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यूहन्ना रचित सुसमाचार – ज्योती अंध्कार में चमकती है।
पवित्र शास्त्र में लिखे हुए यूहन्ना के सुसमाचार पर आधारित पाठ्यक्रम
दूसरा भाग – दिव्य ज्योती चमकती है (यूहन्ना 5:1–11:54)
ब - यीशु जीवन की रोटी हैं (यूहन्ना 6:1-71)

5. चेलों का छोड़ कर चले जाना (यूहन्ना 6:59-71)


यूहन्ना 6:66-67
“66 इस पर उसके चेलों में से बहुत से उल्टे फिर गए और उसके बाद उसके साथ न चले | 67 तब यीशु ने उन बारहों से कहा, ‘क्या तुम भी चले जाना चाहते हो ?’”

पाँच हज़ार को खिलाने के आश्चर्यकर्म ने लोगों में गहरा उत्साह निर्माण किया | परन्तु यीशु ने इस उत्साह के पीछे छिपे हुए धोके को दिखाया जिसके कारण बहुत से लोगों को आप से दूर किया जा रहा था | आप ऊपरी उत्साह या भक्ती या किसी संदेहजनक कारण पर केवल विश्वास रखना न चाहते थे | आप दूसरा जन्म चाहते हैं कि लोग बिना किसी हिचकिचाहट के ईमानदारी के साथ आप पर विश्वास करें | ठीक इसी समय यरूशलेम के उच्च न्यायालय से भेजे हुए भेदिये आप के अनुयाईयों के बीच में घुस गये | इन भेदियों ने यीशु के ईमानदार अनुयाईयों को धमकी दी कि अगर वो इस व्यक्ती का जिसे वे छल करने वाला कहते थे, साथ देना ना छोडेंगे तो उन्हें आराधनालय से निकाल दिया जाएगा | कफरनहूम में कई लोग पीछे हट गये, इस तरह साधारण जनता बड़ी संख्या में आपके विरुध हो गई | यहाँ तक के आपके ईमानदार विश्वासी भी न्यायालय के अधिकार से डर गये | उन्हें लगा कि यीशु के धर्म सिद्धांत बडे प्रबल हैं | इस तरह केवल एक छोटी संख्या में आप के ईमानदार अनुयायी आप के साथ रह गये | मानो प्रभु गेहूँ से भूसे को अलग कर रहे थे |

इस से पहले यीशु ने अपने अनुयाईयों में से बारह प्रचारक चुन लिये थे जो आप के वंश के बारह कबीलों के प्रतीक थे | यह संख्या 3 x 4 से बनी है | वो आकाश और पृथ्वी दर्शाती है या फिर और सावधानी से कहा जाये तो पवित्र त्रिय और पृथ्वी के चारों कोने दर्शाती है | इस तरह आप के चेलों के समूह में पृथ्वी और आकाश एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और पवित्र त्रिय भी पृथ्वी के चार कोनों से जुडी हुई है |

इस बिदाई के बाद यीशु ने अपने चुने हुए चेलों को फिर से परखा कि कहीं उनका बुलाया जाना सही है या नहीं ? इस लिये आप ने उनसे पूछा, “क्या तुम भी मुझ को छोड़ कर जाना चाहते हो?” इस प्रश्न के द्वारा आप ने अपने चेलों को अपनी अगली राह तै करने पर विवश किया | इस तरह यीशु तुम से और तुम्हारे मित्रों से पूछते है कि जब तुम अशांत होते हो और तुम पर अत्याचार किया जाता है तब तुम भी आप को छोड़ देना चाहोगे या आप से मिल कर रहोगे ? सब से ज़्यादा आवयश्क क्या है, एक तरफ रीतिरिवाज़, भावुकता , विचारधारा, आर्थिक सुरक्षा या यीशु के साथ तुम्हारा संबंध ?

यूहन्ना 6:68-69
“ 68 शमौन पतरस ने उसको उत्तर दिया, ‘हे प्रभु, हम किसके पास जाएँ ? अनन्त जीवन की बातें तो तेरे ही पास हैं; 69 और हम ने विश्वास किया और जान गए हैं कि परमेश्वर का पवित्र जन तू ही है |”

पतरस ने मसीह की स्वंय उनके विषय में की हुई भविष्यवाणी की वैधत: को दर्शाया कि वे दृढ़ (ठोस) चट्टान हैं | दूसरे चेलों की तरफ से बोलते हुए पतरस ने कहा : “प्रभु, हम किस के पास जायें ? अनन्त जीवन का स्त्रोत आप ही हैं | हो सकता है कि पतरस ने यीशु के विचारों को ना समझा हो, परन्तु अपने दिल की गहराई में वो जान गये थे कि नाजरत के यीशु जो मनुष्य हैं, आस्मान से आये हुए प्रभु हैं जिन में से उतपत्ती करने वाले शब्द, नवीकरण करने की शक्ती के साथ निकलते हैं | वो केवल मनुष्य के शब्द नहीं हैं | पतरस को विश्वास था कि प्रभु उपस्थित हैं | पतरस ने रोटी बांटने में भाग लिया था | जब वो डूब रहे थे तब यीशु के हाथों ने उन्हें थाम लिया था | पतरस का दिल यीशु का निष्ठावान था | वो अपने प्रभु को दूसरी वस्तुओं से अधिक चाहते थे और आप को कभी नहीं छोड़ते थे | पतरस ने यीशु को चुन लिया था | क्योंकी यीशु ने उन्हें पहले चुना था |

प्रेरितों के नेता ने अपनी गवाही का इन शब्दों के साथ अंत किया | “हम ने विश्वास किया और जानते हैं |” ध्यान दो, पतरस ने यह नहीं कहा, “हम जान चुके थे और इस लिये विश्वास किया,” क्योंकी विश्वास दिल की दृष्टि खोल देता है | हमारा विश्वास ही हमारे मन को आलोकित करता है | इस तरह पतरस और उनके साथी जो चेले थे, परमेश्वर की आत्मा के आकर्षण से प्रभावित हुए, जिसने उन्हें मसीह पर विश्वास करने के लिये प्रेरणा दी और सच्चाई जानने के लिये ज्ञान दिया ताकी वो आपकी छिपी हुई महीमा प्राप्त करते रहें | मसीह की ओर से मिलने वाला सारा सत्य परमेश्वर के अनुग्रह से मिलने वाला सरल वरदान है |

चेलों का मसीह पर विश्वास किस प्रकार का था ? इस विश्वास का तत्व क्या था ? वे दिव्य मसीह से जुड़े हुए थे जिनमें आत्मा की परिपूर्णता समाई हुई थी | आपके अस्तित्व में याजक, राजा और भविष्यवक्ता के सभी कार्य पाये जाते हैं | पुराने नियम में राजाओं, महा याजकों और भविष्यवक्ताओं का अभीशेक पवित्र आत्मा के द्वारा किया जाता था | मसीह में सारी शक्ती और आस्मानी आशिशें जमा की गई हैं | आप सर्वसत्ताधारी दिव्य राजा हैं | साथ ही साथ आप महा याजक भी हैं जो मानव जाती का उसके सिरजनहार से मेल मिलाप कराते हैं | आप मृत्कों को जिला सकते हैं और दुनिया का न्याय करेंगे | पतरस ने विश्वास के द्वारा मसीह की महीमा देखी |

चेलों ने मिल कर एक साथ विश्वास किया और पतरस को प्रवक्ता बनाकर यह निर्णायक गवाही दी कि यह यीशु परमेश्वर के पवित्र व्यक्ती हैं ना की कोई साधारण मनुष्य बल्की सच्चे परमेश्वर भी हैं | परमेश्वर के पुत्र के रूप में परमेश्वर के सभी गुण आप में पाये जाते हैं | आप ने कभी कोई पाप नहीं किया और जैसे यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने भविष्यवाणी की थी, वैसे ही आपने परमेश्वर के मेमने के तौर पर अपना कर्तव्य निभाया | चेले आप से प्रेम करते थे और आप का सम्मान करते थे क्योंकी वो जानते थे कि आप की उपस्तिथि परमेश्वर की उपस्तिथि है | पुत्र में उन्हों ने पिता को देखा और यह समझ लिया कि परमेश्वर प्रेम है |

यूहन्ना 6:70-71
“70 यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, ‘क्या मैं ने तुम बारहों को नहीं चुना ? तौभी तुम में से एक व्यक्ति शैतान है | 71 यह उसने शमौन इस्करियोती के पुत्र यहूदा के विषय में कहा था, क्योंकि वही जो बारहों में से एक था, उसे पकड़वाने को था |”

यीशु ने इस गवाही का बड़ी प्रसन्नता के साथ स्वागत किया जो विश्वास के बढ़ने का चिन्ह था | फिर भी आप ने इस बात का अनुभव किया कि इन में से एक कई बार आप का विरोध करता रहा है | इस व्यक्ती का दिल इतना कठोर हो गया था कि यीशु ने उसे “शैतान” कहा | सभी प्रेरित चुने गये थे और पिता ने उन्हें पुत्र की ओर आकर्षित किया परन्तु वो परमेश्वर के हाथ में “रोबोट” नहीं थे जो परमेश्वर के इशारे पर चलते हों | वे आत्मा की आवाज़ की आज्ञा पालन करने या उसकी उपेक्षा करने के लिये स्वतंत्र थे | यहूदा ने जान बूझ कर परमेश्वर की आवाज़ के लिये अपने मन के द्वार बंद कर लिये और अपने आप को शैतान के हाथों सौप दिया जिसके कारण दोनों के बीच मानसिक संबंध शुरू हो गया | यहूदा ने यीशु को अकेले ना छोडा जैसे दूसरे अनुयाईयों ने किया था जो आप को छोड कर चले गये थे परन्तु वो यीशु का साथ देता रहा और एक पाखंडी की तरह विश्वासी होने का स्वांग रच रहा था | वो “झूट के पिता” का पुत्र बना और विश्वासघात में बढ़ता चला गया | जहाँ पतरस ने यीशु का मसीह होना स्वीकार किया वहां यहूदा मसीह को विश्वासघात करके उच्च न्यायालय को सौंपने का विचार कर रहा था | घ्रणा से भर कर चुपके से वो अपनी विश्वासघातक योजनायें बनाता रहा |

प्रचारक यूहन्ना इस मुख्य अध्याय को प्रेरितों को दिये गये अधिकार के द्वारा जो आश्चर्यकर्म किये थे उस के वर्णन के साथ बन्द नहीं करते हैं | बल्की इस वास्तविकता को ज़्यादा महत्व देते हैं कि विश्वासियों के समूह में एक विश्वासघाती भी था | यीशु ने उसे निकाल नहीं दिया, ना ही उसका नाम दूसरों को बताया | बल्की आप ने उसे धीरज से सहन किया, यह सोच कर की हो सकता है यहूदा अपने दिल में के इन विचारों के लिये पश्चताप करे |

प्यारे भाई, बड़ी नम्रता से अपने आप को परखो | क्या तुम परमेश्वर के पुत्र हो या शैतान की सन्तान हो? क्या तुम अपने आप को आत्मा के आकर्षण के लिये खोल देते हो या शैतान से समझौता करने के लिये राज़ी होते हो ? होशियार रहो, कहीं अपने जीवन के उद्देश को खो ना बैठो | अगर तुम आपके उद्धार को ठुकरा देते हो तो तुम बुरे रास्ते में खो जाओगे और हमेशा के लिये शैतान के बन्दी बन जाओगे | मसीह के पास लौट आओ क्योंकी वो तुम्हारी राह देख रहे हैं |

प्रार्थना: ऐ प्रभु यीशु मसीह, आप, परमेश्वर के पवित्र, दयावान, शक्तिशाली और विजयी पुत्र हैं | मेरे पापों को क्षमा कीजिये और अपने नियम में स्थिर कीजिये ताकी मैं पवित्र जीवन बिता सकूँ और आपकी उपस्तिथी में रहूँ और आप के प्रतिरूप में बदल जाऊँ | अपने अनुयाईयों को पवित्र कीजिये ताकी वो विश्वास और ज्ञान में बढें और सब के सामने गवाही दें कि केवल आप ही मसीह, जीवित परमेश्वर के पुत्र हैं | आमीन

प्रश्न:

51. पतरस की गवाही के क्या परिणाम निकलते हैं ?

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