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Home -- Hindi -- The Ten Commandments -- 08 Sixth Commandment: Do Not Murder

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विषय ६: दस आज्ञाएँ - परमेश्वर की सुरक्षा करने वाली दीवार जो मनुष्य को गिरने से बचाती हैं|
सुसमाचार की रोशनी में निर्गमन २० में दस आज्ञाओं का स्पष्टीकरण

VIII. छठी आज्ञा: तू खून न करना



निर्गमन २०:१३
तू खून न करेगा


०८.१ -- अविश्वसनीय फिर भी सत्य

एक स्त्री द्वारा जन्म लेने वाला व् उसके पिता द्वारा प्रेम किया जाने वाला प्रथम मनुष्य अपने भाई का खूनी था| इस घातक अपराध और मानवीय ह्रदय की गहराई तक पहुँचे हुए भ्रष्टचार को पवित्र शास्त्र उजागर करता है| सभी लोग अपने साथ एक खूनी के अनुवांशिक लक्षणों को लिए चलते हैं| आदम के समय से अब तक मनुष्य परमेश्वर से अलग रहता आया है जैसे कि एक पूर्णतः अहंकारी अपनी ही इच्छाओं और आशाओं द्वारा प्रेरित होता है| यदि कोई अन्य व्यक्ति अत्यधिक बलवान, समझदार, धार्मिक या सुन्दर दिखाई देता है, वह उससे ईर्ष्या करता है और उससे घृणा करता है| प्रत्येक व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से स्वयं की अन्य व्यक्तियों द्वारा देवता

समान स्तुति एवं सराहना करवाना चाहता है| परन्तु गर्व और स्वधार्मिकता विनाशकारी लक्षण हैं|

यीशु शैतान को “आरंभ से एक खूनी” कहते हैं वह मनुष्य को परमेश्वर की मित्रता से दूर हटा ले गया था| तब से हमेशा के लिए मृत्यु मनुष्यों पर नियंत्रण करती है, “क्योंकि अपराध की मजदूरी मृत्यु है|” परंतु परमेश्वर ने अपने न्याय व प्रेम के सद्गुणों द्वारा हमारे लिए उन तक वापस लौट आने का एक मार्ग उपलब्ध कराया है| जो कोई भी सुरक्षित होने की सुविधा का लाभ उठाना चाहता है, अपने मन के पुराने विचारों को निकल कर अपना नवीनीकरण करें और आज ही परमेश्वर को अपने जीवन के केंद्र के रूप में ग्रहण करें, अवश्य ही अनंत जीवन पाएंगे| यह उनके जीवन को उद्देश्य एवं अर्थ देगा| मनुष्य के पास खून करने के बहुत से कारण व प्रयोजन हैं| यीशु ने प्रकट किया है कि खून करना पहला बुरा विचार है जो मनुष्य के ह्रदय से बहार आया है| (मत्ती१५:१९) परंतु अपनी पवित्रता में परमेश्वर ने मनुष्य के बुरे उद्देश्यों का विरोध किया था और उसके बुरे लक्ष्यों को पूरा करने से मनाही दी थी जब उन्होंने आज्ञा दी थी “तू खून नहीं करेगा”| इसीलिए सभी प्रकार की हत्याएं यहाँ तक कि आत्महत्या भी, परमेश्वर की इच्छा का विरोध है और स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध खुला विद्रोह करने से कम नहीं मानी जाती है| इसके अतिरिक्त, यदि कोई, अन्य लोगों के साथ बुरा व्यवहार करता है, यदि वे लोग भूखे हैं तो न तो उनपर ध्यान देता है और न ही उनके भूखे रहने के कारण होने वाले भयंकर परिणामों के बारे में उन्हें सतर्क करता है तो वह भी एक प्रकार के हत्यारे की श्रेणी में गिना जाता है| यदि कोई व्यक्ति किसी को मार कर उसे जख्मी करता है, उसके खाने में जहर मिलाता है या उसे मार डालने के लिए किसी और व्यक्ति को उकसाता है, वह अनंत न्याय के समय सभी हत्यारों के साथ बैठेगा| यहां तक कि कोई किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुंचता है और इसके फलस्वरूप उसके जीवन को छोटा कर देता है, बाइबिल के अनुसार वह भी एक हत्यारा है (रोमियों १३: १-१८)| परमेश्वर हमें हमारे उस साथी के लिए उत्तर दायी मानेंगे, तो हम कैसे कतरा कर निकल सकते हैं और कह सकते हैं जैसे कैन ने कहा था, “क्यां मै अपने भाई का रखवाला हूँ?”


०८.२ -- दण्ड एवं प्रतिशोध

पुराने नियम में प्रत्येक हत्यारे व खूनी को रोकने एवं न्याय की पूर्ति करने के लिए, उसके विरोध में मृत्यु सन्देश का आदेश दिया गया था (निर्गमन २१:१२, १४, १८)| अधिकांश लोग एक जनजाति या समुदाय में रहते थे जो कि एक प्रकार की जीवन सुरक्षा उन्हें उपलब्ध करता था| किसी खूनी जनजातीय कलह में उलझने का भय, प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुरक्षा का एक साधन बन गया है| “एक आँख के बदले एक आँख और एक दांत के बदले एक दांत” नुकसान की मात्रा के अनुपात में दण्ड के प्रकार को निर्धारित करता है| जन-जाति के प्रमुख की हत्या में मामले में यह दंड कई गुना बढ़ गया होगा| लेमेक ने स्वयं की हत्या के बदले में ६६ लोगों की हत्या की मांग की थी (उत्पति ४:२३-२४)| कुछ जनजातियां अब तक भी, उनके किसी नेता की हत्या के मामले में नियम का पालन करते हैं| सामी संस्कृतियों में हत्या एक क्षमा करने योग्य अपराध नहीं है और एक मनुष्य का खून बहाए सिवाय इसका प्रायश्चित नहीं हो सकता है| क्षमा करना अन्याय है| लोग, अन्य लोगों की आत्मग्लानी का लाभ उठाते हैं| दुश्मनी की नफरत पीढ़ी दर पीढ़ी तक चलती रहती है चाहे इसमें पूरे राज्य उलझ जाये| चाहे पूर्व हो या पश्चिम इस प्रकार के विचार ईसाइयों के लिए विदेशी हैं| जब से मसीह ने प्रत्येक हत्यारे की ग्लानी को दूर करने के लिए अपना लहू बहाया, हमारे पास एक अलग संस्कृति है|

हत्यारा त्रस्त रहता है क्योंकि वह अपने ही दोषभार के तले दबता जाता है| जिन लोगों को उसने मार डाला था उनकी आत्माएं उसे स्वप्नों या विचारों में आकर परेशान करेंगी| एक रात, दूसरे विश्व युद्ध के एक निशाना साधने वाले ने, उन लोगों की खोपड़ियों को अपनी ओर आते और उनकी सूनी आँखों को स्वयं को घूरते हुए देखा था| यदि एक हत्यारा, एक पीढ़ी गुजरने के बाद भी, उसके स्वयं के मुस्लिम गाँव में जाता है तो उसे इस बात की पूरी आशा होना ही चाहिए कि जिस व्यक्ति को उसने मार डाला था, उसके वयस्क पुत्र द्वारा वह मार दिया जायेगा| हत्या का भुगतान नहीं होता है| परंतु यह पर्याप्त नहीं है कि हत्याओं को रोकने के उद्देश्य से लोगों को डराया या धमकाया जाए| मानवीय हृदयों से सभी बुरे विचारों को हटा देना चाहिए और उनके स्थान पर नए विचार होना चाहिए| यीशु मानवीय हृदयों के प्रयोजनों को जानते थे और इसी के साथ अप्रत्यक्ष रूप से उन्होंने सभी के लिए मृत्यु सन्देश के प्रत्येक व्यक्ति के लिए आदेश दिया जब उन्होंने कहा था, “अच्छा क्या है, इसके बारे में तू मुझसे क्यों पूछ रहा है? क्योंकि अच्छा तो केवल एक ही है! फिर भी यदि तू अनंत जीवन में प्रवेश करना चाहता है, तो तू आदेशों का पालन कर|” (मत्ती १९:१७; मरकुस १०:१८; लुका १८:१९)| लेकिन इसी समय, हत्यारों के समान हमारे दोषों का भार उन्होंने उठालिया और हमारे हृदयों में अपनी प्रेमभरी सुन्दर आत्मा को डाल दिया, जोकि, हत्या के विचारों को साफ करके हमारे अंत करणों को नयापन दे सके| यीशु ने हमें एक नया ह्रदय और एक ईमानदार आत्मा दी है, और हम में से विश्वासियों को बनाया, जो कि उनकी आज्ञाओं का पालन करें और अपने दुश्मनों से प्रेम करें|

०८.३ -- हत्या और आपसी समझौते पर ईसाई दृष्टिकोण

पहाड पर अपने उपदेश में यीशु ने हमें सिखाया था कि केवल शरीर को मार डालना ही अपराध नहीं है, परंतु किसी की मानहानि, बुराई या निंदा भी आध्यात्मिक हत्या में शामिल है| सभी प्रकार की बुराईयों, नफरतभरे झूठ, सुविचारित धमकियों, तीखी तकरारों, जानबूझ कर दिया गया श्राप, विशवासघात या उपहास, आध्यात्मिक रूप से जानलेवा है| ये पहले इन शब्दों के बोलने बाले के ह्रदय को विष देते है, इसके बाद ये अभियुक्त के दिमाग को विष देते हैं| यीशु ने कहा था “किन्तु मै तुमसे कहता हूँ कि जो व्यक्ति अपने भाई पर क्रोध करता है, उसे भी अदालत में इसके लिए उत्तर देना होगा| और जो कोई अपने भाई का अपमान करेगा उसे सर्वोच्च संघ के सामने जवाब देना होगा| और यदि कोई अपने किसी बंधू से कहे ‘अरे असभ्य मूर्ख|’ तो नरक की आग के बीच उस पर इसकी जवाब देही होगी|” (मत्ती ५:२२) इस कथन के द्वारा यीशु ने हमें दोषी घोषित किया था और एक हत्यारी आत्मा वाले के साथ बुरे ह्रदय वाले लोगो के समान, जिन्हें नरक में जाना चाहिए, हमारा न्याय किया था| हमने प्रायश्चित और स्वीकार करना चाहिए कि हम सभी के हृदयों में हत्यारे विचार हैं| नफरत भरे झगड़ों में क्रोध, ईर्ष्या, हठ, एक प्रतिशोध पूर्ण आत्मा, क्रूरता, निर्दयता की भावनाएं और कार्य होते हैं जो न केवल वयस्कों को वरन बालकों पर भी प्रहार करते हैं| कोई आश्चर्य की बात नहीं है युहन्ना ने कहा था “जो कोई भी अपने भाई से घृणा करता है, एक खूनी है” (१ युहन्ना ३:१५) हमें अपने आपको ईमानदारी पूर्वक परखना चाहिए कि कहीं हमारे ह्रदय में किसी मनुष्य के प्रति कोई नफरत भरी भावना तो नहीं है यदि है तो परमेश्वर से हमारी उस भावना पर पूर्णतया विजय पाने के लिए प्रार्थना करना चाहिए| अन्यथा यह बुरे विचार हमारे हृदयों में जड़ पकड़ सकते हैं और हमें भृष्ट कर सकते हैं| यीशु प्रत्येक उस व्यक्ति से जो परमेश्वर की प्रार्थना कहता है, उम्मीद रखते हैं कि वह प्रत्येक अन्य व्यक्ति को पूर्णरूप से क्षमा कर दे – ठीक वैसे ही जैसे परमेश्वर ने हमारे सभी अपराधों को क्षमा कर दिया है| परमेश्वर हमसे क्षमा कर देने की आशा रखते हैं| क्षमा करने की हमारी इच्छा हमें जीतने में मदद करती है और क्षमा कर देने का हमारा निर्णय, हमें हमारे शत्रुओं को नष्ट कर देने की इच्छा पर विजय दिलाता है| तुम तुम्हारे शत्रु को क्षमा करने के लिए सहमत हो परंतु अब भी तुम उसके अपराध को भूल नहीं सके हो| सावधान रहें! इस मामले में हम परमेश्वर से हमारे अपराधों को क्षमा करने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं परंतु हमारे अपराधों को भूल जाने के लिए प्रार्थना नहीं कर रहे हैं| या हम कहे, “मैं मेरे मित्र के अपराधों को क्षमा करना चाहता हूँ और मेरे विरुद्ध उसके अपराध को भूल जाना चाहता हूँ लेकिन मैं अब कभी भी उसकी सूरत देखना नहीं चाहता हूँ|” क्या तुम परमेश्वर के पास आना चाहते हो, परंतु कभी भी उनसे मिलना या उनको देखना नहीं चाहते हो? क्या तुम परमेश्वर द्वारा तुम्हारे साथ वैसा ही व्यवहार चाहते हो जैसा तुम अपने मित्र के साथ करते हो?

यीशु ने शांति प्राप्त करने के लिए हमारे लिए केवल एक मार्ग छोड़ा है, जैसा उन्होंने कहा, “किन्तु मै कहता हूँ अपने शत्रुओं से भी प्यार करो| जो तुम्हे यातनाएं देते है, उनके लिए भी प्रार्थना करो| ताकि तुम स्वर्ग में रहने वाले अपने पिता की सिद्ध संतान बन सको| क्योंकि वह बुरों और भलों सब पर सूर्य का प्रकाश चमकाता है| पापियों और धर्मियों, सब पर वर्षा कराता है|” (मत्ती ५:४४-४५) टूटे, थके हारे विश्वासियों में जो दैवीय प्रेम की शक्ति होती है के सिवाय हम अपनी नफरत पर विजय हासिल नहीं कर सकते हैं| इसीलिए, यीशु हमें असंदिग्ध रूप से चेतावनी देते है, “किन्तु यदि तुम लोगों को क्षमा नहीं करोगे तो तुम्हारा परम पिता भी तुम्हारे पापों के लिए क्षमा नहीं देगा|” (मत्ती ६:१५)

क्यों ईसाई लोगों ने अपने शत्रुओं के सभी अपराधों को क्षमा करना चाहिए जब कि प्रत्येक अपराधी को दण्ड मिलना चाहिए? क्या इस अन्याय का रुदन स्वर्ग में नहीं होगा? यह सत्य है! परमेश्वर किसी भी अपराध को दण्ड दिए बिना नहीं छोड़ सकते, जैसा कि लिखा है “बिना लहू बहाए अपराधों की क्षमा नहीं है”| इसी कारण से यीशु ने हमारे अपराधों का बोझ उठाया और हमारे स्थान पर स्वय दण्ड को झेला था| परमेश्वर का वचन कहता है, “किन्तु वह तो उन बुरे कामों के लिए बेधा जा रहा था, जो हमने किये थे| वह हमारे अपराधों के लिए कुचला जा रहा था| जो कर्ज हमें चुकाना था, यानी हमारा दण्ड था, उसे वह चुका रहा था| उसकी यातनाओं के बदले में हम चंगे (क्षमा) किये गए थे|” (यशायाह ५३:५)| यीशु, परमेश्वर के पुत्र ने हमारे व्यक्तिगत अपराध और सभी उपहास करने वालों एवं हत्यारों के अपराधों को झेला| इसीलिए हमारे पास यह विशेषाधिकार है कि हम बिना किसी आपति के प्रत्येक के अपराधों को क्षमा करें| हमारे पास अब और अधिक समय तक बिना प्रतिकार के न्याय को ढूंढने का अधिकार नहीं है| यीशु ने अपनी यातनाओं और स्थान्नापनीय मृत्यु में दैवीय न्याय की सभी शर्तों को पूरा कर दिया था| वह हमारी शांति है| कोई भी मनुष्य जो अब तक भी अपने अधिकारों के लिए लड़ता है और स्वयं अपने लिए न्याय ढूंढता है , स्वयं को दोषित करता है| प्रेम अकेला ही कानून का पूरक है| प्रेम से दूर रहने का अर्थ वापस से न्याय के क्षेत्र में प्रवेश करना है| सिर्फ यीशु अपने अनुयायियों में नए दिमागों और एक नयी इच्छा का निर्माण करते हैं और उन्हें अन्य व्यक्तियों को क्षमा करने में सहायता करते हैं जैसे परमेश्वर ने क्षमा किया है|


०८.४ -- तलवार का धर्म

जो कोई भी यीशु द्वारा प्रदान की गई क्षमा के अनुग्रह को देखता है, इस्लाम के इस आदेश को देखकर अचंभित हो जायेगा जिसके अनुसार लोग खूनी प्रतिकार को ढूंढते हैं| पवित्र युद्ध के साथ सुविचारित रूप से की जाने वाली हत्याएं एक इस्लामिक दैवीय आदेश हैं| इस्लाम धर्म की रक्षा के लिए हत्या की अनुमति देता है और एक मुस्लिम के लिए यह एक कर्तव्य है| मुहम्मद ने कुरान में लिखा था, “जहाँ भी तुम उन्हें पाओ, उन्हें पकड़ो और मार डालो”, और “उनमे से किसी को अपना मित्र या मददगार ना चुनो” (सूरा अल-निसा ४:८९, ९१; अल-बकुअरा २:१९१)| मसीह की आत्मा इन शब्दों द्वारा नहीं कहती, परंतु “आरंभ से हत्यारों” की आत्मा इन शब्दों को कहती है|

मुहममद ने स्वयं अपने शत्रुओं को, एक के बाद एक मार डाला था और व्यक्तिगत रूप से २७ युद्धों में हिस्सा लिया था| वास्तव में उसने मदीना में यहूदियों के लिए एक बहुत बड़े परिमाण वाली कब्र खोद दी थी, जिन लोगों पर उसने खन्दक के युद्ध के दौरान देशद्रोही का आरोप लगाया था|

बदर के युद्ध के समय, सभी मुस्लिम जिन्होंने अपने शत्रुओं को मार दिया था, मुहम्मद के इन शब्दों द्वारा न्यायोचित माने गए, “तुमने उन्हें नहीं मारा था परंतु अल्लाह ने उन्हें मारा था| तुम ने उन पर प्रहार नहीं किया था, जब तुमने प्रहार किया परन्तु अल्लाह ने प्रहार किया था” (सूरा-अल-अनफल ८:१७)| औसत दर्जे के मुस्लिम इस वचन की व्याख्या को अनुमोदित नहीं करते, परंतु धार्मिक आतंकवादी न्यायालयों में स्वय को न्यायोचित ठहराने के लिए इसका उपयोग करते हैं| मुहम्मद के प्रकटीकरण ने पवित्र युद्ध के समय प्रत्येक हत्या को न्यायसंगत बताया है| इससे भी और अधिक, जो भी इस्लामिक युद्ध में विधर्मियों के विरुद्ध मरता है, वह सीधा स्वर्ग में जाता है, जहाँ अवर्णनीय इन्द्रियगत सुख उसकी प्रतीक्षा करते हैं| दूसरी ओर एक मुस्लिम को दूसरे मुस्लिम को सोचविचार करके मारने की अनुमति नहीं है, क्योंकि इस्लामिक कानून के अनुसार ऐसी हत्या क्षमा करने योग्य नहीं है| लेकिन मूर्ति पूजक और अमुस्लिम लोगों के लिए कोई सुरक्षा प्रदान नहीं की गई है| प्रत्येक वस्तु एवं जीव में आत्मा होती है ऐसा मानने वाले लोगों की हत्या एक प्रकार से अच्छा कार्य माना जाता है जो हत्यारे के लिए स्वर्गीय पुरुस्कार लाता है|

इस्लामिक कानून में हमारे प्रति न्याय की धारणा को हम बिल्कुल बाहर ही पाते हैं| बहाये गये खून का ऊंचा मूल्य, अल-डीया, प्रतिकार का स्थान ले सकता है| लेकिन फिर भी यातायात दुर्घतटनाओं और कार-भिडंत जैसी घटनाओं के समय, इस्लामिक कानून वाले राज्यों में, विधिसम्मत या अविधिसम्मत रूप से एक आँख के बदले एक आँख, एक दांत के बदले एक दांत का कानून ही लागू होता है| कदाचित ही समझौता संभव है, क्योंकि इस्लामिक न्याय को अपने स्वयं के प्रकार के प्रायश्चित की आवश्यकता है जो माँग करता है कि सत्य और न्याय का अभ्यास बिना किसी दया के किया जाए| मुस्लिम लोगों के पास एक स्थान्नापन या एक परमेश्वर का मेमना नहीं है जिसने अनंत छुटकारे को स्थापित किया था| वे परमेश्वर के अनुग्रह को नहीं जानते, जिसने सत्य की माँग पर विजय पाई है| तो उन्होंने कानून का पालन अनुग्रह के बिना करना चाहिए|


०८.५ -- पहाड़ पर प्रवचन जिहाद का विरोधी

पुराने नियम में जीवन न्याय पर आधारित था| मूसा के नियम के अंतर्गत जीवन का हर क्षेत्र आता था, न केवल नागरिक कानून परंतु धार्मिक पद्धतियाँ भी इसके अधीन थी| अतः राज्य की धार्मिक सत्ताओं के लिए, कानून के विरुद्ध अतिक्रमण करने वाले को दण्ड भोगने के लिए बाध्य करना अनिवार्य था| पुराने नियम और कानून एवं सरकार की इस्लामिक समझ का परिणाम धार्मिक युद्ध होना ही अनिवार्य है| लेकिन तब से जब से यीशु मसीह ने उपदेश दिया था कि प्रत्येक व्यक्ति ने अपने शत्रुओं से प्रेम करना चाहिए, और इसका अभ्यास करना चाहिए, सभी धार्मिक युद्ध उनकी दैवीय धर्मजता खो चुके हैं| धर्मयुद्ध या जिहाद एक अपराध है और धर्म का राजनैतिक सत्ता के साथ संबध जोड़ते हुए एक कदम और पीछे को ले जाता है| यीशु ने उनके उपदेशकों को संसार में सुसमाचार का प्रचार करने के लिए तलवारों के साथ नहीं भेजा था| इसके विपरीत उन्होंने पतरस से कहा था, “अपनी तलवार को म्यान में रखे| जो तलवार चलाते हैं वे तलवार से ही मारे जायेंगे|” (मत्ती २६:५२) यीशु पवित्र होते हुए भी, अपने शत्रुओं को देवदूतों के समूह के साथ नष्ट करना ठुकरा चुके थे, एवं स्वयं अपनी इच्छा पूर्वक सूली पर चले गए एवं मर गए| मसीह की आत्मा पूर्णतः मुहम्मद की आत्मा से विपरीत है| यीशु ने पहाड़ पर अपने प्रवचन में प्रचार किया था, “तुमने सुना है: कहा गया है, ‘आँख के बदले आँख और दांत के बदले दांत’ किन्तु मै तुझ से कहता हूँ कि किसी बुरे व्यक्ति का भी विरोध मत कर| बल्कि यदि कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल भी उसकी तरफ कर दे|” (मत्ती ५:३८,३९) अतः यीशु, पुराने मार्ग जो आत्मा-रक्षा के अधिकार का दावा करता है, पर विजयी हुए थे| सूली पर यीशु की मृत्यु में उनकी शारीरिक कमजोरियां और प्रेम, विश्वास एवं आशा की उनकी आध्यात्मिक शक्तियां ही शैतान पर विजय पाने, व दैवीय कानून की संपूर्ण शर्तों को पूरा करने का एक मात्र मार्ग थे|

एक ईसाई व्यक्ति को संकट पूर्ण प्रश्न का सामना करना पड़ता है: मुझे क्या करना चाहिए यदि मै सेना में भरती हुआ हूँ और मुझे आधुनिक हथियारों का उपयोग करना पड़े और हो सकता है बाद में युद्ध में लड़ना पड़े? एक बड़े राज्य में एक विश्वासी नागरिक या एक गैर ईसाई देश में ईसाई अल्पसंख्यक के एक सदस्य के लिए इसका अर्थ क्या है? इतिहास की विभीन्न अवस्थाओं में विभिन्न विश्वासियों ने इस कठिन प्रश्न का उत्तर भिन्न भिन्न दिया था| कुछ भाई उनके शातिपूर्वक इरादों के कारण जेल में फेंके जाने और मसीह के लिए शहीदों के समान मरने के लिए तैयार थे| अन्य लोग परमेश्वर द्वारा चुनी गयी सत्ता के आज्ञाकारी बने रहना चाहते थे| वे हत्या विरुद्ध कानून को एक व्यक्तिगत मामले के रूप में मानते हैं जो केवल उनके व्यक्तिगत जीवनों से जुडा हुआ होता है| वे दावा करते हैं कि वे किसी से घृणा नहीं करते, परंतु अपने देश की सुरक्षा करना चाहते हैं| वे अपने शत्रुओं से प्रेम करने और इसी के साथ अपनी सरकारों के प्रति विश्वसनीय बने रहने का अथक प्रयास करते हैं| वे परमेश्वर के आने वाले राज्य को एक अनंत आध्यात्मिक राज्य के रूप में मानते हैं, परंतु इस जगत के वर्त्तमान राज्य को एक अपरिहार्य अनिवार्यता के रूप में स्वीकार करते थे| प्रत्येक व्यक्ति जिसे यह प्रश्न कठिन लगता है, सच्चे मन से परमेश्वर का मार्गदर्शन ढूंढेगा| उसे उचित उत्तर मिलेगा| लेकिन ऐसे विश्वासी को उन लोगों को जिन्होंने इसके विरुद्ध निर्णय लिया है को छोड़कर स्वयं अपने आप को सचेत रहने की आवश्यकता है| देश व परिवार का उत्तरदायित्व उसी प्रकार से परमेश्वर की एक आज्ञा है जैसे अपने शत्रुओं से प्रेम करना एक आज्ञा है|


०८.६ -- आधुनिक हत्यारे

पहाड़ पर दिया गया प्रवचन, जिसमे नए समझौते के अंतर्गत राज्य का वर्णन है, व्यवहार में केवल व्यक्तिगत स्तर पर लागू होता है| ऐसा प्रतीत होता है कि अभी वह समय नहीं आया है कि इसका प्रयोग राजनैतिक स्तर पर किया जाए| जब कोई हिन्सापूर्वक शांति बनाये रखने का प्रदर्शन करता है, इससे यह दिखता है कि उसे पहाड़ पर के प्रवचन का गलत अर्थ समझ में आया है ठीक उसी प्रकार से जैसे वह लोग जो झूठे मानवतावादी उद्देश्यों से गर्भपात को विश्वव्यापी रूप से समर्थन देते हैं| यह इतिहास में प्रतिबद्ध सबसे अधिक घिनौना अपराध है| लाखों में जीवित भ्रूणों की गर्भाशय में ही हत्या हुई है| बहुत सी माताएं एवं पिता अपने अन्तःकरण में हत्या के दंश को सहन करते हैं| हम लोग एक हत्यारों की पीढ़ी में जी रहे हैं|

हजारों लोगों का दसवां अंश यातायात दुर्घटनाओं में न तो संयोगवश या आधुनिक तकनीक के कारण, परंतु शराब के नशे में, सीमित गति से अधिक गाड़ी चलाने से या थकावट के कारण ग्रस्त हैं| यदि हम छठी आज्ञा का पालन करना चाहते हैं हमें यातायात दुर्घटनाओं को मानव हत्या के समान समझना चाहिए और हठपूर्वक हमारे कार चलाने के तरीकों में परिवर्तन ढूँढना चाहिए| हमें नम्र आत्म संयम में, परमेश्वर की सुरक्षा को खोजते हुए, उनसे हमें धैर्य देने के लिए प्रार्थना करते हुए कार चलाना चाहिए|

हम पर्यावरणिक प्रदूषण के युग में जी रहे है, जब हवा, पानी और खाद्य पदार्थ विषैले हैं| शायद परमेश्वर का प्रकोप कम हो जाये यदि हम अपने आसपास के पर्यावरण को सही प्रकार से प्रेमपूर्वक देख भाल करें और अपनी आँखे उनकी और लगाकर, पूछे कि हम किस प्रकार से उचित जीवन जियें| इस प्रकार से हम अपने संसार को सुरक्षित रख सकते है, और स्वयं इसे नष्ट ना करने का संघर्ष कर सकते हैं| अत्यधिक खाना आत्महत्या का एक छिपा रूप है कि हजारों से लोग हमारे इस आरामदायक समाज में इसमें लिप्त हैं, धीरे धीरे अपने आपको मार रहे हैं| अन्य लोग गलत प्रकार से यौन संबधी मामलों में लिप्त हैं, और उनके शरीर, आत्मा और जीवनी शक्ति को तहस नहस करते हैं| जो कोई भी किसी और से ईर्ष्या करता है या स्वार्थी है, अवसाद व अकेलेपन से पीड़ित है, जो उनके जीवन को छोटा कर देते हैं| अनियमित नींद और गंदे मैले रहना एक व्यक्ति का अपने स्वयं के शरीर के विरोध में किया जाने वाला अपराध है क्योंकि हम स्वयं अपने नहीं, परंतु परमेश्वर के हैं|

यीशु ने हमें आत्म सिद्धि के लिए नहीं आत्मा त्याग के लिए कहा था जब उन्होंने कहा था, “जो कोई अपना जीवन बचाना चाहता है, उसे वह खोना होगा| किन्तु जो कोई मेरे लिए अपना जीवन खोएगा, वही उसे बचाएगा|” (मत्ती १६:२५) पौलुस ने भी जोर दिया था “क्योंकि परमेश्वर का राज्य बस खाना-पीना नहीं है बल्कि वह तो धार्मिकता है, शांति है, और पवित्र आत्मा से प्राप्त आनंद है|” (रोमियो १४:१७) नियमित आध्यात्मिक जीवन, नियमित शारीरिक जीवन का निर्माण करता है और यह ह्रदय दिमाग में शांति द्वारा आता है|

छठी आज्ञा सभी प्रकार की हत्याओं को निषेध करती है और इसी के साथ प्रेम के अच्छे कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करती है| यह हममें उन लोगों के लिए जो अत्यंत दीन हीन अवस्था में जी रहे हैं के लिए सहानुभूति जगाने का प्रयास करती है| किसी जरुरतमन्द व्यक्ति के पास से, हमें उसे अनदेखा करके निकल नहीं जाना चाहिए परंतु उसके लिए हमने समय निकलना चाहिए और जितना संभव हो सके उसकी सहायता करनी चाहिए| परमेश्वर के प्रेम के अवतार यीशु ने हमें दर्शाया था कि व्यवहार में इस आज्ञा का पालन कैसे करना चाहिए| यदि हम उनसे ज्ञान के लिए प्रार्थना करें उनकी आत्मा हमारा मार्गदर्शन करती है| यह यीशु ही हैं जो हत्यारों को उनके प्रेम की संतानों के रूप में परिवर्तन कर सकते हैं और उनकी आद्यात्मिक चंगाई के नुकसान से उनको बचाने के लिए भी सहायता कर सकते हैं| यह तब हो सकता है जब हम उन्हें सभी वैधों के वैध यीशु की ओर दिखाते हैं, जो उनको नया कर देते हैं और आतंरिक रूप से पवित्र करते हैं एवं उनके अन्दर जो हत्यारे की आत्मा है उसमे परवर्तन करके एक सेवा करने वाली और प्रेम करने वाली आत्मा में बदल देते हैं|

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