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रोमियो – प्रभु हमारी धार्मिकता है|
पवित्र शास्त्र में लिखित रोमियों के नाम पौलुस प्रेरित की पत्री पर आधारित पाठ्यक्रम
आरम्भ: अभिवादन, प्रभु का आभारप्रदर्शन और “परमेश्वर की धार्मिकता” का महत्व, इस पत्री का आदर्श है। (रोमियों 1:1-17)

स) लगातार विश्वास के द्वारा परमेश्वर की धार्मिकता हममे स्थापित हुई और हम उसे जान पाये (रोमियों 1:16-17)


रोमियो 1:17
17 क्योंकि उसमे परमेश्वर की धार्मिकता विश्वास से, और विश्वास के लिए प्रगट होती है; जैसा लिखा है, कि विश्वास से धर्मी जन जीवित रहेगा|

यहाँ इश्वर ज्ञान में एक बहुत बडा भ्रम जाल है, जोकि परमेश्वर की पवित्रता है| यदि हमारा धर्म एक बाहरी दिखावा है, तो यह भ्रम जाल दिखा ही नहीं होगा| तो भी, जब हम जानते है कि परमेश्वर की पवित्रता की यह आवश्यकता है कि प्रत्येक पापी मर दिया जाना चाहिए और यह कि यहाँ परमेश्वर की धार्मिकता पर कोई खरा नहीं है, हम उदास हो जाते हैं, क्यों कि सारी मानव जाती तुरंत ही मृत्यु की अधिकारी है| अबतक परमेश्वर स्वयं ही न सिर्फ एक पवित्र और एक न्यायाधीश हैं बल्कि एक दयावान पिता, प्रेम से भरपूर, अच्छाई और वह पापियों का नाश नहीं बल्कि उन्हें बचायेंगे|

परेम्श्वर ने किसीसे, कहीं पर प्रसन्न होने के कारण क्षमा नहीं दी बल्कि अपनी पवित्रता के कारण उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी मुल्य के क्षमा किया क्यों कि परमेश्वर का गौरव उनकी उपस्थिति को परिभाषित करता है|

इस समस्या को सुलझाने के लिए उन्होंने बलिदान के अधिकार को इसके बदलेमे सामने लाये, जो कि पापियों के लिए मरते हैं| तब से अब तक कोई भी जानवर या इन्सानी बलिदान परमेश्वर की पवित्रता की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है, उन्होंने सभी कालों से पहले अपने पुत्र को चुना, कि वे सभी समयों की पूर्ति करते हुए अवतार लें, हमारी जगह अपने प्राण देनेके लिए, हमारे पापों का प्रायश्चित करने के लिए और हमें क्षमा योग्य बनाने के लिए| अबतक भी रोम को लिखी गई इस पत्री का विषय हमारा अपना छुटकारा नहीं है, परन्तु स्वयं परमेश्वर की पवित्रता है| हम पापियों को छुटकारा दिलाते हुए, कैसे वह एक मात्र पवित्र लगातार पवित्र बनेहुए हैं? मसीह इस प्रश्न का एक मात्र उत्तर हैं|

लोगोने सूली के विरोध में इश्वर की निंदा की, कहा “यदि प्रत्येक व्यक्ति का मसीह में विश्वास रखने के द्वारा न्याय किया गया होगा तब हम और भी पाप कर सक ते हैं, सूली पर चढाये गए के अनुग्रह से अपने आप ही हमारा न्याय होता है|” पौलुस ने उनको अपराधी ठहराया और उन को गवाही दीथी कि इसाइयों का विश्वास मात्र विश्वास नहीं है, बल्कि यह मसीह के साथ जी रहा है, जहां उन की शक्ति हमारी कमजोरी में कार्य करती है और वह उनके फल हम में निर्माण करते है| मसीह का अनुसरण एक कड़ी के सद्रश्य है जिसके सिरे, मसीह में विश्वास, मसीह से प्रेम और धन्यवाद को परिमाणित करते हैं, जोकि हमारा न्याय करते है, पवित्र करते है और पूर्ण करते हैं| हम अपने आप को बचने वाले नहीं हैं, परन्तु हमने अपने ह्रदयों को परमेश्वर के अनुग्रह के लिए खोल दिया है| वे जिनका न्याय हो चूका है केवल विश्वास के द्वारा रहते हैं, वे विश्वास से विश्वास को आते हैं, और वे स्वयं ही स्वयं को धार्मिक लोगों में शामिल नहीं करते है| मसीह ने उन का न्याय किया, एवं अपनी आत्मा के कार्यों से दिन पर दिन उनको सुरक्षित रखा और पापों से मुक्त किया जैसे परमेश्वर अपनी धार्मिकता में लगातार बने हुए हैं क्यों कि वे प्रत्येक दिन हमें क्षमा करते है, और हर पल हमें पापों से मुक्त करते हैं| हम स्वयं उनके हैं, और उनके प्रति पवित्र हैं|

एक और प्रश्न लोगों द्वारा उभारा गया पुराने नियम के बारेमे जिसने परमेश्वर की धार्मिकता पर प्रश्न चिन्ह लगादिया, यह यहूदियों द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह को ठुकराना है, यहूदियों ने परमेश्वर के पुत्र को सूली पर चढ़ाया और इस लिए वे पापों से मुक्त होने के इतिहास से वंचित रहे थे| इस से भी बढकर वे हमेशा पवित्र आत्मा की आवाज का विरोध करते रहे जो उनको खोज निकाल कर पश्चाताप और विश्वास की ओर लाती थी| इस निर्विवाद सत्य के विचार में, पौलुस और अन्य उपदेशक आश्चर्यचकित थे “कैसे परमेश्वर लगातार धार्मिक बने रह सकेंगे, जब कि उन्होंने अब्राहम के परिवार को चुना था और एक कभी न समाप्त होने वाले नियम में स्वयं को उनके साथ बांध चुके थे? आज भी इन दिनों हम देख ते हैं कि परमेश्वर उनको कठोर बनाते हैं और उन्हें ठुकराते है, क्यों कि वे लोग परमेश्वर की पवित्र आत्मा को स्वीकार नहीं कर रहे थे, तब क्या परमेश्वर असफल हैं?” पौलुस ने अपनी पत्री में कहा कि “नही” जहाँ आप पुनरुत्थान के बारे में स्पष्ट करते है (रोमियों 9-11) आप कहते हैं की, हम यहूदियों को ना जांचते हुए, केवल परमेश्वर की धार्मिकता के बारेमे द्रढता से कहें क्यों कि राज्यों के उपदेशक हमारे प्रभु यीशु मसीह के पिता की दिव्यता, पवित्रता और धार्मिकता के लिए उत्साहित थे|

जो कोई भी सचे विश्वास को ग्रहण करेगा, पवित्र आत्मा के मार्ग दर्शन के अनुसार स्वयं को समर्पित करे गा, उसके मन में पुर्नस्थापना की जायेगी ताकि वह अपने पवित्रता में, दूसरे लोग जिनका न्याय हो चूका है के साथ नए नियम में जी सकेगा| ईसाई नीतियां मनुष्य को शिक्षण या मानवी शक्तियों को रोकती नहीं है, बल्कि उन्हें ऐसा आज्ञाकारी बनाती हैं कि वे परमेश्वर के प्रेम से सिंची हुई आज्ञा का पालन करें और उनकी पाप मुक्त करने की शक्ति, जोकि उन सभी को जो पुत्र में विश्वास करते है, को साहारा देती हैं| ईसाइयों के व्यव्हार से पिता का नाम निर्मल होता है| परमेश्वर की धार्मिकता का प्रदर्शन, रोमियों के नाम लिखी गई इस पत्री का विषय है|

प्रार्थना: ओ! परमेश्वर, पवित्र त्रयी, हम आप की आराधना करते है, क्यों की आप ने हमें सच्चे विश्वास में प्रवेश दिलाया और स्वतंत्रता से हमारा न्याय किया, और आप हमें हर एक दिन पवित्र करते हैं, और हमारा मार्ग दर्शन करते हैं| आप एक धार्मिक है, और आप लगातार धार्मिक बने हुए है, यद्यपि हम, दुनिया के इतिहास में लोगों की कई हरकतों को नहीं समझते| हमें पूरी तरह से पापों से मुक्त कीजिये और हमारे चरित्र में बचे हुए हमारे पापों को हमसे दूर कीजिये, कि हम एक प्रशंसा का रूप ले सकें और लोगों में एक मीठी सुगंध की तरह फैल जाएँ|

प्रश्न:

13. परमेश्वर की धार्मिकता कैसे हमारे विश्वास से जुडी है?

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