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Home -- Hindi -- The Ten Commandments -- 06 Fourth Commandment: Remember the Sabbath Day, to Keep it Holy

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विषय ६: दस आज्ञाएँ - परमेश्वर की सुरक्षा करने वाली दीवार जो मनुष्य को गिरने से बचाती हैं|
सुसमाचार की रोशनी में निर्गमन २० में दस आज्ञाओं का स्पष्टीकरण

VI – चौथी आज्ञा: सब्त के दिन को याद रखो, इसे पवित्र रखो



निर्गमन २०:८-११
सब्त को एक विशेष दिन के रूप में मानने का ध्यान रखना| किन्तु सातवाँ दिन तुम्हारे परमेश्वर यहोवा की प्रतिष्ठा में आराम का दिन है| इसलिए उस दिन कोई व्यक्ति चाहे तुम, या तुम्हारे पुत्र और पुत्रियां तुम्हारे दास और दासियाँ , पशु तथा तुम्हारे नगर में रहने वाले सभी विदेशी काम नहीं करेंगे| क्यों? क्योंकि यहोवा ने छ: दिन काम किया और आकाश, धरती, सागर, और चीजें बनी| और सातवे दिन परमेश्वर ने आराम किया| इस प्रकार यहोवा ने शनिवार को वरदान दिया कि उसे आराम के पवित्र दिन के रूप में मनाया जाएगा| यहोवा ने उसे बहुत ही विशेष दिन के रूप में स्थापित किया|


०६.१ -- सृष्टिकर्ता की प्रशंसा करने के लिए विश्राम का दिन

यहूदियों के लिए सब्त, परमेश्वर के साथ किए गये समझौते का एक चिन्ह है| आराधना के लिए नियुक्त किया गया यह दिन पुराने नियम के लोगों को अन्य राज्यों से अलग दर्शाता है| यहाँ तक कि आज भी, पुराने नियम के लोग, सप्ताह के इस अन्तिम दिन को पवित्र मानते हैं और अन्य दिनों के समान कार्य नहीं करते हैं| वे आग नही जलाते या लंबी यात्रा पर नहीं निकलते, इसके स्थान पर वे उत्सव दिनों के लिए रखे गये नये कपडे पहनते हैं| सब्त का अभिप्राय आनंद से है, जैसे आराधना के लिए लोग एक जगह इकठ्ठा होकर, एक स्तुति के वातावरण में तोराह के कुछ चुने हुए लेखाशों को पढकर उस पर विचार विमर्श करें| परमेश्वर के दिन पर, विश्वासियों ने अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक समय परमेश्वर के साथ बिताना चाहिए| लोगों ने अपने हृदयों और विचारों को परमेश्वर पर केंद्रित करना चाहिए क्योंकि वही उनके सृष्टिकर्ता, बचाने वाले और सुख देने वाले हैं |

सप्ताह के अन्य दिनों में हमें बाईबिल पढ़ने, अच्छे प्रवचन सुनाने, और स्तुति के गीतों के साथ प्रार्थना में हिस्सा लेने की आदत बनानी चाहिए जो हमें हमारी रेगिस्तान यात्रा की थकावट के बीच में जीवित और शांत रखेगी| यद्यपि ना तो मनुष्य ना ही उसके कोई और परंतु स्वयं परमेश्वर इस दिन पर केंद्रित करते हैं| इस प्रकार से सब्त परमेश्वर का दिन बन गया| उन्होंने इस दिन को एकाकीरूप से अलग रखा है, इसे पवित्र किया है, आशीषित किया है| परमेश्वर का दिन परमेश्वर की ओर से उनकी सृष्टि के लिए एक बेहद मूल्यवान उपहार है|

सब्त को पवित्र करने का अर्थ यह है कि हम सृष्टिकर्ता, जिन्होंने स्वर्ग और पृथ्वी, सितारें, सूखा मैदान और पेड अपने पराक्रमी शब्द द्वारा बनाये, की प्रशंसा करें| उन्होंने मछलियों, चिडियाएँ और सभी छोटे और बड़े जानवरों को बनाया| परमेश्वर की स्वयं की छबि में मनुष्य की रचना, उनके सृजन की शिखरता थी| उनके निर्माण में, प्रत्येक प्राणी एक अनोखे रूप में, बुद्धि और शक्ति के साथ एक चमत्कारिक रचना है| वैज्ञानिक मानव शरीर के कुछ रहस्यों उसकी आत्माकी क्षमताओं और महत्ताओं को सुलझा पाये हैं| परमेश्वर का कार्य कितना अद्भुत है और यदि उनकी रचना इतनी सुंदर है, उससे कहीं अधिक सृष्टिकर्ता स्वयं कितने सुंदर हैं| मानवीय भाषा उनकी महानता, महिमा और सर्वसमर्थत्ता को पूरी तरह से हस्तांतरित नहीं कर पाती है| उनकी सभी रचनाओं की ओर से उनकी आराधना एवं प्रशंसा उनका अधिकार है|

जब परमेश्वर ने सृजन के अपने लक्ष्य को पूरा कर लिया, उन्होंने विश्राम किया| वह अपने कार्य से थक नहीं गये थे क्योंकि सर्वशक्तिमान कभी ना थकते हैं, ना झपकी लेते हैं ना सोते हैं, निश्चय ही वह अपने कार्य से संतुष्ट हुए, उन्होंने अनगिनत महान आश्चर्यजनक वस्तुएँ, मनुष्यों की रचना की और उन्हें देखकर उन्हें बहुत अच्छा लगा और प्रसन्न हुए| यह हमारे लिए उपयुक्त है कि हम प्रत्येक दिन और विशेषरूप से परमेश्वर के दिन पर, उनकी सृष्टि के अथाह चमत्कारों के लिए उनकी स्तुति एवं प्रशंसा करें|


०६.२ -- सब्त के दिन विश्राम की आवश्यकता

सब्त दिन के दौरान, हमारे पास परमेश्वर के स्वर्गीय विश्राम में, जिसकी योजना उन्होंने हमारे लिए बनायी है, हिस्सा लेने का विशेषाधिकार है| वह हमें अथाह शांति और आराधना का सुअवसर देते हैं| परमेश्वर के सामने यह अंदरूनी और बाहरी शांति हमारी सुख समृद्धि की कुंजी है| ऐसा कोई नहीं जिसने इस आज्ञा का उल्लंघन किया और जिसे दंड ना मिला हों| भूतपूर्व सोवियत यूनियन जैसे राष्ट्र या दक्षिण की बड़ी कंपनियां, प्रभु के दिन से दूर चले जाने के कारण अपने दिमाग की शांति खो चुकी हैं| वह जो इस दिन को अनदेखा करते है और अपनी कारों में ही भागते रहते है परमेश्वर की रचना की महिमा को नहीं बढ़ाते हैं| वे ध्यान-मनन करने की क्षमता को खोते हैं और सप्ताह के दौरान आनेवाले सभी दिनों में इसका असर उनके कार्य पर पड़ता है| प्रत्येक को, यहाँ तक कि जानवरों को भी विश्राम की आवश्यकता है, और परमेश्वर के सामने शांत बने रहने के सिवाय सृष्टि अपनी शक्ति को वापस प्राप्त नहीं कर सकती है| हमें परमेश्वर की इस आज्ञा को कभी भी अनदेखा नहीं करना चाहिए कि हम सब्त के दिन को पवित्र रखें | हम देख सकते हैं कि यह आज्ञा एक सप्ताह में ३५ या ४० घंटे कार्य करने के लिए नहीं परन्तु लगभग छ: दिन कठिन परिश्रम करने के लिए कहती है | परन्तु सातवाँ दिन पूरी तरह से परमेश्वर के लिए है | बाइबिल हमें सिखाती है कि सुस्त जीवन ही सभी दुर्गुणों का प्रारंभ है, और प्रतिदिन कार्य ही मनुष्य के लिए लाभदायक है |

यीशु हमें प्रोत्साहित करते हैं कि प्रत्येक अब और तब को छोड़कर मैदान के लिली और अन्य फूलों को देखें कि वे कैसे विकसित हुए हैं | क्या तुमने कभी ध्यान दिया है कि इन फूलों को खिलने में कितना समय लगा है, क्योंकि पहले पत्ते इतने विकसित होना चाहिए कि वे फलों का भार सहन कर पायें ? रुको और अपनी आखें खोलों | प्रकृति के दबाव और नियमों के बारे में जानों, तब तुम इसके पीछे बुद्धिमान सृष्टिकर्ता और पितामयी अच्छाइयों को देख सकोगे | यीशु हमें सुझाव देते हैं कि हम फूलों की चमकदमक और रंगों की, अमीर लोगों के शानदार पहनावे से तुलना करें तो हम यह वास्तव में जान पाएंगे कि राजाओं और राजकुमारों की पोशाखें भी उतनी सुंदर नहीं हैं जितने कि यह विभिन्न प्रकार के फूल हैं, जो कि शीघ्र ही मुर्झा और समाप्त हो जायेंगे | परमेश्वर द्वारा निर्मित सभी प्राणियों में मनुष्य स्वयं सबसे अधिक सुंदर है, और उसका मुख,परमेश्वर की महिमा केवल कुछ मात्रा में दिखाता है | ओह, तो हमें हमारे जीने के तरीके बदलना चाहिए, भागते रहना छोडना चाहिए और सोचने के लिए समय देना चाहिए | जब हम ऐसा करते हैं हम एकाएक ही सृष्टि की विस्मयकारी सुंदरता में परमेश्वर का धन्यवाद और उनकी प्रशंसा में चले जायेंगे | दुर्भाग्यवश कुछ ऐसे असंगत दूरदर्शन कार्यक्रम हैं जो अश्लीलता एवं हिंसा प्रदर्शित करते हैं जबकि परमेश्वर हमारी आँखे, बसंत, ग्रीष्म, पतझड, और शीत के दिनों में आश्चर्यों को दिखाना चाहते हैं जिसका उन्होंने निर्माण किया है, और पूरी तरह से सुरक्षित रखा है |

जब परमेश्वर ने आज्ञा दी कि सब्त को मानो, वह यह चाहते हैं कि इस दिन को अलग रखा जाए तो मनुष्य इसमें यह सीख पायेगा कि परमेश्वर के सामने कैसे जीवन जीना चाहिए | परमेश्वर के इस दिन को पवित्र रखने का अर्थ यह नहीं है कि केवल विश्राम या परमेश्वर के वचन को सुनना और पढ़ना है, परन्तु अपने पूरे हृदय के साथ उनकी ओर मुड जाना है ताकि वह हममें परिवर्तन कर सकें और अच्छाइयों से हमें भर सकें | वह पवित्र हैं, और वह चाहते हैं कि हम भी पवित्र रहें | तो हमें उनके प्रेम के प्रकाश में आगे बढ़ना है, क्योंकि मौन और शांति के बिना कोई नवीकरण नहीं है |


०६.३ -- सब्त के बारे में भ्रान्ति

पुराने नियम के लोगों को सब्त दिन ने पतन से सुरक्षित किया था और अन्य अनेक देवताओं जिनकी पूजा उनके आसपास के अन्य राज्यों द्वारा की जाती थी, से अलग कर दिया था | इस दिन पर केन्द्रीयकरण करने द्वारा वे मसीह, इस संसार के रक्षक के आगमन के लिए भी तैयार हो गए थे | फिर भी सब्त उन विश्वासियों का जो इसे मानते थे, परिवर्तन, सुरक्षा व नवीकरण करने में अक्षम था | सभी मनुष्य परमेश्वर के सामने कमजोर, बुरे और अपरिपूर्ण दिखाई देते हैं | ना कोई नियम मानवीयता को बदल सकता है ना ही सब्त मनुष्य को उसके सभी अपराधों से मुक्त कर सकता है | परन्तु यह उसे नास्तिकता में फिसलने से रोक सकता है | नए नियम में हम परमेश्वर के दिन को उनका अनुग्रह प्राप्त करने के प्रति नहीं, परन्तु निशिचत ही, उन्होंने हमारी रचना की, इसके लिये उनका धन्यवाद करने के रूप में मनाते हैं | उन्होंने मनुष्य के रूप में अवतार लिया और मसीह के रूप में आये और एक पिता जितना अपने बच्चों का ध्यान रखता है उससे कहीं अधिक हमारा ध्यान रखते हैं | इस कारण से हम उनसे प्रेम करते हैं और उनका आदर करते हैं | नियमों का पालन करना, हमें अपराधों से बचा नहीं पायेगा, परन्तु परमेश्वर का अनुग्रह ही हमारे उद्धार और सुरक्षा का रहस्य है | जो कोई भी नियमों द्वारा न्यायोचित होना चाहता है इसके द्वारा दोषित माना जायेगा | परन्तु यदि तुम यीशु के हाथ तक पहुंच कर उसे पकड़ लेते हो, जो उन्होंने तुम्हारे लिये फैलाया है, वह इन सभी दोषों व दण्डो से तुम्हारी सुरक्षा व तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे |

सातवें दिन परमेश्वर ने विश्राम किया और अपने कार्य को देखा था | उन्होंने देखा कि सब कुछ बहुत अच्छा है | निश्चित ही परमेश्वर का पवित्र किया गया विश्राम बंद हो गया था जब मनुष्य अवज्ञा करने लगा और अपराधों में घिरने लगा | परमेश्वर ने विश्राम करना बंद कर दिया और तब से अब तक रात और दिन कार्य करने लगे ताकि वे अपनी बर्बाद होती जा रही सृष्टि को बचा पायें | उन्होंने कहा, “तू मेरे लिये सुगन्धित नरकट रूपये से मोल नहीं लाया और न मेलबलियों की चर्बी से मुझे तृप्त किया | परन्तु तू ने अपने पापों के कारण मुझ पर बोझ लाद दिया है, और अपने अधर्म के कामों से मुझे थका दिया है ( यशायाह ४३ : २४ ) “ | यीशु ने प्रमाणित किया है “ इस पर यीशु ने उन से कहा, कि मेरा पिता अब तक काम करता है, और मैं भी काम करता हूँ ( यूहन्ना ५: १७ ) “ | परमेश्वर गहराईपूर्वक हमारे और हमारे भद्दे अपराधों के बारे में चिंतित हैं, परन्तु हम परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं कि मसीह के स्थान्नापनीय बलिदान द्वारा हम सभी अपराधियों का छुटकारा संभव हुआ है | जो कोई भी परमेश्वर के मेमने पर विश्वास करता है न्याय के कानून के अंतर्गत नहीं आएगा, परन्तु निश्चित ही वह यीशु के लहू द्वारा पूर्णत: न्यायोचित किया जायेगा | यीशु मारे गये और एकदम सब्त के पहले दिन दफनाये गये थे | उन्होंने एक अमीर आदमी की कब्र में उस दिन जो परमेश्वर का विश्राम दिन है, विश्राम किया था | वह सप्ताह के पहले दिन मृतकों में से जी उठे, और इस प्रकार से परमेश्वर ने सब्त दिन की अनिवार्यताओं को भी पूरा किया | उनके पुनरूत्थान द्वारा, उन्होंने एक नये दिन को तय किया, जो कि नई सृष्टि का प्रतीक है जो कि न्याय के कानून पर नहीं, परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह व पवित्र आत्मा की शक्ति पर विकसित होता है |


०६.४ -- क्या ईसाईलोगों के पास शनिवार के स्थान पर रविवार को पर्व मनाने का अधिकार है?

प्राय: ही यहूदी और सेवंथ डे एडविनट्स ईसाईयों पर चौथी आज्ञा तोड़ने का आरोप लगाते हैं और यह भविष्यवाणी करते हैं कि परमेश्वर का क्रोध मसीह के अनुयायियों पर भडकेगा क्योंकि वे शनिवार के स्थान पर रविवार को विश्राम का दिन मानते हैं | यद्यपि यीशु ने कहा था कि वे सब्त के प्रभु हैं | हमारी ओर से मनुष्य के पुत्र ने सब्त की सभी मांगे पूरी की थी | उन्होंने इसे पूरा किया था |यीशु ने एक निश्चित दिन, महीना या वर्ष को पवित्र करने के लिये कोई नया कानून लागू नहीं किया था | उन्होंने अपने अनुयायियों को बचाया और उन्हें पवित्र किया | मनुष्य ने ना केवल सब्त या कुछ विशेष दिनों में, परन्तु प्रत्येक दिन परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए | इसलिए यीशु ने दिनों की अपेक्षा व्यक्तिगत रूप से पवित्र किया है “ और वचन से या काम से जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो ( कुलुस्सियों ३: १७ ) “ | प्रत्येक कार्य जो हम पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में करते हैं, वह एक प्रकार से परमेश्वर की उपासना है | एक दिन, दूसरे दिन की अपेक्षा कम महत्वपूर्ण नहीं है | यीशु ने अपने मूल्यवान लहू से हमें न्यायोचित कराया और पवित्र आत्मा के साथ हमारा नवीनीकरण किया | उन्होंने दिनों को नहीं लोगों को पवित्र किया था | पृथ्वी पर उनके आने का उद्देश्य उस कार्य को पूर्ण करना था जो सब्त नहीं कर पाया था | नये लोगों की रचना, अपराधियों को उनके पवित्र अनुयायियों में परिवर्तित करना, और स्वार्थी लोगों को सेवकों में बदल देना, यही उनका उद्देश्य था |

हमारे आध्यात्मिक जीवन के प्रत्येक पहलू में यीशु ने क्रांति लाई है | इसलिए ईसाइयों ने रविवार, यीशु के जी उठने का दिन, उनकी नयी सृष्टि के साथ नये समझौते को मनाने के लिए चुन लिया | परन्तु यीशु चाहते थे कि अनुयायी उनकी नयी सृष्टि का एक भाग होने के विशेषाधिकार पर ध्यान मनन के साथ विश्राम भी करें | उन्होंने हमें रविवार को मनाने की आज्ञा नहीं दी, ना ही हमें सब्त को मनाने से मनाही की आज्ञा दी | उनका हमारे लिए यह मत कभी नहीं रहा कि हम कुछ निश्चित दिनों या पर्वों को कठोरतापूर्वक माने, परन्तु वे अपराधियों को बचाने आये थे | यीशु का पुनर्जीवन एक नये युग के प्रारंभ का संकेत है ताकि हम अब और अधिक दोषी ठहराने वाले कानून के अंतर्गत नहीं बल्कि हमारे परमेश्वर के बचाने वाले अनुग्रह के अंतर्गत रहें | इसका अर्थ यह भी नहीं है कि ईसाई नियमरहित लोग हैं | मसीह की आत्मा जो हममें निवास करती है स्वयं प्रेम का नियम है और ठीक उसी समय वह इसे पूरा करने की शक्ति भी हमें प्रदान करती है | सब्त पुराने कमजोर नियम के प्रतीक के समान रह गया है, परन्तु रविवार मसीह की विजय का चिन्ह है, जो नये समझौते का निशान है |

इस्लामिक देशों के कुछ विश्वासी रविवार या शनिवार ( सब्त ) के दिन विश्राम नहीं कर सकते हैं | इसलिए, वे शुक्रवार को एक साथ एकत्रित होते हैं, यह जानते हुए कि परमेश्वर स्वयं हमारे साथ हैं जैसा कि उन्होंने वादा किया था “ क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं, वहाँ मैं उन के बीच में होता हूँ ( मत्ती १८ : २० ) “ | यीशु कुछ निश्चित दिनों को आराधना के लिए नियुक्त करना नहीं चाहते थे, परन्तु निश्चित ही हमेशा और हर स्थान पर विश्वासियों को पवित्र करना चाहते हैं |


०६.५ -- रविवार मनाना

ईसाई लोग अपने परमेश्वर के दिन को पवित्र करते हैं? प्रेम उन लोगों को याजकों की संगती में एक साथ रविवार के दिन एकत्रित होकर आराधना करने, बाइबिल पढ़ने और प्रशंसा करने के लिए प्रोत्साहित करता है | हमारे बच्चे, मेहमान, साथी कर्मचारी, यहाँ तक कि अपने निवास स्थानों में रहने वाले जानवर, हमसे विश्राम और पुनरूत्थान के दैवीय आनंद के इस दिन में जुड सकते हैं, जोकि हर रविवार को स्मरण किया जाता है और हमारे जीवनों में अवतरित होता है | ईसाईयों के आनंद का आधार यहूदियों से अधिक गहरा है | यीशु ने कहा था “ मैं ने ये बातें तुम से इसलिए कही हैं, कि मेरा आनंद तुम में बना रहे, और तुम्हारा आनंद पूरा हो जाए ( यूहन्ना १५: ११ ) और “ परन्तु अब मैं तेरे पास आता हूँ , और ये बातें जगत में कहता हूँ, कि वे मेरा आनंद अपने में पूरा पायें ( यूहन्ना १७: १३ ) “ | पौलुस ने भी कहा था, “ प्रभु में सदा आनन्दित रहो; मैं फिर कहता हूँ, आनन्दित रहो ( फिलिप्पियों ४: ४ ) | “ पर आत्मा का फल प्रेम, आनंद, मेल, धीरज, कृपा, भलाई,विश्वास, नम्रता और संयम है; ऐसे ऐसे कामों के विरोध में कोई भी व्यवस्था नहीं | (गलतियों ५: २२ ) “ | ऐसे कुछ वचन हमें रविवार की आत्मा का सारांश दर्शाती है | परन्तु वे सप्ताह के बाकी दिनों के हमारे कार्यों की आत्मा को भी बतलाते हैं, वे हमें दर्शाते हैं कि ईसाई परिवार में जीवन जीना कैसा होना चाहिए |

क्या रविवार के दिन हमें कार्य करना चाहिए | दूसरे लोगों के समान ईसाई भी सामान्य मनुष्य हैं | उनके शरीर हैं जो थक जाते हैं | इसलिए उन्हें विश्राम की आवश्यकता है |वे सामान्य प्राणी हैं और साथ ही वे आत्मा में परमेश्वर के बच्चे हैं | वे हाड मांस के रूप में पृथ्वी पर और आध्यात्मिक रूप से स्वर्ग में मसीह के साथ बैठते हैं | वे परमेश्वर के दिन को विश्राम का दिन मानने से इन्कार नहीं करते | मूलरूप से रविवार का दिन सोने के लिए नहीं है परन्तु पिता परमेश्वर की महिमा और प्रशंसा करने के लिए है | यह दिन परमेश्वर का है और हमें अनावश्यक रूप से दूसरे कार्य नहीं करने चाहिए | इसके अतिरिक्त जब काम प्रेम और कर्तव्य का हो तो हमें उससे भागना नहीं चाहिए जिससे हम अन्य लोगों को खतरों से छुडा सके | हमारी पवित्रता का आधार नियमों को पूरा करना नहीं परन्तु मसीह की क्षतिपूर्ति मृत्यु है जिन्होंने हमारे हृदयों में बलिदान की संकल्पना को धीरे धीरे भर दिया है | रविवार के दिन सार्वजनिक आराधना और अन्य आध्यात्मिक सभाओं में जाना ईसाइयों के लिए विशेषाधिकार कोष है | परन्तु ईसाइयों के लिए इतना पर्याप्त नहीं है कि केवल रविवार को आध्यात्मिक भोज करें, उन्हें प्रत्येक दिन उनका यह भोज खाना चाहिए अन्यथा विश्वास, प्रेम और आशा कमजोर हो जाएँगे | रविवार हमें समुदाय में गाने, एक साथ में प्रार्थना करने, अपनी कलीसिया के अन्य सदस्यों के साथ, ईसाई एकता को अनुभव करने की दिशा में एक दूसरे के साथ विचारों का आदान प्रदान करने का सुअवसर देता है |सभी विश्वासी एक साथ, मसीह का आध्यात्मिक शरीर है | व्यक्तिगत रूप से विश्वासी का नईसृष्टि में प्रमुख स्थान नहीं है, निश्चित ही संतो के साथ सहभागिता विशेष रूप से रविवार के दिन देखी जा सकती है |

आशीषित हैं वह लोग जो रविवार के दिन बीमार, विकलांग और गरीब लोगों से मिलने जाते हैं | यह विश्वासी अपनी कारों में पेट्रोल के नाप को नहीं देखते, यह देखने के लिए कि यदि १०० किलोमीटर और जाना है तो ईधन पर्याप्त मात्रा में है या नहीं है |

परमेश्वर की आत्मा हमारी अगुवाई करती है कि हम गिरजाघरों से बाहर निकल कर, अपराध में मृत लोगों की खोज करें | हम ने उन लोगों को मसीह में प्रायश्चित का मार्गदर्शन करने के लिए बुलाना चाहिए, ताकि वे अपनी निराशा एवं कठोरता से ऊपर उठ पायें | अविश्वासियों को मसीह के बारे में साक्षी न देना, क्षमा करने योग्य बात नहीं है | परमेश्वर के दिन हम लोगों ने, जरूरतमंद व्यक्तियों एवं आवश्यक वस्तुओं से वंचित लोगों के लिए परोपकारी कार्य करने के लिए भी बुलाना चाहिए |

रविवार हमें परमेश्वर को धन्यवाद देने, अपनी कमजोरियों से ऊपर आने और अन्य लोगों की आवश्यकताओं के लिए मध्यस्थता करने के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध कराता है | और यदि परमेश्वर ने हमें संताने दी हैं तो हम ने उनके साथ ऊंचे स्तर पर ईसाई गीतों को हर्ष और उल्लास के साथ गाने में प्रचुर मात्रा में समय बिताना चाहिए | यीशु से पूछना चाहिए कि विशेष तौर पर रविवार के दिन की प्रार्थना में पहली तीन विन्तियाँ किस प्रकार से पूरी होती हैं |

यदि हम रविवार मनाते हैं हम आशीषित होंगे | यीशु ने प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए जो रविवार के दिन मृतकों में से जी उठे मसीह की आत्मा से अपने आप को भरने के लिए उन्हें ढूंढता रहता है, बहुत सी आशीषे तैयार की हैं |


०६.६ -- रविवार को अपवित्र करना

यह दुखद बात है कि अन्य दिनों की तुलना में सप्ताह के अंत में अधिक अपराध होते हैं | रविवार को कारे प्रदूषण फैलाती हैं | दूरदर्शन कुछ समय के लिए केवल एक कार्यक्रम परमेश्वर के वचन पर दिखाते हैं जबकि बहुत सारी डरावनी फ़िल्में, अश्लील या रहस्यमयी कार्यक्रम दिखाए जाते हैं | रविवार के दिन कुछ लोग अपने घरों में, कुछ बगीचों में, कुछ गोदामों में कार्य करते हैं जो उन्हें सप्ताह के अन्य दिनों में करने चाहिए | पुराने नियम के समय कोई व्यक्ति यदि विश्राम के दिन काम करते हुए पाया जाता था तो उसे मौत की सजा दी जाती थी | यदि हम देखें तो पाएंगे कि एक ही शहर में सप्ताह के अंत में बहुत अधिक सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत अपराध होते हैं, जिससे हमारे हृदय टूट जाते हैं और हम परेशान हो जाते हैं | केवल परमेश्वर का प्रेम ही है जो लंबे समय से दुखी और सहनशील है जो अपराधियों की प्रतीक्षा करते हैं

क्या तुम भूल गये हो कि परमेश्वर ने उस मनुष्य के बारे में जिसने उनके दिन को अपवित्र किया था, क्या कहा था ? यदि हम निर्गमन की पुस्तक में अध्याय ३१: १४ – १७ पढ़े हम अनुभव कर पाएंगे कि परमेश्वर के सामने शांत रहना हमारे लिए कितना अनिवार्य है ( गिनती १५: ३२-३६ भी देखें यह समझने के लिए कि परमेश्वर के दिन को मानना आवश्यक है ) यह हो सकता है कि हमारी जीवन शैली में परिवर्तन आया है और हम उदाहरण के रूप में यह पूछे कि हमारे विद्यार्थियों ने अपना गृहकार्य रविवार के दिन नहीं करना चाहिए | परमेश्वर ने उस शहर या गाँव को जो सब्त के दिन का पालन आराधना एवं विश्राम के रूप में नहीं करता, जला देने की धमकी दी है ( यिर्मयाह१७:२२ ) | हमें इस चेतावनी के बारे में संतुष्ट नहीं होना चाहिए | किसको पता है कि ऐसी उपेक्षा का परिणाम विश्व युद्ध और प्रचंड विपत्ति नहीं होगा ? बाइबिल कहती है “ धोखा न खाओ, परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उडाया जाता, क्योंकि मनुष्य जो बोता है, वही काटेगा ( गलतियों ६:७) “ कोई भी परमेश्वर की आज्ञा को ना तो तोड़ सकता है और ना ही उससे दूर रह सकता है |

यदि यीशु सूली पर, हमारे अपराधों के कारण मरे नहीं होते और हमारी ओर से दंड सहन नहीं करते तो हम बिना आशा के होते | परन्तु उनकी मृत्यु,हमारे लिए परमेश्वर के दिन को अपवित्र करने का बहाना नहीं है | यीशु और उनके शिष्य हमेशा सब्त को महत्व देते थे | वह अपने पिता की महिमा करने के लिए जीये थे | उनके पुनरूत्थान के बाद सप्ताह के पहले दिन, यीशु अपने शिष्यों के साथ अपने समझौते के नये पर्व को मनाने के उद्देश्य से उनके सामने दृष्टिगोचर हुए थे |


०६.७ -- नियमों का एक नया प्रत्यक्ष ज्ञान

सब्त को मनाने के गलत तरीके के बारे में सोचा जाए तो हम देख सकते हैं कि यह कितना आसान है कि परमेश्वर के नियम का गलत अर्थ लगाया जाए | यीशु को मृत्यु दंड दिया गया था क्योंकि उन्होंने सब्त के दिन बीमार को चंगाई दी और और कहा था कि वे परमेश्वर के पुत्र हैं | यीशु उनके समय के धर्माधिकारियों द्वारा, जो मूसा के नियमों का पालन करने में अपनी कट्टरता में, परमेश्वर और लोगों से प्रेम करने की अपनी क्षमता खो चुके थे, परेशान किये गये थे| वे पाखंडी रूप से, बाहरी रूप पवित्र थे और प्रायश्चित की पुकार की ओर उनके कान बहरे हो चुके थे| अपने अंधेपन में उनके हृदय कठोर बन गये थे| अपने दिमागों को बदलने के लिए वे तैयार नही थे| वे पिता परमेश्वर, पुत्र एवं पवित्र आत्मा को ठुकरा चुके थे| सब्त के दिन वे बीमार की परवाह नहीं करते थे | तो सब्त के दिन के कानून को मानने का उत्साही अवलोकन उन्हें पाखण्ड की ओर ले गया| कोई आश्चर्य नहीं यीशु को कहना पडा था, “ये मेरा केवल होंठों से आदर करते है; पर इनके मन मुझ से सदा दूर रहते हैं | और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं,क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं | ( मत्ती १५: ८,९ )|”

परमेश्वर के दिन को सही तरीके से पवित्र रखने की शिक्षा हमें देने के अपने संघर्ष में यीशु ने इस बात पर अधिक कुछ नही कहा है परंतु परमेश्वर के सामने हमारे हृदयों के सही रुख पर अधिक दबाव दिया है| पौलुस, यीशु की आत्मा में कानून को समझने की इस प्रक्रिया को लगातार प्रोत्साहित करते रहे थे| फिर भी उन्हें श्राप दिए गये और पत्थरों से मारा गया उनकी शिक्षा के लिए कि अयहुदी विश्वासी पुराने समझौते से मुक्त हैं | उन्होंने सिखाया था कि हम कानून के आरोप से मुक्त हैं क्योंकि यीशु की मृत्यु द्वारा कानून के प्रति हम पहले से ही मर चुके हैं | इसलिए कानून का हमारे ऊपर और अधिक अधिकार नहीं है | लेकिन पवित्र आत्मा ने मसीह के प्रेम का नया आदेश हमारे अंदर डाल दिया है | नये आध्यात्मिक नियम ने हमारे हृदयों को पवित्र किया है और प्रेरित किया है कि हम अपने पूरे विचारों, शब्दों एवं कार्यों से त्रयी परमेश्वर की प्रशंसा करें | तो अब हम नियमों द्वारा और अधिक नीचे दबाए नहीं जाते हैं परन्तु हममें पवित्र आत्मा की शक्ति में यह प्रायश्चित एवं विश्वास में कार्य करता है | हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि मसीह ने दिनों को नहीं, लोगों को पवित्र किया है | इस प्रकारसे हमारी समझ के अनुसार चौथी आज्ञा द्वारा हमने पुराने और नये नियम के बीच के आधारभूत अंतर को समझा |


०६.८ -- मुस्लिम लोगों के लिए शुक्रवार

मुस्लिम लोगों ने शुक्रवार को प्रमुख धार्मिक सभाओं का दिन नियुक्त करके यह दर्शाया था कि वे चौथी आज्ञा के अर्थ को समझ नहीं पाए, ना ही वे इसे पूरा करते हैं | जब यहूदियों व ईसाईयों ने मुहम्मद को उपदेशक या पैगम्बर मानने से इन्कार कर दिया था तब वे और एक कदम आगे चले गये | अपने विश्वास को स्थापित करने के प्रयास में, उन्होंने पुराने एवं नए नियम के आदेशों को ठुकरा दिया और इसके स्थान पर शुक्रवार को मुस्लिमों के जमघट का दिन नियुक्त किया था | धर्म शास्त्र में इस दिन के लिए कुछ नहीं लिखा गया है, ना ही उद्धार की योजना के साथ इसका कुछ संपर्क है | वास्तव में, परमेश्वर और उनके मसीहा के विरुद्ध विद्रोह से यह उत्पन्न हुआ है | शुक्रवार का बाइबिल के अनुसार कोई समर्थन या उसकी कोई पृष्ठभूमी नहीं है |

मुस्लिम लोग शुक्रवार की प्रार्थना के एकदम बाद अपने अपने कामों के लिए चले जाते हैं | मस्जिदों में दिए जानेवाले भाषण अक्सर राजनैतिक होते हैं | ऐसा कभी कभी नहीं प्राय: होता है कि वे विनाश और घृणा के सहसा आरंभ के प्रदर्शन का अनुसरण करते हैं | किसी एक विशेष दिन या स्वयं विश्वासी को पवित्र करने के बारे में मुस्लिम लोग अनजान हैं | अल्लाह को अत्यधिक महान बताया गया है कि उनके नाम को छोड़कर वे उनकी पवित्रता की विषयवस्तु के बारे में अनजान हैं | यह दिखाता है कि क्यों इस्लाम पुराने समझौते की, इस आज्ञा के संदर्भ में कहा जाए तो स्तर से नीचे खड़ा है | उनके पास नये समझौते में नई सृष्टि और उद्धार का छोटे से छोटा अनुमान भी नहीं है |

लेकिन हम धन्यवाद देते हैं उनको जो मृतकों में से जी उठे थे क्योंकि उन्होंने अपने चमत्कार सब्त और सप्ताह के अन्तिम दिन पर दिखाए थे | वे सप्ताह के पहले दिन मृतकों में से जी उठे और एक सम्पूर्ण अर्थ उस दिन को दिया | ओह, तो प्रत्येक रविवार प्रत्येक नये सप्ताह के लिए सूर्योदय है जो हमारे प्रभु के पुनर्जीवन देने वाले शब्दों के साथ चमकता है “ मैं तुम्हे एक नई आज्ञा देता हूँ, कि एक दूसरे से प्रेम रखो: जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो | यदि आपस में प्रेम रखोगे तो इसी से सब जानेंगे, कि तुम मेरे चेले हो ( यूहन्ना १३:३४-३५ ) “ |

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