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Home -- Hindi -- The Ten Commandments -- 02 Introduction To the Ten Commandments: God Reveals Himself

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विषय ६: दस आज्ञाएँ - परमेश्वर की सुरक्षा करने वाली दीवार जो मनुष्य को गिरने से बचाती हैं|
सुसमाचार की रोशनी में निर्गमन २० में दस आज्ञाओं का स्पष्टीकरण

II. दस आज्ञाओं की प्रस्तावना: परमेश्वर स्वयं को प्रकट करते हैं



निर्गमन २०:२
मै तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूँ| मै तुम्हे मिस्र देश से बाहर लाया हूँ | तुम्हे दासता से मुक्त किया| इसलिए तुम्हे निश्चय ही इन आदेशों का पालन करना चाहिए

दस आज्ञाएं एक देवदूत द्वारा प्रकटित, जटिल सिद्धांतों या नियमों की एक विधिवादी प्रणाली नही है जो लोगों पर अधिरोपित की गई है| निश्चय ही उनके द्वारा परमेश्वर स्वयं लोगों से बात करते हैं| सृष्टिकर्ता अपने बनाये प्राणियों के निकट आते हैं और एकमात्र पवित्र परमेश्वर अपराधी लोगों को अपने निकट खींचते हैं |


०२.१ -- परमेश्वर का व्यक्ति

दस आज्ञाओं का पहला शब्द “मै” हूँ| जीवित परमेश्वर हमसे एक व्यक्ति के समान बात करते हैं, ना कि एक अस्पष्ट आत्मा के रूप में या दूर से सुनाई देती हुई भयानक गर्जनाओं के समान| उनकी भाषा आसानी से समझ में आती है| वह हमारे साथ व्यक्तिगत, विश्वसनीय संबंध स्थापित करना चाहते हैं| वह कानून या क्रोध के साथ नहीं परन्तु उनके अनुग्रह के साथ हमसे वार्तालाप करते हैं| यह हमारे लिए कैसा एक विशेषाधिकार है कि वह हमारी ओर दयालुता व प्रेम से मुड़ते हैं|

मनुष्य हठपूर्वक सर्वशक्तिमान परमेश्वर से दूर जाने का, और उनकी अच्छाई से दूर भागने का प्रयत्न करते हैं , पवित्र परमेश्वर हम जहाँ भी रहे हमें देख सकते हैं| वह हमेशा हमारे साथ है| इसलिए प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति ने उनके वचनों का उत्तर देना चाहिए| यह तथ्य है कि वह कहते हैं “ मैं “ जिसका अर्थ है उन्होंने हमें “तुम” के स्तर तक ऊंचा उठा दिया है, और हमें इस योग्य बनादिया है कि हम अपनी पहचान के साथ उनसे बात कर सके|

इन सब बातों से निसंदेह यह स्पष्ट होता है कि सनातन ईश्वर स्वयं ही सभी को सहन करने वाले , अनंत याधीश हमसे एक मनुष्य के समान बात करते हैं| इसीलिए हमें उनको सावधानी पूर्वक सुनना चाहिए एवं हर्ष व आनंदपूर्वक उनके वचनों का पालन करना चाहिए|


०२.२ -- परमेश्वर का अस्तित्व

परमेश्वर ने उनके सत्व को हमारे सामने प्रकट किया है जब वे कहते हैं “मै हूँ” | तब लोग कैसे कहते है कि यहाँ कोई ईश्वर नहीं है? सभी नास्तिक दावे आखिर परमेश्वर की इस साक्षी के सामने चूर चूर हो गये हैं तब से अब तक “मै हूँ” हमारे अस्तित्व का कारण है| परमेश्वर यहाँ है! प्रत्येक वस्तु , व्यक्ति चले जाते हैं, वह अकेले सनातन हैं| समय और मनुष्य सृष्टिकर्ता का विरोध करते हैं ऐसे जैसे वह एक शक्तिशाली पर्वत का सामना कर रहे हों | परंतु सत्य उस पर आधारित नहीं है कि मनुष्य परमेश्वर के बारे में क्या कहते है या वैज्ञानिक उनके बारे में क्या लिखते हैं| वह सत्य है और उन्होंने इस पूरी सृष्टि को भर दिया है| कुछ लोगों ने ३००० वर्षों पूर्व दाउद के युग में इस बात को नाकारा और यह दावा किया था कि यहाँ कोई परमेश्वर नहीं है (भजन संहिता १४)| इसलिए भजन संहिता के लेखक ने उनको भ्रष्ट हो चुके मूर्ख कहा था क्योंकि उन्होंने वास्तविकता को अनदेखा किया था और उन पर ध्यान नहीं दिया था जिनके हाथ में पूरी सृष्टि थी और जो उसे सहन करते हैं | अब तक अविश्वासी अपराधपूर्ण बिना विवेक के जी रहे थे|

परमेश्वर की स्वयं के बारे में गवाही उस आधार का ही खंडन करती है जिसपर बुद्ध का धार्मिक विचार निर्मित है| मोक्ष निर्वाण की शिक्षा अर्थात अपने आपको नकार कर मृत्यु की इच्छा, अपनी आत्मा को महान शून्य में समावेश करने की अनुमति देने के लिए, वास्तविक नहीं है| परमेश्वर चाहते है लोग जिएं| वह जिन्दा हैं और वे साक्षी देते है “मै हूँ” | यह तथ्य कि वह यहाँ है हमारे जीवन को अर्थ और कारण देता है| वे चाहते हैं कि हम जियें जैसे वह जीते है| उनका उद्देश्य हमें नष्ट कर देना नहीं है|

परमेश्वर की साक्षी ने सभी भौतिकवादी मतों का भी अन्त कर दिया है| यह अदूरदर्शी मनुष्य है जो आध्यात्मिक संसार के अस्तित्व को नकारता है| वह एक पत्थर के समान है जो जमीन पर पड़ा रहता है जबकि एक पक्षी आसमान में ऊचांई पर उड़ता है| परमेश्वर जीवित हैं और वह तुमसे बात करते हैं| यहाँ तक कि वह भौतिकवादी, नास्तिक और साम्यवादी से भी बात करते हैं ताकि प्रत्येक उनकी बात सुने और समझदार बने| यदि कोई सुनना नही चाहता और अपने हृदय को कठोर कर लेता है, तब वह एक अंधे व्यक्ति के समानहै, जो दावा करता है कि सूर्य है ही नहीं क्योंकि वह उसे देख नहीं सकता|


०२.३ -- यहोवा कौन है?

परमेश्वर ने मूसा सेकहा,” मैं परमेश्वर हूँ” “मै हूँ जो मै हूँ” निर्गमन ३:१४ में यह, इब्रानी मूलपाठ का एक अत्यधिक निकट शाब्दिक अनुवाद है| यह परमेश्वर का वास्तविक, सनातन, बिना किसी शर्त के, स्वतन्त्र अस्तित्व है| परमेश्वर एक ऐसे प्रकार से आते हैं कि कोई भी उस प्रकार से नहीं कर सकता है| वह परवर्तित नहीं होते और यही हमारे विश्वास की नीवं हमारे उद्धार की आधारशिला है| हमारे सभी बंधनों और अपराधों के साथ, अपरिवर्तनीय परमेश्वर हमारे साथ विश्वसनीय बने रहते हैं| उनकी विश्वसनीयता के लिए हम उनके पास वापस आने के अधिकारी है| यहाँ तक कि जब हम इस संसार की समाप्ति का सामना करते हैं परमेश्वर हमें आश्वस्त करते हैं| “चाहे धरती और आकाश मिट जाएँ किन्तु मेरा वचन कभी नही मिटेगा |” (मत्ती २४:३५)

परमेश्वर उनकी प्रभुसत्ता में सब कुछ समेट लेते है: वह सब कुछ जानने वाले सब कुछ देखने वाले, सर्वज्ञ और पूरी तरह से ज्ञानी हैं| यदि सभी दरवाजे बंद हो जाते हैं वह हमें बाहर निकलने का मार्ग प्रदान करते हैं| वह हमारे विचारों और भावनाओं को समझते हैं| वह नहीं चाहते कि हम आंतक में उनके पैरों पर गिर जाये| इसके स्थान पर वह एक गहरी आशा और विश्वास हममे निर्माण करते हैं| वह हमसे बात करते हैं कि हम उनकी ओर विश्वास में देखें| वह हमारे एक ईश्वर बने रहना चाहते हैं| ओह, ऐसा है कि कोई भी अपने आप को हमारे धैर्यवान परमेश्वर से छिपा नहीं सकता, क्योंकि वह हमारे उत्तर की प्रतीक्षा करते हैं| जब कोई एक अपने सृष्टिकर्ता के पास लौट आता है, वह दयावान प्रेममयी करुणा के साथ उसका उत्तर देते हैं| जब परमेश्वर कहते है, “मै परमेश्वर हूँ”, वह यह भी घोषित करते हैं कि केवल वो ही एक अकेले परमेश्वर हैं और अन्य कोई परमेश्वर नहीं है| सभी अन्य आत्माएं और भगवान व्यर्थ हैं|

हमारे आज के युग में जहाँ आत्माएं और रहस्यपूर्ण शिक्षण आधुनिक धर्मों में पर्तिवार्तित हो गये हैं, प्रेतग्रस्त , उनके एक सच्चे परमेश्वर में विश्वास द्वारा मुक्त हो गये है| आज अज्ञेयवाद घट रहा है, और लोग अन्य बातों के चरम बिंदु पर हैं और तन्त्र मत्रों के अभ्यास में जकड़े हुए हैं एवं बुरी आत्माओं के साथ बंधे हुए हैं| उनके प्रचार रेडियो, दूरदर्शन और समाचार-पत्र प्रत्येक स्थान पर हैं|

सुसमाचारों में यीशु कहते है “मैं वह हूँ”, जोकि अपने आप में दस आज्ञाओं का एक पूर्ण स्पष्टीकरण है| इस कथन द्वारा, यीशु ने यह घोषित किया है कि वह प्रभु है, और देवदूतों के बेतलेहेम में गडरियों को दिए गये शुभ समाचार का विषय हैं| यीशु नेइससे भी आगे कहा है “ मै जीवन की रोटी हूँ” “मै इस जगत की रोशनी हूँ”, “मै दरवाजा हूँ”, मै ही मार्ग, सत्य और जीवन हूँ” यीशु ने यह भी कहा था, “मै राजा हूँ”, मै ही आरंभ और अन्त हूँ |” तब से अब तक उनके अनुयायी बिना किसी हिचकिचाहट के यह स्वीकार करते हैं, “यीशु परमेश्वर है|” वह कभी बदलते नहीं और वह हमें प्रत्येक अपराध से बचाते हैं| जब वह मृतकों में से जी उठे, उन्होंने अपना पद और सत्ता घोषित की थी| तब से अब तक दस आज्ञाओं का आरंभ हमारे लिए एक सुखपूर्ण बात है कि “मै परमेश्वर हूँ|”

मूसा को अपने परमेश्वर के मानव शरीर में अवतरण का कोई अनुमान नहीं था| परंतु १,३५० वर्ष पूर्व, उन्हें रहस्य प्रकटीकरण के बुनियादी शब्द प्राप्त हुए थे, जिसके साथ परमेश्वर ने अपने आपकी पहचान दी थी, “मै परमेश्वर तुम्हारा ईश्वर हूँ |”


०२.४ -- परमेश्वर कौन है?

इब्रानी भाषा में परमेश्वर स्वयं को “इलोहीम” जिसका अरबी भाषा में अनुवाद “अल्लाह “कहते हैं | “इलोहीम” को “इलोह –इम” जैसे भी पढ सकते हैं, जबकि अल्लाह “अल-एल-हू” है| “अल” एक निश्चित शब्द जिसका अर्थ है “विशिष्ट “| “इल” सामी संस्कृति में परमेश्वर का मूल नाम है, जिसका अर्थ “शक्ति” है| यीशु ने “इल” नाम का अनिवार्य अर्थ घोषित किया था और जब उच्च न्यायलय में साक्षी दी थी तब यह सत्य प्रमाणित किया था, यीशु ने उत्तर दिया, “हाँ, मै हूँ| किन्तु मैं तुम्हे बताता हूँ कि तुम मनुष्य के पुत्र को उस परम शक्तिशाली की दाहिनी ओर बैठे और स्वर्ग के बादलों पर आते शीघ्र ही देखोगे|” (मत्ती २६:६४) “इम” और “हू” शब्द प्रत्यय हैं| इब्रानी भाषा में “इम” बहुवचन होने का संकेत देता है, जब कि अरबी में “हू” केवल एक वचन के लिए है| अतः आधारभूत रूप से “अल्लाह” शब्द ने पवित्र त्रयी की एकता को अदृश्य किया था, जबकि “इलोहीम” एक त्रयी परमेश्वर की संभावना को अनुमति देता है|

अनन्त परमेश्वर केवल सबकुछ जाननेवाले, बुद्धिमान सर्वव्यापी ही नहीं परंतु सर्वशक्तिमान भी है| वही केवल एक शक्ति है इस जगत में जिसका निर्माण उनके शक्ति शाली शब्द द्वारा हुआ है, उन्होंने इस पूरी सृष्टि की रचना शून्य से की थी| वह प्रत्येक के साथ धैर्यवान है| हमारे परमेश्वर एक विनाशकारी, निरकुंश ईश्वर नहीं है जो जिसका मार्गदर्शन करना चाहते हैं करते है, और जिसको बहकाना चाहते है, उसे उस प्रकार का पथ बताते हैं (सुरस-अल-फातिर ३५:८ और अल-मुद्दथिर ७४:३१) इसके विपरीत, हमारे परमेश्वर चाहते है ,” वह यह चाहता है,कि सब मनुष्यों का उद्धार हो;और वे सत्य को भली भांति पहचान लें |”( १ तीमुथियुस २: ४ )

पुराने नियम में , कुछ लोगों के और कुछ देशों के नाम “इल” नाम से जुड़े हैं| उनके बच्चों के नाम शमूएल, एलिययाह, एलिय्येज़र और दानिय्येल हैं| उन्होंने अपने शहरों के नाम बेतेल, यीज्रेल और इस्राएल रखे थे| ऐसा करके उन लोगो ने अपने आपको उस “शक्ति” के साथ बाँध लिया था जो पूरी सृष्टि पर नियंत्रण करती है| नये नियम में भी लोग ईश्वर के साथ अनुपम रूप से जुड गये है, तब से जब से उन्होंने अपने अनुयायियों को यह वचन दिया था, “बल्कि जब पवित्र आत्मा तुम पर आयेगा, तुम्हें शक्ति प्राप्त हो जायेगी| और यरूशलेम में, समूचे यहूदिया और सामरिया में और धरती के छोरों तक तुम मेरे साक्षी बनोगे|” ( प्रेरितों के काम १:८ ) ईश्वर अपराधियों को ठुकराते नहीं है, परंतु वह उनको स्वच्छ करते हैं, पवित्र करते है और उनमे निवास करते हैं|

यह हमारे प्रभु यीशु मसीह है, महान शक्तिशाली, जिनको स्वर्ग और पृथ्वी पर सारी सत्ताएँ दी गई हैं| अणुबम, उनकी अनन्तता की शक्ति की तुलना में कुछ भी नहीं है ; उनकी सत्ता का अन्त कहीं नहीं है|


०२.५ -- इस्लाम में ईश्वर कौन है?

सर्वशक्तिमान के प्रति समर्पण मुस्लिमों को “अल्लाहू – अकबर” कहने की ओर अग्रसर करता है, अल्लाह महान है| अतः मुस्लिम अल्लाह को सभी की तुलना में अधिक “ सुंदर ”, अधिक विवेकी मानते हैं| तो इस्लाम में अल्लाह महान, बलवान और उनके दासों की पहुँच से ऊपर बन गये हैं| कोई मानवीय दिमाग उनको अच्छी तरह से समझ नहीं सकता है| वह हमें अच्छी तरह से समझते हैं| इस्लाम में अल्लाह बहुत दूर और बहुत अनभिज्ञ है| उनके बारे में हर विचार अपर्याप्त और गलत है| सभी मनुष्य वाद विवाद करते है , वे सर्वशक्तिमान की कल्पना भी नही कर सकते| मुस्लिम लोग केवल डरते हैं और उनकी आराधना करते है जैसे वे साष्टांग प्रणाम करते हैं|

मुस्लिम रहस्यवादियों ने मनुष्यों की पहुँच से बाहर के अल्लाह तक पहुँचने के लिए कुछ मानवीय प्रयत्न करने चाहे, परंतु कुरान स्वयं ऐसे किसी प्रयास की अनुमति नहीं देती जिसका संबध इसके अमूर्त (Bedouin) तर्क से हो|

इस्लाम में, अल्लाह अदृश्य रहते हैं और उन्होंने मुस्लिम लोगों के साथ एक समझौता नहीं किया है| मुहम्मद अल्लाह और मुस्लिम लोगों के बीच एक मध्यस्थ के रूप में नहीं गिने जाते है जिन्होंने मुस्लिम लोगों को अल्लाह के साथ एक इस्लामिक समझौते में बाँधा हो|परन्तु हमारे प्रभु ने बिना किसी शर्त के साथ सभी को अपनी प्रजा बने रहने की आज्ञा दी है|

मुस्लिम परमेश्वर के सत्व को अच्छी तरह से नहीं समझते हैं| इसके परिणामस्वरूप, उन्हें उनके वास्तविक अपराध का ज्ञान नहीं है, ना ही वे वास्तविक रूप में उनके अनुग्रह का अनुभव कर पाये हैं| इस्लाम में रक्षक की स्तुति लोगों को, उनके अपराधों से बचाने के लिए आभार प्रकट करना नहीं है, ना ही न्याय से छुड़ाने के लिए प्रशंसा है| वस्तुतुः यह एक दूर, शक्तिशाली अल्लाह की प्रशंसा है जैसे कि दास अपने मालिक के पैरों में डर और संदेह से गिरते हैं| उनको मुहम्मद का अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहन दिया जाता है क्योंकि इस्लाम अल्लाह की अतिरंजना करता है ,जो उनको डराता है और कभी मुक्ति नहीं दिलाता है | | वे एक रक्षक को बिना मूल्य के उनको बचाने के लिए धन्यवाद नहीं देते क्योंकि इस्लाम में कोई रक्षक ही नहीं है | कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि एक मुस्लिम उसकी औपचारिक, रूढ़िवादी आराधना से ही बंधा हुआ रहता है|

यद्यपि, सच्चे परमेश्वर जिन्होंने अपने आपको बाईबिल में प्रकट किया था, अपनी रचना से दूर नहीं रहते हैं| वे हमारे निकट आये और आदम की संतानों अर्थात हमारे साथ एक समझौता स्थापित किया था, जैसा कि वे कहते है, “मै तुम्हारा परमेश्वर, तुम्हारा ईश्वर हूँ|”


०२.६ -- परमेश्वर के साथ समझौता

“तुम्हारे परमेश्वर” में सर्वनाम “तुम्हारे” स्वामित्वबोधक है| इसका अर्थ है कि परमेश्वर हमें उन पर अधिकार करने की अनुमति देते हैं| हमें उन पर ऐसा विश्वास करना चाहिए जैसा एक बच्चा अपने पिता पर करता है| सर्वशक्तिमान परमेश्वर, हमारे विद्रोह के बावजूद नीचे हमारी ओर उतर आये, जैसे वे कह रहेथे, “मै तुम्हारा हूँ| क्या तुम प्रायश्चित नहीं करोगे और मेरे पास वापस नहीं आओगे और हमेशा के लिए केवल मुझे अपने आप को नहीं सौंप दोगे?”

यह एक कष्टदायक समाचार है कि दस आज्ञाओं का आरंभ, लोगों और परमेश्वर के बीच स्थापित हुए समझौते के साथ हुआ है| यह एक ऐसा समझौता है जिसे केवल परमेश्वर ने अपने लोगों को प्रदान किया था| इसमें परमेश्वर हमारे लिए अपनी उपस्थिति और प्रेम प्रमाणित करते हैं| वे हमसे आशा करते है कि हम विश्वास, आशा और प्रेम में उनके सर्वव्याप्त अस्तित्व की अनुक्रिया करे|

अपराधियों के साथ उनके समझौते में, परमेश्वर उनको क्षमा, उद्धार, सुरक्षा और आशीषों का आश्वासन देते हैं “सो हम इन बातोंके विषय में क्‍या कहें यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है?” (रोमियों ८:३१) वह हमें प्रोत्साहन देते हैं यह प्रमाणित करके कि वह हमेशा हमारे साथ हैं और हमारी कमजोरी द्वारा कार्य करते हैं| मनुष्य का अपराध परमेश्वर की विश्वसनीयता को रोक नहीं पाता है| निसंदेह एक मात्र पवित्र प्रत्येक अपराध का न्याय करेंगे, चाहे वह कितना भी छोटा हो| उनके परिपूर्ण न्याय को प्रत्येक अपराध के नाश की आवश्यकता है और अब मसीह में उनका अनंत प्रेम उन सभी के अपराधों को स्वच्छ करता है जो इस समझौते में उनके साथ प्रवेश करते हैं| हम सबके बदले में स्वयं मरकर, मसीह ने जमानत उपलब्ध कराई थी कि दैवीय समझौते ने असर किया| सूली तब से अब तक उनके अनुग्रह की निरंतरता का संकेत है|


०२.७ -- परमेश्वर हमारे पिता

मसीह के जन्म के साथ मनुष्य का परमेश्वर के साथ अलगाव समाप्त हो गया था| परमेश्वर शरीर रूप में दिखाई दिए तब उनके अनुयायी और अधिक दासत्व में नहीं रहे तब से जब से यीशु ने उन्हें अपराधों के बंधनों से, शैतान के चंगुल से, मृत्यु से और यहाँ तक कि परमेश्वर के न्याय से मुक्त किया था| हमारे छुटकारे के लिए यीशु के लहू को प्रायश्चित के समान बहाया गया था| जो कोई भी मसीह में विश्वास करता है स्वच्छ किया जायेगा और परमेश्वर के पुत्र या पुत्री के रूप में गोद लिया जायेगा| मसीह द्वारा, सर्वशक्तिमान परमेश्वर नियमोंनुसार और आद्यात्मिक रूप से हमारे पिता बन गये हैं| वे हमें आश्वासन देते है कि चाहे हमने मृत्युदंड के उपयुक्त अपराध किया हो, “मै तुम्हारा परमेश्वर, तुम्हारा पिता हूँ|”

परमेश्वर, हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता हर उस इन्सान को जो सूली पर मारे गये और जी उठने वाले यीशु से प्रेम करता है और उनका अनुकरण करता है , पवित्र आत्मा की शक्ति प्रदान करते हैं| यीशु में फिर से जन्म लेने वाले विश्वासी स्वर्गीय पिता के जीवन और व्यवहार को धारण करते हैं| अब वे आध्यात्मिक मृत्यु की पकड़ और निराशा के शिकंजे के तले नहीं हैं| मसीह में पवित्र ईश्वर ने अपने आप को हमसे बाँध लिया है| उन्होंने हमें उनका मंदिर बनाया, उनके निवास का एक स्थान बनाया था| वह हमारे पिता है और हम उनकी संतान हैं| हम उनके हैं और वह हमारे हैं| हमारे लिए मसीह की प्रतिस्थानिक मृत्यु के सदगुण द्वारा नया समझौता पूरा हुआ है| उस समय से मसीह में प्रत्येक विश्वासी, परमेश्वर से सीधा संपर्क करने का अनुभव करता है| जब वह प्रार्थना करता है, वह किसी रिक्त स्थान से प्रार्थना नहीं करता| इसके स्थान पर प्रार्थना परमेश्वर के साथ एक दुरध्वनी संपर्क के समान है, जो धन्यवादज्ञापन, पापस्वीकारोक्ति , निवेदन और बिनती से भरपूर है| हमारे स्वर्गीय पिता हमें विश्वसनीयता से सुनते है| उनके पितृत्व में, हम हमारा आश्रय पाते हैं| वह हमारे चारो ओर है और अपनी पवित्रता के आवरण के साथ वह हमारा सुरक्षा कवच हैं| मुस्लिमों के समान नहीं, सच्चा ईसाई व्यक्ति अपने परमेश्वर से बहुत दूर नहीं है| वे हिंदुओं के समान भगवानों के देवमंदिरों की आराधना या विस्मयकारी शून्य की प्रतीक्षा जैसे बौद्ध धर्म वाले करते है, नहीं करते|

सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने स्वयं को मसीह के अनुयायियों के साथ अपने प्रेम के सद्गुण द्वारा बाँध लिया है ताकि वे लोग उनकी उपस्थिति में जी पाये और उनकी छबि में परिवर्तित हो जाये| हमारे स्वर्गीय पिता हमें हमारी निराशाजनक परिस्थिति में छोड़ देना नहीं चाहते थे परन्तु उन्होंने हमें बचाने और पापों से छुड़ाने का निर्णय लिया था| उन्होंने हमें चुनौती दी थी, “तुम्हे पवित्र रहना होगा जैसे मै पवित्र हूँ” (लैव्यव्यवस्था ११:४५)| परमेश्वर के साथ मित्रता का अर्थ केवल एक मानसिक विश्वास ही नही है, परन्तु इसका परिणाम अति सुधारवादी नैतिक परिवर्तन भी है| यदि हम परमेश्वर के साथ रहते है, हमारा सत्व बदल जायेगा तब से जब से अनंत परमेश्वर ने अपने बच्चों को अपने स्तर तक ऊपर लाने का निर्णय लिया था| हमारे पिता चाहते हैं कि हम उन के समान बने, जैसे यीशु ने कहा था “इसलिये परिपूर्ण बनों, वैसे ही जैसे तुम्हारा स्वर्गीय `-पिता-परिपूर्ण है|” (मत्ती ५:४८) दस आज्ञाएँ खोये हुए लोगों के परमेश्वर के बच्चों में परिवर्तित होने की प्रक्रिया का एक मंच है| वास्तव में, दस आज्ञाएँ परमेश्वर के अनुग्रह के सद्गुण से दूर चले जाने से रोकने के लिए अवरोध हैं|

हो सकता है कि तुम यह अनुभव करते हो कि मसीह की आज्ञा का पालन करना असंभव है| हम परमेश्वर के समान परिपूर्ण कैसे हो सकते हैं? क्या यह स्वर्ग में हवा को दिए गये प्रलोभन की पुनरावृति का दावा नहीं करता जब उसने शैतान को कहते हुए सुना था, “तुम परमेश्वर के समान बन जाओगे?” मनुष्य स्वयं अपने आप को बचा नहीं सकता ना ही वह अपने स्वयं के प्रयत्नों द्वारा धर्मपरायण बन सकता है| स्वय धर्मपरायणता कानून पर निर्मित होती है जो विद्रोह की ओर एवं विद्रोह न्याय की ओर ले जाता है| परंतु हमारा वास्तविक पवित्रीकरण हमारे स्वर्गीय पिता का हममें अच्छा कार्य है| वह हमें उनकी धर्मपरायणता की ओर ले जाते हैं| वह प्रत्येक दिन हमें अपने आपको नकारने के लिए बुलाते हैं और हमारी आत्मा को अनंत शक्ति, हमारी बुराईयों पर विजय पाने के लिए देते है| वह हमें उनके वचन को पढ़ने और उस पर अमल करने के लिए प्रोत्साहन देते है| वह हमें अपना प्रेम देते है, जो सेवकों और नेताओं में स्वार्थ के रूप में बदल जाता है| हमारे पिता के आध्यात्मिक उपहार इतने स्पष्ट है कि मुहम्मद तक ने स्वीकार किया था और यह वर्णन दिया था कि मसीह के अनुयायी ऐसे विशेष व्यक्ति है जो “घमंड नहीं करते, जो अपने हृदयों में दया और करुणा को प्राप्त कर चुके थे” (सुरस अल – मैदा ५:८२ और अल-हदीद ५७:२२)


०२.८ -- उद्धार जो पूर्ण हुआ था

परमेश्वर हमें अपराध के बंधन से मुक्त करना चाहते हैं| दस आज्ञाओं की प्रस्तावना के दूसरे वाक्य में, वे कहते हैं कि हम स्वयं अपने आपको अपराध के बंधनों से मुक्त नही कर सकते हैं| यह परमेश्वर हैं जो इसे विश्वास में हमारी आज्ञाकारिता द्वारा करेंगे| परमेश्वर ने अपने लोगों को कठोर दासता से मूसा के द्वारा छुडाया था और उनके साथ एक दैवीय समझौता स्थापित किया था| उन्होंने उन लोगों को उनकी धर्मपरायणता के कारण स्वीकार नहीं किया था, परंतु अपने अनुग्रह के कारण चुना था| उन्होंने प्रमाणित किया था, “मै तुम्हारा परमेश्वर तुम्हारा ईश्वर हूँ जो तुम्हे मिस्र देश से बाहर, बंधनों के घर से बाहर निकल लाया हूँ|”

याकूब के पुत्र ३६०० वर्ष पूर्व यरदन खाडी के चट्टानी बंजर पश्चिमी पहाड़ी इलाको से परदेश चले गये थे जब सूखे ने उनके राज्य को तहस-नहस कर दिया था| भूख उन्हें उनके घरों से कुछ ३०० किलोमीटर दूर उपजाऊ नील खाडी की ओर बहा कर ले गई थी| प्रत्येक वर्ष नील नदी में बाढ़ आती थी और भूमि को पोषक तत्व प्राप्त होते थे| याकूब के पुत्रों की संख्या शीघ्र ही बढ़ गई और मिस्र के लोगों के लिए एक खतरा बन गये| फिरोन (मिस्र के सम्राट) विदेशी हिब्रू कर्मचारियों को बंदी बना कर उनके साथ कठोरतापूर्वक दुर्व्यवहार करते थे| उनमे से कुछ अपनी दासता में अपने पिताओं के परमेश्वर का स्मरण करने लगे और रोकर उनसे मदद मांगने लगे थे| वे अच्छे दिनों में अपने परमेश्वर को भूल गये थे, अतः दरिद्रता और आवश्यकता उन्हें वापस उनके सृष्टिकर्ता एवं छुड़ानेवाले के पास लेकर आई थी| तब परमेश्वर ने उनकी पुकार को सुना और मूसा उनके सेवक को भेजा था जिसे उन्होंने मिस्र के फिरौन के राजमहल और जंगल में अपने कार्य को पूरा करने के लिए तैयार किया था| परमेश्वर मूसा के सामने एक जलती हुई झाड़ी में आये जो कि आग से जल कर समाप्त नहीं हो रही थी| परमेश्वर ने अपने आपको मूसा के सामने “मै हूँ” के समान प्रकट किया था, जिसका अर्थ है, “मै वह हूँ जो मै हूँ| मै बदलता नहीं हूँ परंतु तुम्हारे प्रति विश्वसनीय बना रहता हूँ ” इसलिए “तुम लोग मेरी खोज करोगे और जब तुम पूरे हृदय से मेरी खोज करोगे तो तुम मुझे पाओगे|” (यिर्मयाह २९:१३)|

परमेश्वर ने मूसा को मिस्र के महान सम्राट फिरौन जो एक मिस्री ईश्वर के रूप में जाना जाता था, के पास, इब्रानी बंधक कर्मचारियों को मुक्त कराने के उद्देश्य से भेजा था| परंतु नील नदी की खाड़ी के शासक इन सस्ते मजदूरों को मुक्त करना नहीं चाहते थे| उसने अपने हृदय को बहुत अधिक कठोर किया था| मिस्री सम्राट इब्राहीम के पुत्रों को मुक्त करने को तब तक तैयार नहीं थे जब तक परमेश्वर ने प्लेग और अन्य विपदाओं के द्वारा उस पर दबाब नहीं डाला था| वे मिस्र की दासता से, अपने आप को उनकी स्वयं की धर्मपरायणता के कारण नहीं, केवल विश्वास में उनकी आज्ञाकारिता के कारण छुडाये गये थे| उन्होंने अपने हथियारों को तेज नहीं किया| वे लोग फसह के पर्ब्व के मेमने के लहू की सुरक्षा तले, जिसको मार दिया गया था, रात में ही रेगिस्तान की ओर चलेगये थे| प्रत्येक परिवार के लिए एक मेमना दिया गया था| वे उस मेमने का मांस खाते और परमेश्वर की शक्ति में चलते जाते थे| लाल समुद्र को पार करना, और उनके शत्रु जो उनको सता रहे थे का पतन उनके छुटकारे का अन्तिम प्रमाण था| आज हम कैरो के मिस्रिय संग्रहालय में फिरौन के लाल समुद्र में डूबे हुए सुरक्षित शव को उसके फेफड़ों में काई के साथ देख सकते हैं|

मुस्लिम लोग अपने शत्रुओं पर विजय का श्रेय, युद्ध में परमेश्वर के हस्तक्षेप को देते हैं| यद्यपि मुहम्मद ने बदर के युद्ध में मक्का के व्यापारियों पर, परमेश्वर के चमत्कारिक हस्तक्षेप के कारण नहीं, परंतु उनके हत्यारों के कारण विजय पाई था| उनके अनुयायियों ने जो भी उनके पास था, सब त्याग दिया था| इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने अपने शत्रुओं को मार गिराया! मूसा ने जिसे चमत्कारिक, दैवीय छुटकारा बताया है (लहू की एक बूंद बहाए बिना) को इस्लाम में जैसे एक पवित्र युद्ध (जिहाद) बताया जाता है, जिसमे जुडना प्रत्येक के लिए अनिवार्य है| इस्लाम में यह न्यायोचित कानून रहता है, “तुमने उनको नहीं मारा, परंतु अल्लाह ने उन्हें मार दिया| यदि तुमने तीर चलाया है तो यह तुम नहीं परंतु अल्लाह है जिन्होंने तीर चलाया है” (सूरा-अल-अनफाल ८:१७)

परमेश्वर ने चमत्कारिक रूप से इस्राएल के बच्चों को मिस्र की दासता से मुक्त कराने के बाद उन्हें सूखे रेगिस्तान की चिलचिलाती गर्मी में ले गये और उनके लिए एक दावत तैयार की| वे उनके साथ एक दैवीय समझौते को पक्का कर देना चाहते थे ताकि वे उनकी मित्रता में पवित्र बन जाये| उन्होंने उनको एक याजकीय राज्य जो उनकी सेवा में रहे बनाने के लिए बुलायाथा| वे लोग उनके सिंहासन के सामने सभी लोगों के लिए एक संधिकरण मंत्रालय बने थे| दस आज्ञाएँ समझौते की पुस्तक का हृदय और उनके परमेश्वर के साथ बातचीत करने के सुनहरे नियम थे| परमेश्वर अपने नियमों की दो तख्तियों के सिंहासन पर जो समझौते की नीवं में रखी गई थी, विराजमान थे|


०२.९ -- दस आज्ञाओं का उद्देश्य एवं नए नियम में उद्धार

यदि हम उस आश्चर्यजनक विजय को जो परमेश्वर ने याकूब के पुत्रों को ३,३०० वर्षों पूर्व प्रदान की थी पर मनन करे और उसकी तुलना उस उद्धार के साथ करे, तो दस आज्ञाओं के आरंभ के सारांश को इस प्रकार पाते हैं: “मै तुम्हारा परमेश्वर तुम्हारा ईश्वर एवं पिता हूँ; मै तुम्हे अनंतता में मुक्त कर चुका हूँ |”

तब से जब यीशु इस जगत में आये थे और प्रत्येक व्यक्ति के अपराधों को सूली पर सहन कर चुके थे, और हमारे लिए परमेश्वर के मेमने के समान मर गये, हम परमेश्वर की दया की घोषणा सभी राज्यों में करते हैं और यीशु का प्रचार सभी लोगों के लिए प्रभु और रक्षक के रूप में करते हैं| यीशु ने अपराध सांकलियों को तोडा और सूली पर स्वयं वेदना एवं मृत्यु झेलकर, शैतान की सत्ता पर विजय प्राप्त की थी| उन्होंने परमेश्वर के क्रोध को शांत किया था और हम सबके बदले में स्वयं न्याय को सहन किया था| हमारा निर्णयात्मक उद्धार केवल मसीह के द्वारा पूरा हुआ था| इसीलिए हमें उनका धन्यवाद करना चाहिए और उनके उद्धार को विश्वास के साथ ग्रहण करना चाहिए|

परमेश्वर का उद्धार प्रत्येक मनुष्य के लिए तैयार है| हम एक अनोखे प्रकार से बिना किसी हथियार का उपयोग किये बचाए जा चुके हैं| सच्चा लहू बहा था, परंतु यह हारे हुए शत्रुओं का नहीं, पर इसके स्थान पर परमेश्वर के इकलौते पुत्र का था, जिसने हमारे लिए स्वयं को न्यौछावर कर दिया था|

दस आज्ञाओं का पालन करके हम अपने आपको बचा नहीं सकते निश्चय ही यह बचाए हुए हम लोगों को यह शिक्षा देती है कि हमें उस उद्धार के लिए जो हमें मुफ्त में प्राप्त हुआ है, धन्यवाद करे| जो कोई भी यह सोचता है कि वह स्वयं को अपराध, शैतान, मृत्यु और परमेश्वर के क्रोध से, स्वयं अपने मानवीय प्रयत्नों द्वारा बचा सकता है, पूरी तरह से भ्रामक है| वास्तव में वह अपने आप को अपराध के बंधन के प्रति और अधिक समर्पित करता है| दस आज्ञाएँ हमें हमारे अपने पवित्रीकरण की ओर अग्रसर नहीं करती है| निश्चय ही ये हमें प्रायश्चित और विश्चास की आज्ञाकारिता , वह उद्धार जो पूरा किया जा चुका है के आनंद की ओर अग्रसर करती हैं| हम मूसा के कानून के उद्देश्य को पूरा करते हैं जब हम स्वर्गीय पिता के साथ पवित्र आत्मा की शक्ति में यीशु की महिमा करते है| परमेश्वर हमें दोषी ठहराना या श्राप देना नहीं चाहते या दस आज्ञाओं का भारी बोझ हम पर डालना नहीं चाहते जिसके तले हम दब जाये| निश्चित ही नहीं! प्रभु ने हमारे उद्धार की योजना नियमों के रहस्य प्रकटीकरण के बहुत पहले बनाई थी| उन्होंने बचाए गये लोगो को ऎसी दिशा की ओर अग्रसर करते हुए अपने नियम दिए जिससे वे प्रायश्चित करे और पवित्र आत्मा की कुलीनता को अपने आपको समर्पित करते हुए उनका विद्रोह परवर्तित हो जाये| इसलिए कानून का उद्देश्य परमेश्वर हमारे पिता के साथ हमारी मित्रता है, अन्तिम निर्णय के समय हमारा विनाश नहीं है|

यदि हम कभी दास रह चुके हों,तो हम दस आज्ञाओं को भली भांति समझ पायेंगे| दासो के समान इस बात की परवाह किये बिना कि हमें कैसा महसूस हो रहा है, हम बीमार है या स्वस्थ है, जवान है या बूढ़े है, हमें मेहनत करना पड़ी होंगी| हम असहनीय परिस्थितियों के तले मेहनत करने के लिए बाध्य किये जा चुके होंगे| दास के रूप में हमें एक नम्बर पहनना पड़ा होंगा, और किसी ने भी हमारे बारे में सोचा ना होगा |

परमेश्वर ने अपने लोगो को अत्यंत दीन-हीन अवस्था और दुख से मुक्त किया| इस कारण से दस आज्ञाओं को एक हस्तपुस्तिका के रूप में मानते है जो स्वतंत्र ईसाईयों का मार्गदर्शन करती है कि वे सीख सके कि अपनी स्वतंत्रता में किस सभ्यता और समझदारी से व्यवहार करना है| यहाँ स्वतंत्रता में बहुत सारे प्रलोभन है जो घात में बैठे हैं| यदि हम परमेश्वर के बिना रहते हैं शीघ्र ही हम अपनी नैसर्गिक इच्छाओं और अपराध के दास बन जाते है| यद्यपि परमेश्वर ने मनुष्य को अपने ही रूप बनाया है| परमेश्वर के बिना मनुष्य एक सदाचारी जीवन नहीं जी सकता है| यहाँ परमेश्वर के बिना परिपूर्ण स्वतंत्रता नहीं है|

यदि मनुष्य अपराध में रहता है, वह अपराध का एक दास है| नशीली दवाएं, कामुक इच्छाएं, चोरी, आलसीपन, बलात्कार और द्वेष उसकी जेल बन जाते हैं| कुछ लोग सूक्ष्म, अनदेखे बंधनों जैसे शराब, धूम्रपान, नशीली दवाओं के लती ओर झूठ बोलने के अभ्यस्त, बुरी आत्माओं और भविष्यवाणी को कुछ ना कहने में फंसे होते हैं| शैतान उनके दिमागों के साथ खेलता है| परंतु यीशु उनको जो उनपर विश्वास करते है, को स्वतंत्र करते हैं और उनको परमेश्वर के बच्चों की पवित्र स्वतंत्रता में मुक्त कर देते हैं|मसीह सच्चे विजेता हैं बचाने वाले प्रभु एक बुद्धिमान वैध,अच्छा गडरिया और विश्वसनीय मित्र हैं | उनसे सहायता और सलाह प्राप्त किये बिना कोई भी उन तक नहीं पंहुच पायेगा |

दस आज्ञाएँ उन लोगों के लिए जो अनुग्रह द्वारा स्वतंत्र है, एक सुरक्षा दीवार है| परमेश्वर उनके पिता, यीशु मसीह उनके रक्षक और पवित्र आत्मा उन्हें सुख देने वाले बन गये हैं || वे यह समझ चुके है कि पिता परमेश्वर, पुत्र और पवित्र आत्मा एक ही ईश्वर है| उन्होंने उनमे कृतज्ञता एवं शांति के साथ वास्तविक छुटकारे का अनुभव किया था| इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि दस आज्ञाएँ उनके लिए परमेश्वर के मार्गदर्शन का एक संकेत बन चुकी है जो उनके जीवनों के रेगिस्तान में प्रशंसा के गीत की रचना कर रही हैं| (भजन संहिता ११९:५४)

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