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यूहन्ना रचित सुसमाचार – ज्योती अंध्कार में चमकती है।
पवित्र शास्त्र में लिखे हुए यूहन्ना के सुसमाचार पर आधारित पाठ्यक्रम
तीसरा भाग - प्रेरितों के दल में ज्योती चमकती है (यूहन्ना 11:55 - 17:26)
ब - प्रभु भोज के बाद होने वाली घटनायें (यूहन्ना 13:1-38)

2. विश्वासघाती का रहस्य खुल गया और वो चिंतित हुआ (यूहन्ना 13:18-32)


यूहन्ना 13:18-19
“18 मैं तुम सब के विषय में नहीं कहता; जिन्हें मैं ने चुन लिया है, उन्हें मैं जानता हूँ ; परन्तु यह इसलिये है कि पवित्र शास्त्र का यह वचन पूरा हो, ‘जो मेरी रोटी खाता है, उस ने मुझ पर लात उठाई |’ 19 अब मैं उसके होने से पहले तुम्हें जताए देता हूँ कि जब यह हो जाए तो तुम विश्वास करो कि मैं वही हूँ |’”

यहूदा दुखी हो कर जीता रहा; उसे विनम्रता और सेवा से कोई लगाव न था | उस ने विद्रोह, श्रेष्ठता और विश्वासघात को अपना लिया | वह यह सब यीशु के साथ धोकेबाज़ी से करना चाहता था | उस का यह भी उद्देश रहा होगा कि यीशु बल प्रयोग से सत्ता जमा लेते | जब कि वो दिल ही दिल में यीशु का विरोधी था और चाहता था कि आप को कुचल दे और आप की मृत्यु की गुप्त योजना बनाये | वह जान न सका कि प्रेम क्या होता है और घमंडी बना बल्कि यीशु स्वय: नम्र बने | यहूदा गर्व, श्रेष्ठता और विद्रोह का मार्ग अपनाना चाहता था परन्तु यीशु नम्र और कुलीन सेवक बन कर रहना चाहते थे |

यीशु अपने चेलोंको अपने पकडे जाने के समय के लिये तैयार कर रहे थे ताकि वे आपकी दिव्यता में संदेह न करें, चाहे आप को अन्य जातियों को क्यों न सौंपा जाये | यीशु अपने व्यक्तित्व में प्रभु हैं और अपनी निर्बलता की घड़ी में “मैं जो हूँ,” कह कर पहले से ही गवाही दे रहे थे | इन शब्दों में परमेश्वर ने अपने आप को जलती हुई झाड़ी में से मूसा पर प्रगट किया था | आप अपने चेलों को अपनी दिव्यता के विषय में विश्वास को निश्चित रूप से दृढ़ करना चाहते थे ताकि वो संदेह और परिक्षा में न पड़ें |

यूहन्ना 13:20
“20 मैं तुम से सच सच कहता हूँ कि जो मेरे भेजे हुए को ग्रहण करता है, वह मुझे ग्रहण करता है; और जो मुझे ग्रहण करता है, वह मेरे भेजने वाले को ग्रहण करता है |’”

यीशु ने अपने चेलों को अपने पकडे जाने और मृत्यु के भय से मुक्त किया | आप की उन्हें दी हुई आज्ञा और आप की रक्षा उन्हें सुरक्षित रखती है | यीशु अपने अनुयायियों को भेजते हैं और उनके साथ जाते हैं | आप के सेवक अपने व्यक्तिगत नाम से नहीं बल्कि अपने प्रशंसिक प्रभु के नाम से जाते थे | जो कोई उनका स्वागत करता था वह पवित्र त्रिय पाता था | जो उन के वचन पर विश्वास करता था, परमेश्वर की सन्तान बन जाता था | यह सेवा कठिन होती है: इस के लिये आत्मत्याग और शत्रुओं से प्रेम करने और दरिद्रता में दृढ़ रहने की आवयश्कता होती है | इस के अतिरिक्त वे जानते थे कि परमेश्वर उन के अन्दर वास् करता है | वो जहाँ कहीं जाते हैं वह उनके साथ जाता है और जहाँ कहीं वह उन से सेवा कराना चाहता है, उस का आत्मा उन्हें मार्गदर्शन करता है ताकि उस के उद्देश प्राप्त हों और उस के काम पूरे हों |

प्रार्थना : ऐ प्रभु यीशु मसीह, यह जानने के लिये मेरी सहायता कीजिये कि जब तक मैं आप का सेवक नहीं बनता, मैं आप के अन्दर नहीं रह सकता | मैं आप को मेरे जीवन का नमूना बनाना चाहता हूँ ताकि मैं हमारी सभाओं में नम्र और अपने परिवारों में सेवक बना रहूँ | मुझे अपने दिल में शैतान को जगह न देने दे | मुझे सेवा केवल अपनी जीभ से नहीं बल्कि आप की शक्ती और बुद्धिमानी के द्वारा स्वय: करके दिखा ने में सहायता कीजिये |

प्रश्न:

86. मसीह के उधारण से हम क्या सीखते हैं?

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