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रोमियो – प्रभु हमारी धार्मिकता है|
पवित्र शास्त्र में लिखित रोमियों के नाम पौलुस प्रेरित की पत्री पर आधारित पाठ्यक्रम
भाग 1: परमेश्वर की धार्मिकता सभी पापियों को दण्ड देती है और मसीह में विश्वासियों का न्याय करती है और पापों से मुक्त करती है। (रोमियों 1:18-8:39)
अ - सारा संसार शैतान के तले झुका है और परमेश्वर अपनी पूरी धार्मिकता में न्याय करेंगे (रोमियों 1:18-3:20)

1. परमेश्वर का क्रोध राज्यों के विरोध में प्रगट होता है (रोमियो 1:18-32)


रोमियो 1:29-32
29 सो वे सब प्रकार के अधर्म, और दुष्टता, और लोभ, और बैर भाव, से भर गए; और डाह, और हत्या, और झगड़े और छल, और इर्ष्या से भरपूर हो गए, और चुगल खोर | 30 बदनाम करने वाले, परमेश्वर के देखने में घृणित, औरों का अनादर करने वाले, अभिमानी, डींग मार, बुरी बुरी बातों के बनाने वाले, माता पिता की आज्ञा न मानने वाले| 31 निर्बुद्धि विश्वास घाती, मया रहित और निर्दय हो गए| 32 वे तो परमेश्वर की यह विधि जानतें हैं, कि ऐसे ऐसे काम करने वाले मृत्यु के दंड के योग्य है, तो भी ना केवल आप ही ऐसे काम करते हैं, वरन करने वालों से प्रसन्न भी होते है|

पौलुस ने हमारी आखों के सामने दस आयतों की पापों की सूची पत्र के रूप में व्याख्या की है, इस लिए नहीं कि हम इन नियमों के बारे में सकारात्मक रूप से बात करें, दार्शनिकों की तरह, या दूसरों को जांचे और उन माप दडों के आधार पर उन पर दोष लगाएं, परन्तु अपने आप को भय के साथ पहचान सके और अपने अन्दर के पापों की सभी संभावनाओं को देखें| वह जो अपने सृष्टि कर्ता के साथ नहीं रहता अन्याय और गलत कार्यों से भरा हुआ है, क्योंकि बुराई की आत्मा बहुत सारे फल लाती है उनके लिए जो पवित्र आत्मा से रिक्त हैं| मनुष्य या तो मसीह के साथ रहता है, या बुराई में रहता है| वहाँ कोई तटस्थ घेरा नहीं है|

प्रभु यीशु और उनके उपदेशक पौलुस ने व्यभिचार को पाप के सबसे पहले रूप में क्रमबद्ध किया है| व्यभिचार पवित्र प्रेम के बंधन को ढीला करता है, दुसरे साथी की ईमानदारी पर विश्वास को मिटाता है, नास्तिकता एवं अविश्वास की ओर जाने वाले दरवाजे को विस्तृतता से खोलता है| पापों से भरी हुई उत्कृष्ट अभिलाषाएं उन लोगों पर शासन करती है, जो कि स्वयं में परमेश्वर की शक्ति को नहीं मानते है, अधिकतर लोग उनके विचारों, शब्दों या कार्यों में व्यभिचारी है| वे अस्वच्छ और भ्रष्ट है| क्या तुम अपने आप को जानते हो? तुम्हारा अन्तःकरण तुमसे साफ साफ कहता है| तो अपने भूतकाल को मत नकारो, परन्तु जो तुमने किया था उसे स्वीकार करो|

क्या तुम जानतेथे कि परमेश्वर के बिना मनुष्य धार्मिक नहीं है, परन्तु दुश्चरित्र या दुष्ट है? क्यों शिक्षक, इंसानियत, शिक्षण और समाज सेवा के बारे में कहते हैं, यदि इंसानियत अपने आप में ही दुष्ट और भ्रष्ट है? हमें सुधरने या उसी में और उन्नति करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि नई रचना, ह्रदयों एवं दिमागों के नवीनीकरण की आवश्यकता है|

वह जो परमेश्वर को नहीं जानता वह पैसे से प्रेम करता है और अपने जीवन का निर्माण इस नाशवान देवता पर बनाता है| जैसे जैसे उसका पैसा बढता है, पैसे के लिए उसका प्रेम भी वैसे वैसे बढ़ता है| यह उसे ईसाईयों की आशा से दूर ले जाता है घमंड और आडम्बर के जीवन की ओर, और बुराई एवं घृणित उत्कंठाओं के शासन की ओर|

वह सभी जिनपर दूषित दिमाग का राज है, ईर्ष्या, ठगी, प्रतिशोध, छल-कपट, झूठ, धूर्तता से भरे हुए हैं| एक ईर्ष्यालु मनुष्य दुष्टता का निर्माण करता है अपने दुश्मनों के विरोध में और वैसे ही अपने पड़ोसियों के विरोध में| वह उनसे अपने लगाव को दर्शाता है, परन्तु उसका दिल एक विषैले सांप का घोंसला है|

हमेशा ही, एक ईर्ष्यालु मनुष्य का उदेश्य दूसरों से जलना और ईर्ष्या करना है| वह दुसरे लोगों को अशिशें मिलनेसे प्रसन्न नहीं होते क्यों कि वह उन लोगों से और अधिक अमीर और सफल होना चाहते है| इससे भी अधिक वह किसी भी और इंसान से अधिक अमीर, सुन्दर, तेजस्वी और इज्जतदार बनना चाहते है| कन्जुसपना और जलन अधिक बुरे कार्यों का प्रारंभिक बिंदु होते हैं| आज विज्ञापनों द्वारा लोगों में लालची पन और जलन की उत्कंठाओं को उभारा जा रहा है, नई वस्तुओं को किसीभी कीमत पर खरीदने को प्रोत्साहन देने के लिए|

उसी प्रकार की विनाशकारी उत्कंठाएं ना केवल अच्छाई की ओर से दिमाग का रुख दुसरी ओर पलटती हैं, बल्कि क़त्ल, घृणा, और बेरुखी, दुर्नाम, और मानहानि के लिए भी द्वार खोलती है| यह बात अपने दिमाग में रखो कि यीशु ने हमें सिखाया था कि दूसरों को त्यागने, नफरत या घृणा करने के मात्र विचार अपने आप में खून करना है| हम सभी परमेश्वर की दृष्टी में खुनी और खूनियों के बच्चे हैं|

यह विनाशकारी आत्मा हमारे शब्दों और कार्यों में बहुत शीघ्रता से दिखती है हम जब हमारे समाज और परिवारों में वर्ग और गुट बनाते हैं, जबकि पवित्र आत्मा हमें, गुटों में होनेवाले झगडो के बीच शांति और मध्यस्थता करने के लिए उकसाती है कि हम शांति दूत बनें| क्या तुम अव्यवस्था और विभाजन के एक कारण हो, अवज्ञा के बेटों में शामिल हो क्या तुमने आग में ईंधन डाला है? या तुम अपने साथ क्षमा और संधि लाये हो, और शत्रुता का अंत करनेको पहले चुनते हो, यहांतक कि तुम को ऐसा करने के लिए स्वयं का बलिदान करना पड़े?

छल कपट शैतान की विशेषता है जो कि हमारे परमेश्वर में किसीभी प्रकार से नहीं पाया जाता| जो कोई भी चालाकियों से अपने कार्य करता है, अपने विनम्र शब्दों से सीधे साधे लोगों को अपने जाल में फंसाता है वह किसी बुरे इंसान का पुत्र है| सच्चाई, सरल ता और सीधी बात दिव्य आत्मा के फल हैं, परन्तु झूठ और उस की शाखाएं बहुत बुरी हैं|

नर्क के दूसरे फल अपने साथियों के बारेमें कथित व्यवहार और मानहानी करना है, अपने नामों को ऊपर लानेके लिए | हमारे होंठ ज़हर से भरे हुए हैं और हमारे पैर सबसे पहले दूसरों को भ्रष्ट करते हैं| हम अपने आप को ऊंचाई पर लेजाने के लिए, अपने सगे रिश्तेदारों को नकारने के लिए तैयार किये गए है| जो कोई भी ऐसे पापों को करते हैं, चाहे अपनी इच्छा से या मज़बूरी से, परमेश्वर से घृणा करते हैं, क्यों कि जो कोई भी परमेश्वर से प्रेम कर ता है, लोगों से भी उसी प्रकार से प्रेम करता है| परन्तु जब तुम लोगों से बे रुखी से बात करते हो, उन से घृणा करते हो, उन पर दोष लगाते हो, तब वह आत्मा जो यह सब अधार्मिक कार्य तुमसे कराती है, तुम्हारी ही है| जब तुम किसी से घृणा करते हो, तुम परमेश्वर से घृणा करते हो क्यों कि परमेश्वर तो प्रेम है, और जो प्रेम में रहता है, परमेश्वर में रहता है, और क्षमा करता है, आशीष देता है, और यहाँ तक कि जो प्रेम करने योग्य भी नहीं है, उससे भी प्रेम करता है, प्रेम के सोते के साथ समन्वय में|

जैसे शैतान को ह्रदय के सबसे भीतरी अवकाशों पर घमंड है, तो सभी दुष्ट हैं| वे जान ते हैं उनके अपने ह्रदयों में, उनके सभी अपराध, ईर्षा और कमियों, और इस ज्ञान के कारण, वे उनकी भ्रष्ट आत्माओं को छिपाने के लिए आश्रय ढूंढते हैं| वे अभिमानी हो गये, और किसी भी बात को बढाचढा कर बताने लगे और वे अपने अहंकार में अकडकर चलने लगे वे तोते की तरह यह सोच रहे है कि उन्होंने अपने आप को महान या शानदार बना लिया है जबकि वास्तविकता में उन्होंने अपने आप को भद्दा बना लिया है| इस प्रकार से ये लोग गरीबों के प्रति क्रूर और उन सभी लोगो के प्रति जो इनकी दया को आडंबर कहते हैं, निर्दयी हैं| वे केवल अपनी उत्कृष्ट अभिलाषाओं की सेवा करते है, और ईर्ष्या एव छल से भरे हुए हैं| वे अच्छे, आशीषित, और महत्वपूर्ण दिखते हैं, परन्तु जब वे अकेले होते हैं, वे सुनते है कि परमेश्वर उन पर दोषारोपण कर रहे हैं एक शब्द के साथ “दुराचारी”|

दूसरों की कमजोरियों को उजागर करने, और उनकी दयालुता के कार्यों में, वे अपने दुष्टता की ऊँचाई पर पहुँच जाते हैं, और उनकी बुरी आत्मा उनके परिवारों में अवज्ञा के रूप में दिखाई देती है| वे अपने पालकों को परमेश्वर के नियम के अनुसार अपने सरक्षको के रूप में आदर नही करते बल्कि सेवा, त्याग, प्यार और कार्यों को करने के लिए, बगैर किसी तैयारी के वे पैसे, स्वतंत्रता और अधिकारों की मांग करते हैं| इस प्रकार से वे उस प्यार जिसने उन्हें जीवन दिया है का व्यापार करते हैं और अपने अनपढ़ पालकों की अज्ञानता से घृणा करते हैं| वे नहीं जानते कि पाप सबसे बड़ी मूर्खता है, जबकि परमेश्वर का भय सबसे बड़ी चतुराई है| वे सभी जो अपने आपको परमेश्वर की आत्मा को समर्पित नहीं करते, कुछ भी सही प्रकार से नही समझ पाते लेकिन सभी बातों को गलत रूप से देखते हैं| वे स्वंय के लिए और पुरे समाज के लिए आदर्शों को खो चुके है|

इस स्थिति में, वे अपने आप से ईमानदार रहने की क्षमता भी नहीं खोज पाते हैं, और इसीलिए अविश्वसनीय इन्सान बनते हैं| वो सभी लोग जो अपने आप को परमेश्वर को नहीं सौंपते है दूसरे लोगों के साथ सहयोग नहीं कर सकते हैं| परमेश्वर की ‘ईमानदारी’ एक मनुष्य को ईमानदार बनाती है, परन्तु वह जो अपने परमेश्वर के बिना जीता है वह भुला, बिखरा और गरीब रहता है| हमारे परमेश्वर, प्यार, दया, और करुणा है| संताप उनके लिए जिन्होंने सभी अच्छाई के सोते को छोड दिया है, क्योंकि उनके ह्रदय पत्थर के समान कठोर बन गये हैं| वे स्वयं से प्रेम करते हैं, और दूसरों से घृणा करते हैं| आप अपने आप को देखिये क्या तुम अपने दुश्मनों से प्रेम करते हो? क्या तुम गरीबों के लिए करुणा अनुभव करते हो? मसीह ने अपने बिखरे हुए लोगों के लिए करुणा का अनुभव किया और उन लोगों के अपराधों के कारण दुःख सहा| क्या तुम तुम्हारे लोगों की निंदा करते हो, या तुम उनसे प्रेम करते हो? क्या तुम दया और कृपा से रिक्त हो, या परमेश्वर की आत्मा ने तुम्हारा नवीनीकरण कर दिया है कि तुम उनके सामने एक पादरी के समान खड़े हो पाओ, पापियों के प्रतिनिधि के रूप में?

हमारे पाप समुद्र किनारे की रेतसे भी कहीं अधिक हैं| परमेश्वर को पहचानो, और तब तुम अपने आपको पहचानो| जो कोई भी अपने आप को परमेश्वर की अनोखी दिव्यता के सोते से अलग करता है, मृत्यु और दण्ड का अधिकारी है| सभी मनुष्य अपने बालपन से पापी हैं| तुम्हे अपने अपराधों और पापों को आज ही मार देना चाहिए| परमेश्वर की पवित्रता को तुम्हारे विनाश की आवशकता है| तुम्हे जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं है| मनुष्यों के सभी अधिकार झूठें हैं| हमारे पास हमारे पापों के लिए केवल मरने का अधिकार है| तुम तुम्हारे शहर में ऐसे भटक ते हो जैसे किसी को मृत्यु दण्ड दिया गया हो, मनुष्यों द्वारा नहीं परन्तु परमेश्वर द्वारा| तो तुम कब अपने दिमाग को बदलोगे, और पूर्णता एवं गंभीरता से पश्चाताप करोगे?

यदि तुम पूरी तरह से पश्च्याताप नहीं करते हो, तुम्हारे पाप एक ऐसे बिंदु पर पहुँच जाते हैं जहां तुम्हे दूसरे लोगों की पापी गतिविधियों से संतोष प्राप्त होता है| तुम आनंद के साथ केवल पाप ही नहीं करते, बल्कि उन्लोगोंके साथ जो पाप करते हैं, तुम्हे परम आनंद मिलता है; और इस लिए तुम उन्हें प्रोत्साहन देते हो, उत्तेजित करते हो, और निर्दोषता के पथ से अपराध करने के लिए प्रेरित करते हो, तुम्हारे स्वयं के पापों के स्पर्श से इस पाप के रोग को उन तक फैलाते हो| यह अपराध की अति पीड़ा दायक वृध्द्धि है| क्या यह पर्याप्त नहीं कि तुम स्वयं बुरे हो? क्या यह आवशयक है कि तुम तुम्हारे समाज को भ्रष्ट करो? तुम अपने आप को देखो! क्या तुम अपने पापों के साथ खुश हो? क्या तुम दूसरों के ह्रदयों की कठोरता से संतुष्ट हो? क्या तुम आंसू नहीं बहाते, गंभीर पश्च्याताप में, स्वयं तुम्हारे लिए और तुम्हारे लोगों के लिए? क्या परमेश्वर की आत्मा तुम में सच्चा पश्च्याताप लाई है, या तुम अब तक अभिमानी हो?

प्रार्थना: परमेश्वर मुझ पापी पर दया करें| आप जानते हैं कि मेरे खून की हर एक बूँद पाप भरी है, वह मेरी जीव कोशिकाओं में है, मै बुरे विचारों का सोता हूँ| मै आप के क्रोध में नाशवान हूँ, और आप का न्याय पवित्र है| मेरे साथ धीरता पूर्वक व्यवहार करे, और आप के न्याय के अनुसार मेरा नाश न करें| मुझमें मेरे सभी मित्रों और पड़ोसियों के साथ परिवर्तन करें कि हम सब एक साथ नर्क में ना गिरें| मेरे लोगों और मुझमे पापों के बारे में ज्ञान दे और हमारे ह्रदयों में परिवर्तन करें ताकि आप हममें एक नया निर्माण कर सके| मुझ पर अपनी दया करें, ओ! परमेश्वर, आपकी प्रेम भरी दयालुता के अनुसार, अपनी पवित्र आत्मा को मेरे पास ना लीजिए|

प्रश्न:

18. ''पापों की सूचीपत्र में कौनसे पांच पाप है, जोकि तुम्हारे अनुमान से आज हमारे संसार में बहुत आम है

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