथ्य है |

यीशु स्वय: अपनी महिमा नहीं चाहते थे परन्तु अपनी मृत्यु में पिता की महिमा चाहते थे | आप के पिता ने आप को दुनिया में भेजा ताकि आप खोये हुए लोगों का उद्धार करें | पुत्र पापी मानव जाति में अपने पिता के प्रतिबिंब का नवीकरण करना चाहता था | इस नवीकरण के लिये यीशु ने पिता को प्रगट किया और उन में परमेश्वर की पिता समान अच्छाई में विश्वास को दृढ़ किया | केवल प्रशिक्षण ही काफी नहीं है क्योंकि पाप इतना बढ़ गया है कि उस ने परमेश्वर और सृष्टि के बीच एक दीवार खड़ी कर दी है | पुत्र को अपनी जान देनी पड़ी ताकि यह दीवार टूट जाये जो हमें परमेश्वर से अलग करती है ताकि धार्मिकता की आव्यश्कता पूरी हो | यीशु की मृत्यु पिता के नाम की महिमामंडित होने की चाबी है | इस मृत्यु के बगैर पिता के बारे में सच्चा ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता है, ना ही क़ानूनी संतान आदत्तन या सही नवीकरण | यीशु ने अपने आप को नकारा ताकि आप की मृत्यु से पिता की महिमा हो; आप ने यह घोषणा भी की, कि पिता आप पर उसकी अपनी महिमा उंडेलेगा जिस से आप सारे वैभवशाली उपहारों के सोता बन जायेंगे | आप की गिरिफ्तारी और क्रूस पर चढ़ाये जाने से पहले आप ने अपना मृत्कों में से जी उठना, आसमान पर उठाया जाना और सिंहासन पर बैठना देख लिया था | यीशु को अपनी महिमा पाने के लिये मरना ज़रुरी था |

जो लोग यीशु के दुख उठाने और मृत्य से इन्कार करते हैं या इन तथ्यों को निर्बलता का चिन्ह समझते हैं वो परमेश्वर की इच्छा जो क्रूस पर स्पष्ट होती है और पुत्र की पवित्रता जिस ने कबर को फोड कर खोल दिया, समझ नहीं पाते | आप ने दिव्य बलिवेदी पर अपनी महिमा दिखाई जहाँ आप हम सब के बदले जल गये ताकि वह सब लोग जो आप पर विश्वास रखते हैं, धार्मिक ठहरें |

प्रार्थना : ऐ पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा, हम यीशु के द्वारा मिलने वाले उद्धार, आप की नम्रता, आप की सहन की हुई पीड़ा, आप की मृत्यु और पुनरुत्थान के लिये आप की प्रशंसा करते हैं | हम विश्वास करते हैं कि मसीह के खून के कारण हम ने उद्धार पाया है | हम आत्मा की शक्ति में तुझे महिमा देते हैं | आप ने हमें जीवन की पीड़ाओं और संकट से बचाया | तू जो जीवन हमें प्रदान करता है वह अनन्त है | हम विश्वास करते हैं कि तेरा पुत्र शीघ्र ही अपनी महिमा में प्रगट होगा | आमीन |

प्रश्न:

87. यहूदा के यीशु को छोड कर चले जाने के बाद यीशु ने जो महिमा प्रगट की उस का क्या अर्थ होता है ?

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