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रोमियो – प्रभु हमारी धार्मिकता है|
पवित्र शास्त्र में लिखित रोमियों के नाम पौलुस प्रेरित की पत्री पर आधारित पाठ्यक्रम
भाग 3 - परमेश्वर की धार्मिकता मसीह के अनुयायियों के जीवन में दिखाई देती है। (रोमियो 12:1 - 15:13)

3. हमें भ्रातृत्व प्रेम सीखाना चाहिए और इसमें प्रशिक्षित होना चाहिए (रोमियो 12:9-16)


रोमियो 12:9-15
9 प्रेम निष्‍कपट हो; बुराई से घृणा करो; भलाई मे लगे रहो। 10 भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे पर मया रखो; परस्‍पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो। 11 प्रयत्‍न करने में आलसी न हो; आत्मिक उन्माद में भरो रहो; प्रभु की सेवा करते रहो। 12 आशा मे आनन्‍दित रहो; क्‍लेश मे स्थिर रहो; प्रार्थना मे नित्य लगे रहो। 13पवित्र लोगों को जो कुछ अवश्य हो, उस में उन की सहायता करो; पहुनाई करने मे लगे रहो। 14अपने सतानेवालों को आशीष दो; आशीष दो स्‍त्राप न दो। 15आनन्‍द करनेवालों के साय आनन्द करो; और रोनेवालों के साथ रोओ। 16आपस में एक सा मन रखो; अभिमानी न हो; परन्‍तु दीनों के साथ संगति रखो; अपनी दृष्‍टि में बुद्धिमान न हो।

यूनान में प्रेम के लिए अलग अलग शब्दों का उपयोग होता है “फाईलू” शब्द का अर्थ प्राकृतिक मानवीय आकर्षण, इसकी मजबूत अनुभूति या भावुकता है| शब्द “इरोज़” कामुक प्रेम जोकि किसी इन्सान की काम इच्छा और सहजवृति से उछलता है को बताता है; जबकि शब्द “अगापे” सबसे ऊंचे और अत्यधिक परिपक्व प्रेम को सूचित करता है| यह ईश्वरीय प्रेम है जो अपने आप को दीन, और यहाँ तक कि अपने दुश्मनों तक के लिए बलिदान करके तैयार होता है, न्याय और इच्छा को स्पष्ट ठोस अर्थ देता है और प्रमुख रूपसे ईश्वरीय प्रकटीकरण की अनन्तता से आता है|

मसीह ने इस ईश्वरीय प्रेम में अपना जीवन जैसे अपराधियों के उद्धार के लिए दे दिया था| यद्यपि पौलुस मसीह के अनुयायियों के व्यवहारिक जीवन में इस प्रेम के बारे में कहते हैं, जैसे आपने पहले से ही लिखा था कि: “परमेश्वर का प्रेम हमारे हृदयों में पवित्र आत्मा जो हमें दी गई है द्वारा उंडेला गया है”| (रोमियो 5:5)

ईश्वरीय प्रेम झुठ नहीं है, क्योंकि यह सीधा खड़ा है| सुबिद्धि और दया के मार्ग में यह सत्य कहता है| जैसा कि बाईबिल में लिखा है पाखंड अच्छा नहीं है| कुछ मामलों में हमें लोगों के सामने अपने अपराध स्वीकार करना चाहिए ताकि घमंड या शेखी हममें बची न रहे| हमें यीशु के लिए अपने प्रेम को स्वीकार करना चाहिए, क्योकि वह एक अकेले हैं जिन्होंने अपने महान प्रायश्चित द्वारा हमें न्यायोचित ठहराया|

ईश्वरीय प्रेम बुराई से घृणा करता है जिसके लिए हमारा अन्तकरण हमें दण्ड देता है, और जिसे परमेश्वर का वचन अस्वच्छ, झूठ, बेईमानी और अन्यायसंगत में शामिल करता है| प्रेम ऐसे व्यवहार के साथ सहमत नहीं होता, बल्कि शुद्धता, सत्यवादिता, स्पष्टवादिता और पवित्रता का समर्थन करता है|

ईश्वरीय प्रेम हमें ईश्वर में हमारे भाईयों और बहनों के प्रेम में शिक्षा प्रदान करता है, जिससे बिना किसी शिकायत के हम उन्हें सहते है, और उन की देख भाल करते है| हमारे प्रेम को दूसरे लोग सचमुच मान ले इस के लिये, हमारी सेवा और हमारी बोली निष्ठावान और स्नेहिल होनी चाहिए| पति पत्नी के बीच आपसी आदर भी इसी सुचि में आता है|

यदि कोई भी व्यक्ति सुसमाचार की सेवा बोलकर या लिखकर करता है, उसकी सेवकाई आध्यात्मिक ज्वाला के समान, चाहे वह विरोधियों के मध्य में हो, होनी चाहिए, और उसे परमेश्वर के मार्गदर्शन में दृढतापूर्वक स्थापित होना चाहिए|

वह जो अपने कार्यों में असफलता का अनुभव करता है, ने अपनी इस आशा कि मसीह विजेता है, को छोड़ नहीं देना चाहिए; और वह जिसका आमना सामना पीडाओं और कठिनाईयों से होता है उसने विश्वासपूर्वक और धैर्यपूर्वक, निरंतर परिश्रमपूर्वक विश्वास के साथ, बिना किसी संदेह के प्रार्थना करते रहना चाहिए| परमेश्वर हमारे रुदन का उत्तर दूसरों के लिए और स्वयं हमारे लिए देते है|

यदि विश्वास में तुम्हारे भाईयों की पीडाओं को देखते हो, तुम्हे उनके प्रति सहानुभूति दर्शाना चाहिए और उनकी समस्याओं में हिस्सा लेना चाहिए| इसी प्रकार से वैसे ही जैसे वे तुम्हारे पास तुम्हारे पिता को गौरान्वित करने आते है, आनंद पूर्वक अपने घर के दरवाजों को उनके लिए खोलो, और यदि तुम उनको जो भूखे है को परमेश्वर के नाम में खाना खिलाते हो, तों परमेश्वर तुम्हारे घर को उससे कही गुना अधिक भर देंगे| वह उन सभी के साथ उपस्थित हैं जो उनसे प्रेम करते है|

यदि कोई विद्रोंहपूर्वक तुम्हे सताता है, उसे आशीष की शक्ति के साथ आशीष दो| जो तुम्हे श्राप देते हैं उन्हें श्राप मत दो, परन्तु उद्धारकर्ता से प्रार्थना करो उन्हें पापों से छुड़ाने के लिए, जैसे कि दमिश्क में विश्वासियों ने किया था जब शाऊल उन पर अत्याचार के लिए उन लोगों के पास आया था और उन्हें येरूशलेम की ओर बंधक बनाने ले जारहा था| और तब परमेश्वर शाऊल की राह में खड़े होगये और उसके अभिमान को पूरी तरह से तोड़ दिया|

जब सुलि पर चढाऐ हुए, जो मृतकों में से जी उठे के आशीर्वाद को महसूस किया गया, तब अन्य विश्वासी आनंदित होते है और विश्वास में हिम्मत पातें है, क्यों कि वे मसीह की जीत और इसके परिणाम को देखते है| परंतु जब कोई पड़ोसियों के भटकने पर रोता है, तब हमें उसकी पीड़ा में शामिल होना चाहिए| आंसुओं से लज्जित नहीं होना चाहिए|

कलीसिया में एक समूह जैसे परमेश्वर का परिवार, के रूप में रहने की भरपूर कोशिश करो| पैसा, सम्मान, सत्ता, और इस जगत के प्रलोभनों के बारे में पहले मत सोचो, परंतु दीन और आशाहीन व्यक्तियों के साथ रहो, जैसे यीशु कई बीमारों, बुरी आत्माओं वाले मनुष्यों, और यहाँ तक कि मृतकों के साथ रहते थे|

अपने आपको दूसरे लोगों की अपेक्षा अधिक सभ्य या ऊंचा मत समझो, परन्तु परिणाम देने वाले परमेश्वर से प्रार्थना करो कि वे कलीसिया के समागम में, चंगाई में, सहानुभुति मे, बचाने में और श्रेष्ठ सुझाव लाने में, तुममे कार्य करें|

सावधान रहो झगडा मत करो | धैर्य के साथ एक दूसरे को सहन करो, क्योंकि परमेश्वर एक है उनका प्रायश्चित एक है, और उनकी आत्मा का कोई पर्याय नहीं है| ऐसा व्यवहार मत करो जैसे तुम एक बेहतर उद्धार का निर्माण करते हो| हम सभी परमेश्वर, उनके पुत्र और उनके प्रेम की आत्मा के अनुग्रह से जी रहे है|

प्रार्थना: ओ स्वर्गीय पिता, हम आपका धन्यवाद करते है हमारी कलीसिया में मित्रता के चमत्कार के लिए| आपने आपका प्रेम, आपका धीरज, और आपका उल्लास अपनी पवित्र आत्मा के हमारे अंदर निवास द्वारा हमें प्रदान किया, जब हमने प्रायश्चित किया और जीवित मसीह के विश्वास में निरंतर बने रहे| कृपया हमारी मदद करे कि हम केवल शब्दों में ही नहीं परंतु कर्तव्य के रूप में भी प्रेम के कार्य कर सके| ओ परमेश्वर हमारे साथ रहे और हमें आपकी महिमामयी आशा में हमेशा रखें|

प्रश्न:

84. परमेश्वर के प्रेम के किस प्रकार को तुम अमल में लाना अत्यधिक महत्वपूर्ण एवं अपनी मित्रता में आवश्यक मानते हो?

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