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यूहन्ना रचित सुसमाचार – ज्योती अंध्कार में चमकती है।
पवित्र शास्त्र में लिखे हुए यूहन्ना के सुसमाचार पर आधारित पाठ्यक्रम
चौथा भाग - ज्योति अन्धकार पर विजय पाती है (यूहन्ना 18:1 - 21:25)
अ - गिरिफ्तारी से गाड़े जाने तक की घटनायें (यूहन्ना 18:1 - 19:42)
3. राष्ट्र के न्यायालय में रोमी गव्हर्नर के सामने यीशु की पेशी (यूहन्ना 18:28 - 19:16)

अ) मसीह के राजसी दावों के विरुद्ध दोषारोपण (यूहन्ना 18:28-38)


यूहन्ना 18:28-32
“ 28 तब वे यीशु को काइफा के पास से किले को ले गए, और भोर का समय था, परन्तु वे आप किले के भीतर नहीं गए ताकि अशुद्ध न हों परन्तु फसह खा सकें | 29 तब पिलातुस उनके पास बाहर आया और कहा, ‘तुम इस मनुष्य पर किस बात का आरोप लगाते हो ?’ 30 उन्हों ने उसको उत्तर दिया, ‘यदि वह कुकर्मी न होता तो हम उसे तेरे हाथ न सौंपते |’ 31 पिलातुस ने उनसे कहा, ‘तुम ही इसे ले जाकर अपनी व्यवस्था के अनुसार उसका न्याय करो |’ यहूदियों ने उस से कहा, ‘हमें अधिकार नहीं कि किसी का प्राण लें |’ 32 यह इस लिये हुआ कि यीशु की वह बात पूरी हो जो उस ने यह संकेत देते हुए कही थी कि उसकी मृत्यु कैसी होगी |”

कुछ यहूदी यीशु की उस समय हत्या करने की सोच रहे थे जब आप ने बेतहसदा में एक लकवे के बीमार को चंगा किया था (5:18), परन्तु बहु संखिय यहूदी नेताओं ने लाज़र के मृतकों में से जिलाये जाने के बाद गुप्त रीती से निर्णय लिया कि अब आप का काम तमाम किया जाये (11:46)|

गुरुवार की रात को उच्च न्यायालय की दो महत्वपूर्ण सभायें हुईं जिन का यूहन्ना ने वर्णन नहीं किया है (मत्ती 26:57-67और27:1) | यह यहूदी विस्तृत विवरण यूनानी पाठकों के लिये कोई महत्व नहीं रखता परन्तु यूहन्ना ने यीशु के विषय में कहे हुए उस अन्यायपूर्ण वाक्य पर बल दिया जिसे रोमी न्यायालय के प्रतिनिधि, पिलातुस ने उन फौजी कोठरियों में कहा था जो मन्दिर से कुछ ऊंचाई पर स्थित थीं | केवल उसे ही अपराधियों को फांसी देने या मुक्त करने का अधिकार था |

जिन यहूदियों ने अपने प्रभु को पहचान लिया था वे किसी गैर यहूदी के निवास स्थान में प्रवेश कर के दूषित होने के डर से पीछे हट गये | वे अपनी धार्मिक रीति की पवित्रता बनाये रखना चाहते थे ताकि वे अपने परिवार के साथ फसह के मेमने का माँस खाने में सहभागी होते जब कि उन्हों ने परमेश्वर के असली मेमने को वध किया |

इस निर्णायक समय में जब कि यीशु को गिरिफ्तार किया गया था, पिलातुस के जीवन में क्रांतिकारक परिवर्तन आ गया था | उस के एक सम्बन्धी को, जो रोमी जनरल था, रोम के तानाशाह (राजा) ने विद्रोह की योजना बनाने के कारण बरखास्त कर दिया था | यह जनरल यहूदियों का विरोध करता था और यहूदियों ने ही षड्यंत्र का पर्दा फाश किया था | इस के कारण पिलातुस का अधिकार कम हो गया था जो उस समय प्राप्त था जब वह यहूदियों से घ्रणा करता था और उन के साथ कठोर व्यवहार करता था |

जब यहूदियों ने यीशु को पिलातुस के पास लाया तब गव्हर्नर तुरन्त उन के पास बाहर आया और उन से उन की माँगें पूछीं | उस ने वादविवाद करने में समय बरबाद नहीं किया परन्तु उन के आरोपों का सारांश जान लिया | पिलातुस का बीचके मुँह से मुस्कराना यीशु की ओर उस के स्वभाव को प्रगट करता है क्योंकि आप एक ऐसे राजा थे जिस के पास न हथियार थे न फ़ौज और आप गधे पर सवार हो कर यरूशलेम में प्रवेश कर गये थे इसलिये आप से रोम को कोई खतरा न था | परन्तु उस ने यहूदियों की माँगों को स्वीकार किया और उन के आग्रह के आगे झुक गया | उस ने शुरू ही से एक अफसर को उस के फौजी दस्ते के साथ यीशु को गिरिफ्तार करने में सहायता करने के लिये उन के हवाले कर दिया था | और यह अभियान यशस्वी हुआ : अब वह कैदी उस की दया के अधीन वहाँ था | फिर भी पिलातुस ने पूछा, “उस ने क्या अपराध किया है ?”

यहूदी गुरुजनों ने साफ शब्दों में घोषणा की : “इस से पहले हम ने उस के विषय में जो कुछ कहा उस की तुझे जानकारी है | यह व्यक्ति राजनीतिक अपराधी है जो विद्रोह करना चाहता है | हम इस से अधिक और कुछ नहीं कहना चाहते | हम यहाँ यहूदी लोगों का प्रतिनिधित्व करने औपचारिक भेट देने नहीं आये हैं | हम उसकी मृत्यु चाहते हैं ताकि लोगों में हंगामा न हो |

पिलातुस यहूदियों के मनमौजिपन और असहनशीलता को अच्छी तरह से जानता था और यह भी जानता था कि इस अपराध का सम्बंध उन की व्यवस्था से है और यह कि वे एक शक्तिशाली मसीह की अपेक्षा कर रहे थे | यीशु ने ऐसा कोई शब्द न कहा था और न ही ऐसा कोई काम किया था जिसे रोमी नियमों के अनुसार अपराध समझा जाता | इस लिये उस ने फिर यीशु को उन के हवाले कर दिया कि वे आप का अपनी व्यवस्था के अनुसार न्याय करें |

उस समय यहूदियों को व्यवस्था का उल्लंघन करने वालों को पत्थराव करने का अधिकार न था | वह यीशु को रोमियों के हाथों सार्वजानिक न्यायालय में पेश करके अपमानित करना चाहते थे क्योंकि रोमियों को अपवित्र समझा जाता था | इस तरह दासों और गुंडों को दिये जाने वाला कठोर दंड आप को दिया जाता यानी “शापग्रस्त क्रूस” पर चढ़ाया जाना | इस का अर्थ यह होता कि यीशु परमेश्वर के पुत्र नहीं थे जो शक्तिशाली और धार्मिक होते बल्कि वह कमजोर और धर्मद्रोही थे | कायफा यह चाहता था कि आप रोमियों के हाथो क्रूस पर मर जायें ताकि यह सिद्ध हो कि आप मसीह न थे बल्कि सत्तापहर्ता और विश्वासघाती थे |

यूहन्ना 18:33-36
“33 तब पिलातुस फिर किले के भीतर गया, और यीशु को बुलाकर उस से पूछा, ‘क्या तू यहूदियों का राजा है ?’ 34 यीशु ने उत्तर दिया, ‘क्या तू यह बात अपनी ओर से कहता है या दूसरों ने मेरे विषय में तुझ से यह कहा है ?’ 35 पिलातुस ने उत्तर दिया, ‘क्या मैं यहूदी हूँ ? तेरी ही जाती और प्रधान याजकों ने तुझे मेरे हाथ सौंपा | तू ने क्या किया है ?’ 36 यीशु ने उत्तर दिया, ‘मेरा राज्य इस संसार का नहीं; यदि मेरा राज्य इस संसार का होता, तो मेरे सेवक लड़ते कि मैं यहूदियों के हाथ सौंपा न जाता; परन्तु मेरा राज्य यहाँ का नहीं |’”

सिपाहियों ने यीशु को फौजियों की कोठरी में बंद कर दिया | पिलातुस ने जब यहूदियों के आरोप सुन लिये तब वह यीशु ने अपने पक्ष में कहे हुए शब्द स्वय: आप के मुँह से सुनना चाहता था | पिलातुस यहूदियों के कहने पर विश्वास न करता था परन्तु न्याय कि दृष्टि से उसने मसीह से पूछा : “क्या तू यहूदियों का राजा है ? मैं ने कई मसीह देखे हैं जो हथियारों से सुसज्जित थे, काली दाढ़ी रखते थे और उनकी आँखें चमकदार रहती थीं | तू न तो लड़ाकू है और न आतंकवादी है | तू तो अति दु:खी व्यक्ति, विनम्र और सौम्य है फिर तू राजा बनने की अभिलाषा कैसे कर सकता है ? राजा को अधिकार, शक्ति और निर्दयता की आव्यश्कता होती है |”

यीशु को ऐसी शंका हुई कि पिलातुस को आप के राजा होने के दावे पर विश्वास नहीं है इस लिये आप ने उस से पूछा : “क्या तेरी सेना ने तुझे बताया कि मेरे चेले रात को उन से लड़े या तेरे सुचना देने वालों ने कभी मुझे राजनीतिक भाषण देते हुए सुना था या तेरे प्रश्न केवल यहूदियों के झूट पर आधारित हैं? गव्हर्नर को झूटे आरोपों पर ध्यान नहीं देना चाहिये |”

पिलातुस ने क्रोध में आकर कहा : “क्या मैं यहूदी हूँ ?” मानो वह यह कह रहा हो कि “मैं उन जिद्दी और कट्टर धार्मिक लोगों के स्तर तक कभी न झुकुंगा जो रात दिन धार्मिक विषयों पर वाद विवाद करते रहते हैं |” इस तरह पिलातुस ने स्वीकार किया कि उस ने यीशु को गिरिफ्तार नहीं किया बल्कि यहूदियों, उन के नेताओं और राष्ट्र वादियों ने ऐसा किया | तब उस ने संक्षिप्त में पूछा, “तू ने क्या अपराध किया है ? मैं तेरे मुँह से सुनना चाहता हूँ ताकि मैं तुझ पर दोष लगाने वालों को उत्तर दे सकूँ यधपि तेरी पिटाई होगी; इस लिये सब कुछ सच बता |”

तब यीशु ने कुछ इस तरह से सब सत्य बता दिया जैसा कभी अपने चेलों के सामने भी न बताया था | आप ने कहा, “परमेश्वर का राज्य केवल उसी का है, जो करदाई, हथियारों या नौकरियों पर बनाया नहीं जाता ताकि दूसरों का लाभ उठाया जाये |” मसीह के राज्य का कभी अन्त न होगा जैसे दूसरों के राज्य का होता है | यीशु ने अपने अनुयायियों को सिखाया कि वे तलवार से वार न करें, न ही गोलियाँ बरसायें और न बम फेंकें | आप का राज्य जगत के दूसरे राज्यों से पूर्णत: अलग है |

यूहन्ना 18:37-38
“37 पिलातुस ने उस से कहा, ‘तो क्या तू राजा है ?’ यीशु ने उत्तर दिया, ‘तू कहता है कि मैं राजा हूँ | मैं ने इस लिये जन्म लिया और इस लिये संसार में आया हूँ कि सत्य की गवाही दूँ | जो कोई सत्य का है, वह मेरा शब्द सुनता है |’ 38 पिलातुस ने उस से कहा, ‘सत्य क्या है ?’”

पिलातुस यीशु के दावे का अर्थ समझ न सका परन्तु वह जान गया कि अपराधी ने यह स्वीकार किया कि वह राजा है परन्तु उस राजसी (kingship) के महत्व को स्पष्ट न किया | यीशु ने यह भी कहा, “तू ने मेरा गुप्त भेद जान लिया है और मेरे वचन को समझा है | राजा अपने राज्य का स्वामी और विशेषज्ञ होता है; मेरा राज्य इस झूट और धोकेबाज दुनिया का नहीं है क्योंकि मैं सत्य का राजा हूँ |”

तब यीशु ने गवाही दी कि आप के अस्तित्व की शुरुआत आप के कुंवारी मरयम से जन्म लेने से नहीं हुई बल्कि आप हमारी दुनिया में परलोक से पधारे हैं | आप अपने पिता से अनन्त काल से उपस्थित हुए | आप दिव्य सत्य जानते हैं | आप परमेश्वर के सत्य की गवाही देते हैं | परन्तु पिलातुस हंस पड़ा और पूछा : “सत्य क्या है ?” इस राज्यपाल ने मिथ्याचार और विश्वासघात इतनी अधीक मात्रा में देखा था कि उस का सत्य पर से विश्वास हट गया था | परन्तु यीशु ने जो आस्मानी सत्य के ईमानदार गवाह हैं, संयम से काम लिया और हम पर अपने पिता का नाम प्रगट किया |

प्रार्थना: प्रभु यीशु, आप मेरे राजा हैं; मैं आप का हूँ | मुझे अपनी कुलीनता का दास बना लीजिये; और मुझे अपने सत्य में स्थिर रखिये |

प्रश्न:

112. यीशु कैसे और किस प्रकार से राजा हैं ?

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