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Home -- Hindi -- The Ten Commandments -- 07 Fifth Commandment: Honor Your Father and Your Mother

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विषय ६: दस आज्ञाएँ - परमेश्वर की सुरक्षा करने वाली दीवार जो मनुष्य को गिरने से बचाती हैं|

सुसमाचार की रोशनी में निर्गमन २० में दस आज्ञाओं का स्पष्टीकरण

VII – पांचवी आज्ञा : अपने माता और पिता का सम्मान करो



निर्गमन २०:१२
तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना, जिस से जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उस में तू बहुत दिन तक रहने पाए


०७.१ -- परमेश्वर का उपहार : परिवार

परिवार स्वर्ग के शेषांश का एक अंश और बहुमूल्य मोती है | परमेश्वर ने अपने प्रेम और महिमा का अक्स दर्शाने के लिए और संख्या में बढकर इस पृथ्वी को फिर से भरने के लिए मानव की, पुरूष एवं स्त्री के रूप में रचना की थी | तो परिवार मानवीय जीवन और सभी संस्कृतियों की नीवं का केन्द्र है | यह संरक्षण, सुरक्षा और भाईचारा उपलब्ध करता है, और अधिकतर यह सभी नई सैद्धान्तिक्ताओं से अधिक बलवान सिद्ध होता है |

सभी धर्म आमतौर से इस बात के लिए सहमत हैं कि पालकों को आदर देना चाहिए | यह बच्चों के लिए स्वाभाविक सी बात है कि अपने माता पिता से प्रेम करें व उन्हें सम्मान दें | जब साम्यवाद ने नास्तिक सैद्धांतिकता के साथ पालकों के पद पर प्रश्न उठाया यह धारणा सृष्टिकर्ता और सृष्टि, और मानवीय व्यवहार के प्राकृतिक एवं नैसर्गिक मानदंडों के विरुद्ध गयी | परमेश्वर परिवार की पांचवी आज्ञा के साथ सुरक्षा करते हैं | यह हमारे लिए उचित है कि हम परिवार की संस्था, इसके आगमन और प्रेम व एकता के इसके रहस्यमयी बंधनों के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करें |

पांचवी आज्ञा में, परमेश्वर ने ना केवल पिता को, परिवार के प्रमुख होने के नाते, और परिवार के लिए धन कमाने के कारण, परन्तु माता को भी एवं सामान्य रूप से महिलाओं को भी सम्मान देने की आज्ञा दी है | पुरुष के समान महिला को भी अपने जीवन में परमेश्वर की छबि दर्शाने और पारिवारिक उत्तरदायित्वों को अपने पति के साथ एक समान रूप से बाँटने के लिए कहा गया है | कोई आश्चर्य नहीं पुराने और नये नियम दोनों पिता के साथ माता को भी आदर देने के लिए सहमत हैं |

परिवार को पालना पोसना और बनाये रखने के लिए आज्ञा स्वाभाविक एवं प्राकृतिक है | यहाँ तक कि जानवरों की दुनिया में भी, छोटे बच्चे अपनी माता का अनुसरण करते हैं, और नर एवं मादा पक्षी एक के बाद एक कुछ समय के लिए अण्डों पर बैठते हैं | वो दोनों बच्चों को खाना खिलाते हैं जबतक कि वे स्वयं खाने योग्य न हो जायें | सृष्टिकर्ता द्वारा बनाये गये कुछ प्राकृतिक बंधन और रिश्ते हैं जिनको तोड़ने वाला बिना दंड के नहीं रह सकता | फिर भी आज हमें कुछ विद्रोही आवाजे सुनाई देती हैं जो बच्चों को लुभाती हैं और उनके हृदयों को कठोर करती हैं “ अपने माता पिता की बात मत सुनो या अपने आपको उनको समर्पित मत करो | इसके बदले अपने लिए सोचो, अपने आपको संतुष्ट रखो और अपनी बाल्यावस्था से अपनी इच्छा से विद्रोह का अभ्यास करो |” ऐसे बच्चों का हर्षोल्लास उन्हें बुझा कर नष्ट कर चुका है, उनकी आँखे अवज्ञा के साथ ऐसी विषादपूर्ण दिखाई देती हैं | उनके हृदयों के आधारभूत हिस्से कारूणिक रूप से तहस नहस हो चुके रहते हैं |


०७.२ -- पालकों का बलिदान

पिता और माताओं के पास नई पीढ़ी में हिस्सा लेने का विशेषाधिकार है | प्रत्येक बच्चे का निर्माण अपने आप में एक अद्भुत चमत्कार है | हो सकता है कि बच्चे ने अपने माता पिता की इच्छा के बिना जन्म लिया हो | फिर भी सृष्टि के इस दैवीय कार्य में माता पिता हिस्सेदार हैं | माता के शरीर में बच्चे को पीढ़ियों की अनुवांशिकता को जन्म देने की अनुमति देकर परमेश्वर ने उनको आदर दिया था | इसलिए मनुष्य ने प्रत्येक बच्चे के जन्म पर सृष्टिकर्ता के सामने साष्टांग दंडवत करते हुए स्तुति एवं धन्यवाद करना चाहिए |

हमारी माताएं हमें नौ महीनों, लगभग २७५ रात और दिन अपने गर्भ में धारण करती हैं | हम वहाँ सुरक्षित रहते हैं और हमारी आवश्यकताओं को वहाँ पूरा किया जाता है | हम उसकी खुशी, क्रोध, दुख, टूटन को बांटते हैं | शायद हमारे जन्म से पहले हमारी माताएं हमारे लिए प्रार्थना करती हों | हमारे जन्म की क्रिया उसके लिए भय और तकलीफ का कारण है |

एक पिता और माता हमारे साथ वर्षों वर्ष रहते हैं |वे हमारे शरीर और अवयवों को बढते देखते हैं, और हमारी मुस्कानों एवं घोर वेदनाओं की अनुक्रिया देते हैं | वे हमारे अस्तित्व व विकास के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं | यदि हमारे पालक यीशु के प्राधिकार तले विकसित हुए हैं वे अवश्य ही हमें हमारे स्वर्गीय पिता को विश्वासपूर्वक सौंपते हैं, हमें उनकी आज्ञाओं का ज्ञान देते हैं और हमारे हृदयों को सृष्टिकर्ता और भले गडरिये पर विश्वास करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं | इस प्रकार से, जितना हम उन्हें जान पाए हैं उससे कहीं अधिक वे हमें प्रेम व आशीषें देते हैं | वे रात और दिन हमारी देखभाल करते हैं | वे हमें भोजन व कपड़े उपलब्ध कराने के लिए प्रयास करते हैं | वे हमारी शिक्षा व मित्रता के साथ स्वयं को व्यस्त रखते हैं | जब हम बीमार और ज्वर से पीड़ित होते हैं वे आशंकितरूप से बिस्तर में हमारी निगरानी करते हैं | वे हमारे साथ आनंद मनाते हैं और हमारी वेदनाओं के समय हमारे साथ रोते हैं |


०७.३ -- पारिवारिक समस्याएं

पालकों एवं बच्चों के बीच एक ऐसा निकट बंधन होता है जिसके पारस्परिक प्रेम और विश्वास स्वस्पष्ट हैं या इसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है | तो भी हम स्वर्ग समान परिवार में बहुत अधिक समय तक नहीं रहते हैं | ऐसा कोई बच्चा नहीं है जो स्वयं ही अच्छा है और पालक परमेश्वर के सामने उसके लिए अपने आप को दोषी ना मानते हों | इसलिए वयस्क और जवान केवल परमेश्वर के अनुग्रह और लगातार उनकी आपसी क्षमाशीलता द्वारा जीते हैं | परिवारों में क्षमा और धीरज के बिना चिरस्थायी शांति नही रहती है | परिवार में अपने अपराधों को स्वीकार एवं उनके लिए विनम्रतापूर्वक क्षमा मांगने के अलावा शांति की पुनर्स्थापना नहीं हो सकती है | वह बच्चे आशीषित हैं जिन्हें पालकों द्वारा प्रेम और क्षमा के साथ पाला पोसा गया है |

यह केवल पालकों की इच्छा ही नहीं है कि उनके बच्चों का मार्गदर्शन सही विश्वास में हो क्योंकि यह परमेश्वर के पुत्र की आज्ञा है कि सभी बच्चों को उनके पास आशीषित करने के लिए लाया जाए | पालकों ने यीशु के सत्व और समग्रता को बच्चों के सामने प्रदर्शित करना चाहिए, उनकी आज्ञाओं का पालन करने के लिए उनका मार्गदर्शन करना चाहिए और उनके वादों को उनके मनों में अच्छी तरह से बैठा देना चाहिए | पिता और माता दोनों अपने बच्चों को आध्यात्मिक शिक्षा देने के लिए उत्तरदायी हैं , लेकिन यह बात उन्हें जानना चाहिए कि वे अपना स्वयं का विश्वास बच्चों के नाम वसीयत के समान उनपर दबाव डालकर उसे स्वीकार करने के लिए उन्हें बाध्य नहीं कर सकते हैं | प्रत्येक बच्चे को स्वयं चुनना है कि वह स्वयं परमेश्वर के लिए या परमेश्वर के विरोध में हैं | तिस पर भी यह बच्चों के लिए अच्छा है कि यह जान ले कि उनके पालकों की आशिषें उनकी पीढ़ियों तक के लिए चलती रहती हैं |

पालकों ने अपने बच्चों को बिगाड़ना या आलसी नहीं बनाना चाहिए| उनसे ऐसी बातें करने के लिए नहीं कहना चाहिए जो उनके लिए उनकी आयु के हिसाब से कठिन हो | यह बुद्धिमानी की बात है कि एक प्रचुर मात्रा में समय बच्चों को बच्चे बने रहने के लिए दिया जाए | पाठशाला या व्यावसायिक अभ्यास महत्वपूर्ण हैं परन्तु बच्चों का पालन पोषण करने से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है | बच्चों में परमेश्वर का भय और उनमें उनका अंत: करण, ईमानदारी, निष्ठा, कर्मठता, और पवित्रता का निर्माण करने के लिए अपने सृष्टिकर्ता से प्रेम को जगाना अधिक महत्वपूर्ण है | यह माता पिता के लिए अनिवार्य है कि वे बच्चों के साथ पर्याप्त समय बिताए और उनके प्रश्नों व समस्याओं को सुनें | इन सबसे भी अधिक यह महत्वपूर्ण है कि पालक अपने बच्चों के लिए निरंतर यह प्रार्थना करें कि यीशु के साथ अपना जीवन बिताने के लिए उनका जन्म वापस से हो |

बच्चे किशोरावस्था एवं तरूणाई की आयु में अपने पालकों के आमने सामने आयेंगे | स्वतंत्रता की ओर यह विकास साधारण रूप से परिपक्वता की एक अवस्था है जिससे अप्रसन्नता नहीं दिखाना चाहिए | यदि पालक बच्चों को शीघ्र ही त्रयी परमेश्वर की देखरेख में छोड़ देते हैं, वे उन बच्चों की कडी निगरानी या अत्यधिक सख्ती किए बिना, इन संकटपूर्ण वर्षों में धीरज के साथ उनके सहायक हो सकते हैं | इस समय किशोर बच्चों ने अपने आप को ज्ञानप्रद पुस्तकों, समझदार मित्रों, चुने हुए साफ सुथरे दूरदर्शन कार्यक्रमों, और ईसाई जवान बच्चों के साथ जीवंत बाइबिल शिक्षा में जो उनके लिए उपयोगी है, में व्यस्त रखना चाहिए | पुराने प्रकार की जीवन शैली के लिए बच्चों पर दबाव डालने से, उनके हृदयों को कठोर करनेवाले एवं उनके हृदय के दरवाजों को बंद करनेवाली अनियन्त्रणता का जन्म होता है |

पालक होते हुए हमें हमेशा यीशु की चेतावनी ध्यान में रखना चाहिए: “ पर जो कोई इन छोटों में से जो मुझ पर विश्वास करते हैं एक को ठोकर खिलाए, उसके लिए भला होता, कि बड़ी चक्की का पाट उसके गले में लटकाया जाता, और वह गहिरे समुद्र में डुबाया जाता ( मत्ती १८:६ ) “ | “ अपराध का कारण “ का अर्थ क्रोध या विरोध की प्रतिक्रिया नहीं है परन्तु झूठ बोलने, चोरी करने की ओर उन्हें उकसाना या उन्हें एक विशेष प्रकार के अपराध में बंधने की, बिना किसी चेतावनी के, अनुमति देना है | एक आशीषित लालन पालन केवल परमेश्वर के प्रेम और भय से ही आता है |

वैज्ञानिक प्रगति के हमारे शिष्टतापूर्ण युग में बच्चों को पालक “ पिछड़े “ हुए दिखाई देते हैं | कभी कभी एक विकासशील देश में एक माता या पिता पढ़ या लिख नहीं सकते हैं | एक सुशिक्षित बच्चे का यह अधिकार नहीं है कि वह घमंड करे या उनका उपहास करे | यह बात ना केवल निरादरपूर्ण है परन्तु मन्दबुद्धि व मूर्खतापूर्ण है | पढ़ने लिखने की क्षमता यह नहीं दर्शाती कि एक इन्सान कितना बुद्धिमान है | उच्च शिक्षा विद्यार्थी की अच्छाई या पवित्रता को नहीं बढाती है | पालकों का अधिकार इस बात पर आधारित नहीं है कि उनके पास कितनी उपाधियाँ हैं या कितना पैसा उन लोगों ने जमा किया है | उनका अधिकार परमेश्वर की इच्छा, और कैसे वे अनुग्रह के सिहांसन के सामने अपने बच्चों के लिए मध्यस्थता करते हैं, पर पाया जाता है | परमेश्वर का पितृत्व पालकों के हृदयों में करूणामय प्रेम बूंद बूंद करके भरता है | मसीह का बलिदान, पालकों और बच्चों दोनों में एक दूसरे के लिए बिना किसी शर्त के सेवा व त्याग करने की इच्छा का निर्माण करता है |


०७.४ -- पांचवी आज्ञा की शर्तें पूरी करना

बच्चें अपने पालकों का आदर कैसे कर सकते हैं ? हमारा अंत:करण उनसे प्रेम व आदर करने के लिए कहता है क्योंकि पृथ्वी पर जो भी हम जानते हैं या जिस पर भी हमारा अधिकार है उन सबसे अधिक मूल्यवान हमारे लिए वे हैं | यह विश्वास और आज्ञाकारिता, आत्मत्याग से जुड़ा रहता है और स्वार्थपूर्ण प्रयोजनों को आने नहीं देता है | एक बच्चे ने अपने माता या पिता को जानबूझकर या गलती से भी कभी मारना नहीं चाहिए | एक बच्चे के पास नहीं, परन्तु केवल परमेश्वर के पास परिवार के केंद्रबिंदु की उपाधि है | यीशु ने परमसुखी परिवार की कुंजी हमें सिखाई जब उन्होंने कहा था,”जैसे कि मनुष्य का पुत्र, वह इसलिए नहीं आया कि उस की सेवा टहल की जाए, परन्तु इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे: और बहुतों की छुडौती के लिए अपने प्राण दे ( मत्ती २०:२८ ) “ | परमेश्वर के पुत्र ने पालकों और बच्चों को जागरूकतापूर्वक इस सिद्धांत को परिवार के प्रत्येक दिन के जीवन में पालन करने की शिक्षा दी है |

क्या बच्चों के पालकों के प्रति उत्तरदायित्व समाप्त हो जाते हैं जब उनके अपने परिवार हो जाते हैं? नहीं जब पालक बड़ी उम्र के हो जाते हैं और मानसिक एवं शारीरिक रूप से कमजोर हो जाते हैं उनको उनके बच्चों की करूणा एवं देखरेख की आवश्यकता पहले से अधिक होती है | पुत्र एवं पुत्रियां एक निश्चित समय अपने पालकों को समर्पित कर सकते हैं वैसे ही जैसे उनके पालकों ने उनकी बाल्यावस्था के आरंभिक दिनों में जाने कितने ही त्याग करते हुए अपना समय उनके लिए दिया था | कोई भी परिचर्यागृह या पेंशन, बच्चों द्वारा अपने माता पिता के लिए समय, पैसे और प्रयासों के त्याग से ऊपर नहीं है |

पांचवी आज्ञा ने पहली बार एक स्पष्ट वादा परमेश्वर के प्रंसविदाबध्द पितृत्व पर जोर देने के बाद हमें प्रदान किया है | वह जो अपने माता पिता की करूणामयी रूप से देखभाल करता है, उससे इस पृथ्वी पर कम शिकायतों एवं अधिक आशीषों के साथ एक लंबे जीवन का वादा है | जब कहीं भी पालकों की गरिमा को सुरक्षित रखा जाता है, और जहाँ पालक और बच्चे परमेश्वर के मार्ग पर चलते हुए जीवन जीते हैं, वे इस वादे के पूरे होने का अनुभव एक साथ करेंगे |

परमेश्वर ने पालकों से, एवं अपने अधीन रहने वाले लोगों से घृणा करने से मना किया है | इसके अंतर्गत, दुर्व्यवहार, अन्याय, धोखा और छल सम्मिलित है | क्या यीशु ने नहीं कहा था, “तब राजा उन्हें उत्तर देगा, मैं तुम से सच कहता हूँ, कि तुम ने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया ( मत्ती: २५: ४० ) “ | क्या तुम्हें दाउद के विरुद्ध उसके पुत्र अबशालोम के विद्रोह की कहानी याद है ? इसका अंत विद्रोही की मृत्यु के साथ होता है ( २ शमूएल १५: १-१२, १८: १-८ ) |

हमने निर्गमन की पुस्तक २१:१५-१७ में पढ़ा था , नीतिवचन २०:२० कहता है “ जो अपने माता पिता को कोसता,उसका दिया बुझ जाता, और घोर अंधकार हो जाता है “ | व्यवस्थाविवरण २१:१८-२१ कहता है “ यदि किसी के हठीला और दंगैत बेटा हो, जो अपने माता पिता की बात न माने, किन्तु ताडना देने पर भी उनकी न सुने, तो उसके माता पिता उसे पकडकर अपने नगर से बाहर फाटक के निकट नगर के सियानों के पास ले जाए, और वे नगर के सियानों से कहें, कि हमारा यह बेटा हठीला और दंगैत है, यह हमारी नहीं सुनता; यह उडाऊऔर पियक्कड है | तब उस नगर के सब पुरूष उसको पत्थरवाह करके मार डाले, यों तू अपने मध्य में से ऐसी बुराई को दूर करना, तब सारे इस्राएली सुनकर भय खाएंगे | “ जो कोई भी अपने माता पिता का विरोध और विद्रोह करता है और यदि वह प्रायश्चित नहीं करता, सभी लोगों के प्रति एक खतरा बन जाता है | समाज की स्थिरता बच्चों के प्रेम और आज्ञाकारिता पर उन दिनों और आज भी टिकी हुई है |

परमेश्वर ने स्पष्टरूप से केवल बच्चों को नहीं परन्तु पालकों को भी चेतावनी दी है | बच्चों को बड़े लोगों द्वारा “ खिलौना “ ना बनाया जाए क्योंकि प्रत्येक बच्चा परमेश्वर द्वारा बड़े विश्वास से पालकों को सौंपा गया है | यहाँ यीशु का वादा एक अलग प्रकार से पूरा होता है “ तब राजा उन्हें उत्तर देगा, मैं तुम से सच कहता हूँ, कि तुम ने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया ( मत्ती:२५:४० ) “ | उपदेशक पौलुस ने भी बच्चों को परेशान करने या अत्यधिक बोझ उन पर डालने के विरोध में चेतावनी दी है, “और हे बच्चोवालों अपने बच्चों को रिस न दिलाओ परन्तु प्रभु की शिक्षा, और चेतावनी देते हुए, उन का पालन पोषण करो ( इफिसियों ६:४) “ | “ हे बच्चेवालों, अपने बालकों को तंग न करो , न हो कि उन का साहस टूट जाए ( कुलुस्सियों ३: २१ ) “ | पालक बहुत अधिक नरमी या लापरवाह भी नहीं होने चाहिए | वे अनावश्यकरूप से क्रूर या हठी भी नहीं होने चाहिए | उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि जो गुण बच्चों को आनुवंशिकता में मिले हैं वे उसका प्रदर्शन करते हैं | इसके अतिरिक्त वंशानुगत अपराध और कमजोरियां, उनके अपराध से संतुष्ट बने रहने की अनुमति नहीं देते, परन्तु पालकों को विनम्रता की ओर ले जाते हैं | विनम्रता सौम्य आत्मा का निर्माण करती है जो उनके बच्च्चों को उचित व्यवहार करने की ओर उनकी अगुवाई करती है | इसलिए पालकों और बच्चों ने यीशु से निरंतर प्रार्थना करनी चाहिए कि वे उन्हें उनके मनों की नवीनता व प्रायश्चित प्रदान करें |


०७.५ -- इस्लाम धर्म से परिवर्तित लोग और उनके पालक

यहाँ केवल एक ऐसा उदाहरण है जहाँ बच्चे अपने पालकों की आज्ञा का पालन न करें: यदि वे उन्हें परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध व्यवहार करने के लिए कहते हैं | बाइबिल में स्पष्टरूप से लिखा है, “ तब पतरस और, और प्रेरितों ने उत्तर दिया, कि मनुष्यों की आज्ञा से बढ़कर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना ही कर्तव्य कर्म है ( प्रेरितों के काम: ५:२९ ) “ | आज इस्लामी और यहूदी दोनों में एक बढ़ती हुई संख्या में ऐसे जवान लोग हैं जो अपने पिता के विश्वास का अनुसरण अब और अधिक नहीं करते, क्योंकि वे यीशु से मिल चुके हैं और उनको अपना व्यक्तिगत रक्षक मानते हैं | यह एक दर्दनाक तनाव का निर्माण करता है, क्योंकि पवित्र आत्मा द्वारा परमेश्वर का प्रेम उनके हृदयों में उंडेला गया है और वे एक मूलभूत आध्यात्मिक एवं नैतिक परिवर्तन का अनुभव कर चुके हैं | यह उन्हें उनके पालकों से पहले से भी और अधिक प्रेम करने में सहायता करता है | उन्हें बुद्धिमानी की बहुत अधिक आवश्यकता है ताकि वे पालकों के विश्वास के बारे में बात करने के बजाय अपने अच्छे कार्यों पर अपना ध्यान केंद्रित करें | धीरज एक सद्गुण है, बच्चों ने सच्चे हृदय से, अपने पालकों के लिए जो ईसाई नहीं हैं, प्रार्थना करनी चाहिए तो अनुग्रह द्वारा वे भी परिवर्तित हो जाएँगे | उन बच्चों ने जितना अधिक उनसे मिलने जा सकते हैं जाना चाहिए, क्योंकि हमारे पालकों से अधिक इस जगत में हमसे प्रेम और कोई नहीं करता है |

लेकिन यदि पालक निष्ठुरतापूर्वक यीशु की आत्मा का विरोध करते हैं और अपने बच्चों पर उनके रक्षक को छोड़ देने के लिए दबाव डालते हैं और इस्लामिक शरिया के अनुसार उन्हें मार डालने की धमकी देते हैं, तो यह उनसे अलग हो जाने का समय है | कुछ पालकों की ईसाई विरोधी आत्माओं को दंड व ठुकरा देना चाहिए | परन्तु पालकों से प्रेम और आदर बिना रुके करना चाहिए | इसके अतिरिक्त यीशु के शब्द हमारा मार्गदर्शन करते हैं, “ जो माता या पिता को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं और जो बेटा या बेटी को मुझ से अधिक प्रिय जानता है,वह मेरे योग्य नहीं ( मत्ती:१०:३७) “ | यदि पालक धार्मिक कारणों के लिए अपने बच्चों के प्रति क्रूर व अन्यायी हैं, तब भावनात्मक बंधनों,सांस्कृतिक नियंत्रणों या आर्थिक निर्भरता को बच्चों के अन्तिम निर्णय को प्रभावित करने के लिए उपयोग में लाया जाता है | इसी कारण से यीशु ने उन सभी संबधियों से, जो उनके सुसमाचार का विरोध करते हैं, पूरी तरह से अलग रहने के लिए कहा है कि कहीं ऐसा न हो कि वे विश्वास पर से हमारा ध्यान बंटा दें | कुछ उदाहरणों में यीशु को पूर्ण रूप से सुपुर्दगी के कारण माता पिता से पूरी तरह अलगाव आवश्यक होता है | जब यह होता है उन पालकों और साथ ही साथ बच्चों को भी असहनीय रूप से तकलीफ होती है, फिर भी परमेश्वर का प्रेम, इस जगत के हमारे प्रिय लोगों की भावनाओं से अधिक महान है |

एक कलीसिया के विश्वासी, धर्म परिवर्तकों को तुरंत सहायता करने और अपने आप को उन लोगों के साथ भाईयों, बहनों, माताओं और पिताओं समान व्यवहार करने के लिए समर्पित माने जाते हैं | इसमें व्यावसायिक प्रशिक्षण या शिक्षा संबधी और बाद में उसी प्रकार से विवाह संबधी मामले भी सम्मिलित हैं | जिस प्रकार से पालकों का प्रेम अंतहीन है ठीक उसी प्रकार से नये सदस्यों के लिए कलीसिया का प्रेम, अनुचित आचरण करने की स्थिति में भी अंतहीन होना चाहिए | जो विश्वासी एक नये धर्मपरिवर्तक को स्वीकार करते हैं, मसीह का प्रेम और धीरज उनके लिए कसौटी है |


०७.६ -- निष्कर्ष

परिवार में प्रेम परमेश्वर के प्रेम का प्रतिबिम्ब है | अनंत परमेश्वर हमारे पिता हैं, और उन्होंने हमें अपने परिवार में हमेशा के लिए सम्मिलित करने के लिए, यीशु मसीह के नाम में बुलाया है | वे हमें अपने पुत्र के लहू से स्वच्छ करने, उनके साथ मित्रता में बने रहने के लिए और पवित्र आत्मा द्वारा हमें पुनर्जीवन देने के लिए बुलाते हैं | यदि हमने अपने माता पिता को किसी दुर्घटना या प्रतिकूल परिस्थितियों में खो दिया है, हमें हार नहीं जाना चाहिए परन्तु दाउद के साथ स्वीकार करना चाहिए, “ मेरे माता पिता ने तो मुझे छोड़ दिया है,परन्तु यहोवा मुझे सम्भाल लेगा ( भजन संहिता २७:१० ) “ | सभी मानवीय प्रेम सीमित होते हैं, परन्तु हमारे परमेश्वर हमें अपने अप्रतिबंधित प्रेम के साथ स्वीकार करते हैं और हमें गले लगाकर थाम लेते हैं | अपव्ययी पुत्र की कहानी , खोये हुए को स्वीकार करने के बारे में हमें बताती है कि कैसे एक पिता घमंडी,पवित्र पुत्र को दूसरे बचाए हुए पुत्र के लिए प्रेम और दया दिखाने का यकीन दिलाने का प्रयास करता है | पिता अपने दोनों पुत्रों से प्रेम करता था और दोनों को साथ लाने का भरसक प्रयास करता है | पिता परमेश्वर के साथ मित्रता हमारे जीवनों में शांति और प्रशांति का स्त्रोत हैं | कभी कभी परमेश्वर इस पृथ्वी पर हमें संतों के साथ संगति का विशेषाधिकार देते हैं | तो हमें हमारे सांसारिक परिवार और उनके स्वर्गीय परिवार के सदस्यों में गिने जाने के लिए हमारे पिता जो कि स्वर्ग में हैं, का धन्यवाद हमेशा करना चाहिए |

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